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प्रधानमंत्री मोदी ने सोमनाथ में शौर्य यात्रा का किया नेतृत्व, वीरों को दी श्रद्धांजलि

11 Jan 2026



गिर सोमनाथ, 11 जनवरी (हि.स.)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को गुजरात के पावन सोमनाथ मंदिर परिसर में आयोजित शौर्य यात्रा का नेतृत्व किया और सोमनाथ की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित की। यह शौर्य यात्रा सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अंतर्गत निकाली गई, जो 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी के आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे होने तथा मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर मनाया जा रहा है।


शौर्य यात्रा में 108 घोड़ों की प्रतीकात्मक झांकी शामिल की गई, जो वीरता, पराक्रम और बलिदान का प्रतीक है। यात्रा शंख सर्कल से प्रारंभ होकर हमीरजी गोहिल सर्कल पर संपन्न हुई। इस दौरान प्रधानमंत्री ने सोमनाथ मंदिर की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए दो महान योद्धाओं हमीरजी गोहिल और वेगड़जी भील की प्रतिमाओं पर पुष्पांजलि अर्पित की। इसके साथ ही उन्होंने मंदिर परिसर के प्रवेश द्वार के निकट स्थापित सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा पर भी श्रद्धा सुमन अर्पित किए, जिनके प्रयासों से स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार संभव हो सका और वर्ष 1951 में इसे श्रद्धालुओं के लिए पुनः खोला गया।


शौर्य यात्रा के उपरांत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर तीन अलग-अलग पोस्ट के माध्यम से वीर हमीरजी गोहिल, वेगड़जी भील और सरदार वल्लभभाई पटेल का स्मरण किया। उन्होंने लिखा कि वीर हमीरजी गोहिल बर्बरता और हिंसा के दौर में साहस और दृढ़ संकल्प के प्रतीक बनकर खड़े रहे। उनकी वीरता हमारी सभ्यतागत स्मृति में युगों तक अंकित रहेगी। उनका साहस उन लोगों के लिए कालजयी उत्तर है जो यह मानते थे कि क्रूर बल से हमारी सभ्यता को कुचला जा सकता है।


प्रधानमंत्री ने वेगड़जी भील का स्मरण करते हुए कहा कि उनका साहस सोमनाथ के इतिहास का अभिन्न हिस्सा है। वे अमानवीय हिंसा की धमकियों से कभी नहीं डरे और पवित्र मंदिर की रक्षा में अंत तक अडिग रहे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सोमनाथ की वास्तविक शक्ति भारत माता की अनगिनत संतानों के संकल्प से आती है।


सरदार वल्लभभाई पटेल को श्रद्धांजलि देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आज का भव्य सोमनाथ मंदिर उनके बिना संभव नहीं होता। वर्ष 1947 में दीवाली के दौरान खंडहरों के रूप में सोमनाथ के दर्शन कर वे अत्यंत व्यथित हुए थे और तभी उन्होंने मंदिर के भव्य पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। वर्ष 1951 में जब मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोले गए, तब वे इस संसार में नहीं थे लेकिन उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और दूरदृष्टि आज भी इस दिव्य परिसर में स्पष्ट रूप से झलकती है।


वीर वेगड़जी भील


वेगड़जी भील गिर क्षेत्र के प्रमुख भील सरदार थे। वर्ष 1299 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत के सेनापति उलूग खान के आक्रमण के समय उन्होंने हमीरजी गोहिल के साथ मिलकर सोमनाथ मंदिर की रक्षा की। उनकी भील सेना ने तीरों की बौछार से शत्रु सेना को भारी क्षति पहुंचाई। अमानवीय हिंसा की धमकियों के बावजूद वे अंत तक डटे रहे और मंदिर की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनका बलिदान सोमनाथ की रक्षा से जुड़ी लोककथाओं में अमर है।


वीर हमीरजी गोहिल


वीर हमीरजी गोहिल गुजरात के लाठी (अर्थिला) क्षेत्र के गोहिल वंश के मात्र 16 वर्षीय युवा राजपूत सरदार थे। वर्ष 1299 ईस्वी के उसी आक्रमण के दौरान, हाल ही में विवाह होने के बावजूद, उन्होंने अपने कुछ साथी योद्धाओं को संगठित किया और संख्या में कहीं अधिक शत्रु सेना के विरुद्ध कई दिनों तक संघर्ष किया। सोमनाथ मंदिर की रक्षा में अंतिम सांस तक युद्ध करते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त की। उनकी बहादुरी सोमनाथ के इतिहास का अभिन्न अंग है और मंदिर परिसर में उनकी स्मृति में स्थापित स्तंभ आज भी उनके शौर्य की गाथा कहता है।


सरदार वल्लभभाई पटेल


सरदार वल्लभभाई पटेल ने जूनागढ़ के भारत में विलय के बाद वर्ष 1947 में सोमनाथ मंदिर के खंडहरों का दौरा किया, जिससे वे अत्यंत भावुक हो उठे। उसी वर्ष दीवाली के अवसर पर उन्होंने मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और जनसहयोग से सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य प्रारंभ हुआ। सरदार पटेल के निधन के बाद भी यह कार्य जारी रहा और 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने मंदिर के द्वार श्रद्धा

लुओं के लिए खोल दिए।

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