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ऑनलाइन गेमिंग: मनोरंजन से लत और लत से त्रासदी तक

05 Feb 2026



- डॉ. सत्यवान सौरभ


गाजियाबाद में तीन सगी बहनों की सामूहिक आत्महत्या की खबर केवल एक अपराध समाचार नहीं है, बल्कि यह हमारे समय की सबसे भयावह सामाजिक सच्चाइयों में से एक का आईना है। नौवीं मंज़िल से कूदकर जान देने की यह घटना दिल दहला देने वाली है क्योंकि इसके पीछे कोई तात्कालिक झगड़ा, आर्थिक तंगी या पारिवारिक हिंसा नहीं बल्कि एक ऐसी अदृश्य दुनिया है, जो चुपचाप बच्चों के मन-मस्तिष्क पर कब्ज़ा कर रही है- ऑनलाइन गेमिंग की दुनिया। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सचमुच अपने बच्चों की दुनिया को समझ पा रहे हैं या हम उन्हें मोबाइल स्क्रीन के हवाले कर निश्चिंत हो बैठे हैं।


डिजिटल युग में तकनीक जीवन को आसान बनाने का माध्यम बनी है लेकिन उसी तकनीक का अनियंत्रित उपयोग अब समाज के लिए एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। ऑनलाइन गेमिंग, जो कभी मनोरंजन, एकाग्रता और रणनीतिक सोच का साधन मानी जाती थी, आज कई मामलों में बच्चों और किशोरों के लिए मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विनाश का कारण बन रही है। खासकर कोरोना काल के बाद, जब ऑनलाइन शिक्षा और घर में बंद जीवन ने बच्चों को मोबाइल और इंटरनेट के और अधिक करीब कर दिया, तब से यह समस्या और गहराई है।


ऑनलाइन गेम्स का मनोविज्ञान बेहद चालाकी से तैयार किया गया है। गेम डिज़ाइनर बच्चों की मानसिक संरचना को समझते हैं- इनाम, लेवल, रैंकिंग, वर्चुअल पहचान, और प्रतिस्पर्धा के ज़रिए उन्हें इस तरह बांधा जाता है कि वे बार-बार उसी दुनिया में लौटें। धीरे-धीरे खेल खेलना एक आदत बनता है, फिर ज़रूरत, और अंततः लत। यह लत शराब या नशे से कम खतरनाक नहीं होती क्योंकि इसमें शरीर नहीं, दिमाग़ जकड़ा जाता है। बच्चा वास्तविक दुनिया से कटने लगता है- उसे परिवार बोझ लगने लगता है, पढ़ाई व्यर्थ लगती है और जीवन के छोटे-छोटे सुख फीके पड़ जाते हैं।


सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस लत के शिकार अधिकतर बच्चे और किशोर होते हैं- वही उम्र, जब व्यक्तित्व निर्माण होता है, भावनात्मक संतुलन विकसित होता है और जीवन को समझने की प्रक्रिया चल रही होती है। इस उम्र में यदि बच्चा आभासी दुनिया में जीने लगे, तो उसकी वास्तविक समस्याओं से जूझने की क्षमता कमजोर हो जाती है। हार-जीत, तनाव, असफलता और रिश्तों की जटिलता से निपटने के बजाय वह ‘एस्केप’ खोजने लगता है—और ऑनलाइन गेम्स उसे यह आसान पलायन उपलब्ध कराते हैं।


गाजियाबाद की घटना में यह तथ्य और अधिक विचलित करता है कि बच्चियाँ दो साल से स्कूल नहीं जा रही थीं और मोबाइल की लत का ज़िक्र सामने आया है। यह सवाल उठता है कि क्या परिवार, स्कूल और समाज- तीनों स्तरों पर निगरानी और संवाद की कमी रही? आज के समय में बच्चों का स्कूल न जाना केवल शैक्षणिक समस्या नहीं बल्कि एक गहरी सामाजिक और मानसिक समस्या का संकेत है। स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं होते बल्कि बच्चों के लिए सामाजिक संपर्क, भावनात्मक सहारा और संरचना प्रदान करते हैं। जब बच्चा इससे कट जाता है, तो वह अपने भीतर सिमटने लगता है।


अक्सर अभिभावक यह मान लेते हैं कि बच्चा घर में है, मोबाइल हाथ में है, तो सुरक्षित है। यही सबसे बड़ा भ्रम है। मोबाइल आज केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि एक पूरी दुनिया है—जिसमें अच्छा भी है और बेहद खतरनाक भी। अभिभावकों की व्यस्तता, आर्थिक दबाव और ‘डिजिटल ही भविष्य है’ जैसी सोच ने बच्चों को समय से पहले एक ऐसे संसार में धकेल दिया है, जिसे वे न समझ पाते हैं और न संभाल पाते हैं। माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद का अभाव इस खतरे को और बढ़ा देता है।


यह भी एक सच्चाई है कि भारतीय समाज में मानसिक स्वास्थ्य को अब भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। बच्चे चुप हैं, अकेले हैं, चिड़चिड़े हैं या अपने कमरे में बंद रहते हैं तो इसे ‘उम्र का असर’ कहकर टाल दिया जाता है। आत्मघाती विचार, अवसाद और चिंता जैसे मुद्दों पर बात करना अब भी कई परिवारों में वर्जित माना जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि समय रहते की गई एक संवेदनशील बातचीत कई जिंदगियाँ बचा सकती है।


ऑनलाइन गेमिंग के दुष्प्रभाव केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसके सामाजिक प्रभाव भी गंभीर हैं। अत्यधिक गेमिंग से बच्चों में हिंसक व्यवहार, आक्रामकता, सहानुभूति की कमी और सामाजिक रिश्तों से दूरी बढ़ती है। आभासी जीत उन्हें वास्तविक परिश्रम से दूर कर देती है। जब वास्तविक जीवन में चुनौतियाँ आती हैं, तो वे टूट जाते हैं, क्योंकि उन्होंने संघर्ष करना सीखा ही नहीं होता। यही टूटन कई बार आत्मघाती कदम का कारण बनती है।


यह कहना भी उचित नहीं होगा कि हर ऑनलाइन गेम या हर तकनीकी का उपयोग बुरा है। समस्या तकनीक में नहीं, उसके अनियंत्रित और गैर-जिम्मेदार उपयोग में है। यदि बच्चे सीमित समय के लिए उम्र के अनुरूप और अभिभावकों की निगरानी में गेम खेलें तो यह मनोरंजन और सीख का साधन भी हो सकता है। लेकिन जब गेमिंग जीवन का केंद्र बन जाए, तो खतरे की घंटी बज जानी चाहिए।


समाधान के स्तर पर हमें बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। सबसे पहली जिम्मेदारी परिवार की है। अभिभावकों को बच्चों के साथ समय बिताना होगा, उनके डिजिटल व्यवहार को समझना होगा और डर या दंड की बजाय संवाद का रास्ता अपनाना होगा। मोबाइल देना आसान है, लेकिन बच्चे का मन पढ़ना कठिन—और यही कठिन काम आज सबसे ज़रूरी है। बच्चों के लिए स्पष्ट डिजिटल नियम, स्क्रीन टाइम की सीमा और वैकल्पिक गतिविधियाँ—जैसे खेल, किताबें, कला और सामाजिक मेलजोल—अनिवार्य किए जाने चाहिए।


स्कूलों की भूमिका भी बेहद अहम है। केवल पाठ्यक्रम पूरा करना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल साक्षरता, मानसिक स्वास्थ्य, और ऑनलाइन खतरों पर नियमित कक्षाएँ और परामर्श सत्र होने चाहिए। शिक्षकों को यह प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि वे बच्चों के व्यवहार में आने वाले सूक्ष्म बदलावों को पहचान सकें। स्कूल और अभिभावकों के बीच निरंतर संवाद आज की आवश्यकता है।


सरकार और नीति-निर्माताओं की जिम्मेदारी भी इससे कम नहीं है। बच्चों और किशोरों के लिए ऑनलाइन गेमिंग के स्पष्ट नियम, आयु-आधारित प्रतिबंध, चेतावनी संदेश और लत पैदा करने वाले डिज़ाइन पर नियंत्रण आवश्यक है। कई देशों में ‘डिजिटल वेलबीइंग’ को नीति का हिस्सा बनाया गया है—भारत को भी इस दिशा में गंभीर कदम उठाने होंगे। तकनीकी कंपनियाँ केवल मुनाफ़े के बारे में न सोचें, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी निभाएँ।


मीडिया और समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। सनसनीखेज़ खबरों से आगे बढ़कर, हमें मूल कारणों पर चर्चा करनी होगी। ऑनलाइन गेमिंग को महज़ एक ट्रेंड या समय काटने का साधन बताकर उसके खतरों को हल्के में लेना अब संभव नहीं है। यह बच्चों के भविष्य और समाज के मानसिक स्वास्थ्य का सवाल है।


गाजियाबाद की तीन बहनों की मौत हमें एक कठोर सच्चाई से रूबरू कराती है कि अगर अब भी हम नहीं चेते तो ऐसी त्रासदियाँ दोहराई जाएँगी। यह समय दोषारोपण का नहीं बल्कि जिम्मेदारी स्वीकार करने का है। परिवार, स्कूल, समाज, सरकार और तकनीकी कंपनियाँ- सभी को मिलकर बच्चों के लिए एक सुरक्षित, संतुलित और संवेदनशील डिजिटल वातावरण बनाना होगा।


अंततः, हमें यह याद रखना होगा कि कोई भी गेम, कोई भी आभासी जीत, किसी बच्चे की ज़िंदगी से बड़ी नहीं हो सकती। मनोरंजन जीवन का हिस्सा होना चाहिए, जीवन का विकल्प नहीं। बच्चों को मोबाइल से नहीं, रिश्तों से जोड़ना होगा; स्क्रीन से नहीं, संवेदनाओं से जोड़ना होगा। क्योंकि एक छोटी-सी अनदेखी, किसी परिवार के लिए जीवनभर का शून्य बन सकती है और यह शून्य किसी भी तकनीकी प्रगति से नहीं भरा जा सकता।


(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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