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बोरी की चटाइयों से विश्व मंच तक पहुंचे जाम्बिया के शिक्षक चितुला अल्बर्ट, योगासन को दिलाई नई पहचान

09 Jun 2026



अहमदाबाद, 09 जून (एजेंसी)। ज़ाम्बिया के शिक्षक चितुला अल्बर्ट ने शायद ही सोचा होगा कि उनका छोटा-सा प्रयास एक दिन विश्व मंच तक पहुंचेगा, लेकिन आज उनकी पहल न केवल ज़ाम्बिया में योगासन को नई पहचान दिला रही है, बल्कि अफ्रीका में इस पारंपरिक भारतीय विधा के विस्तार की मिसाल भी बन चुकी है। पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप के दौरान अहमदाबाद का ईकेए एरिना इसी बदलाव की कहानी का गवाह बना, जहां ज़ाम्बिया सहित कई अफ्रीकी देशों के खिलाड़ियों ने हिस्सा लेकर यह दिखाया कि योग अब सीमाओं से परे एक वैश्विक खेल पहचान बना रहा है।


एक भारतीय प्रेरणा से शुरू हुई यात्रा


चितुला अल्बर्ट का योग से परिचय 1980 के दशक के अंत में हुआ था। उस समय उनके क्षेत्र में रहने वाले भारतीय मूल के एक व्यक्ति ने उन्हें योग की शुरुआती क्रियाएँ सिखाईं। यही अनुभव आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बन गया। शिक्षक और बाद में उप-प्रधानाचार्य बनने के बाद अल्बर्ट ने महसूस किया कि योग बच्चों के स्वास्थ्य, अनुशासन और मानसिक संतुलन को बेहतर बनाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। उन्होंने अपने स्कूल में छोटे स्तर पर योग सत्र शुरू किए और इसे शारीरिक शिक्षा गतिविधियों का हिस्सा बनाया। हालांकि, शुरुआत आसान नहीं थी। योग को स्थानीय स्तर पर संदेह की नजर से देखा जाता था और कई लोग इसे फिटनेस के बजाय धार्मिक अभ्यास मानते थे। संसाधनों की भी भारी कमी थी।


अभ्यास के लिए योगा मैट तक उपलब्ध नहीं थीं, इसलिए अल्बर्ट ने पुराने बोरे और कपड़ों को सिलकर अस्थायी चटाइयां तैयार कीं। पूरे क्षेत्र तक पहुंची पहल योग अभियान की शुरुआत केवल पांच छात्रों से हुई। धीरे-धीरे बच्चों की रुचि बढ़ी और यह पहल स्कूल की सीमाओं से बाहर निकलने लगी। अल्बर्ट ने डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते हुए नियमित रूप से योग सत्रों का प्रसारण शुरू किया, जिससे ज़ाम्बिया के अलग-अलग हिस्सों के छात्र भी इससे जुड़ने लगे।


वर्ष 2020 इस यात्रा का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जब भारतीय मूल की एक महिला ने स्कूल के बच्चों के लिए योगा मैट उपलब्ध कराईं। यह सहयोग उस आंदोलन के लिए निर्णायक साबित हुआ, जो अब तक सीमित संसाधनों के सहारे आगे बढ़ रहा था।


सरकारी मान्यता और संगठित विकास


आने वाले वर्षों में योगासन की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई। अधिक स्कूल जुड़ते गए और इसे खेल के रूप में विकसित करने की दिशा में काम शुरू हुआ। भारतीय समुदाय के सहयोग से एक संस्थागत ढाँचा तैयार किया गया और वर्ष 2022 में देश की योग संस्था को आधिकारिक मान्यता मिली। इसके बाद 2024 से ज़ाम्बिया में नियमित राष्ट्रीय योगासन चैंपियनशिप आयोजित होने लगी। वर्ष 2025 की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में सरकारी अधिकारियों की भागीदारी ने इस पहल को और मजबूती दी।


विश्व चैंपियनशिप में दिखी बदलाव की तस्वीर


अहमदाबाद में आयोजित पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप में ज़ाम्बिया का 18 सदस्यीय दल पहुंचा। टीम के छह खिलाड़ियों की यात्रा और भागीदारी का खर्च भारतवंशी परिवारों ने वहन किया। ज़ाम्बिया ने प्रतियोगिता में कुल छह पदक जीते। युवा खिलाड़ी निया विजयवर्जिया ने तीन रजत पदक जीतकर विशेष पहचान बनाई। यह आयोजन केवल ज़ाम्बिया तक सीमित नहीं रहा। रवांडा, नाइजर, चाड, सिएरा लियोन, लेसोथो, युगांडा और तंजानिया जैसे देशों के खिलाड़ी भी इसमें शामिल हुए। इनमें से कई प्रतिभागी भारत में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान योगासन से जुड़े थे। नाइजर के प्रतिनिधि महामादू सनूसी इस्सिया ने बताया कि उनके देश में भी योग दिवस से जुड़े कार्यक्रम लगातार लोकप्रिय हो रहे हैं और अब प्रतियोगिताएँ भी आयोजित होने लगी हैं।


भारत की परंपरा से वैश्विक खेल तक


विश्व योगासन चैंपियनशिप ने यह स्पष्ट कर दिया है कि योग केवल स्वास्थ्य और जीवनशैली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक प्रतिस्पर्धी खेल के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। चितुला अल्बर्ट की कहानी इस बदलाव का प्रतीक बन चुकी है—जहाँ बोरी के टुकड़ों से बनी चटाइयों पर शुरू हुआ अभ्यास आज विश्व मंच तक पहुंच चुका है। और इस पूरी यात्रा में भारत की सांस्कृतिक विरासत, भारतीय समुदायों का सहयोग और वैश्विक जुड़ाव एक मजबूत आधार बनकर सामने आया है।

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