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नेपाल से 800 कांवड़ियों का विशाल दल हरिद्वार पहुंचा

11 Feb 2026



-हरकी पैड़ी से गंगाजल भरकर महाशिवरात्रि पर सहसनाथ महादेव में करेंगे जलाभिषेक


हरिद्वार, 11 फ़रवरी (हि.स.)। शारदीय कांवड़ मेले में पड़ोसी राज्यों से ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देश नेपाल से भी शिवभक्त गंगाजल और कांवड़ लेने हरिद्वार पहुंच रहे हैं। नेपाल से कांवड़ियों का एक दल गंगा जल लेने हरिद्वार पहुंचा। इस दल में करीब 800 कांवड़िए शामिल नेपाल से आए सभी कांवड़ियों ने बुधवार को हरिद्वार हरकी पैड़ी से गंगाजल भरा। इसके बाद वो लंबी दूरी तय करके महाशिवरात्रि के पर्व पर नेपाल पहुंचेंगे। इस गंगाजल से सभी भक्त नेपाल के बारा जिले में स्थित सहसनाथ महादेव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।हरिद्वार में शारदीय कांवड़ मेले में हरकी पैड़ी समेत तमाम गंगा घाटों पर श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम दिखाई दे रहा है। यहां पड़ोसी राज्यों ही नहीं बल्कि पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में कांवड़िए गंगाजल लेने पहुंचे।


नेपाल के बारा जिले से करीब 800 कांवड़ियों का विशाल दल हरिद्वार पहुंचा, जो हरकी पैड़ी से विधि विधान के साथ गंगाजल भरकर लंबी यात्रा करेगा। नेपाल से आए कांवड़ियों ने बताया कि यह यात्रा आठ पीढ़ियों से चली आ रही है, जो आस्था का प्रतीक मानी जाती हदल में शामिल सदस्य अनिल कुमार मंडल ने बताया कि उनके दल के सभी सदस्य बारा हजारी कापड़ा कावरसारा समुदाय से जुड़े हैं। समुदाय के लोगों के अनुसार, उनकी आठ पीढ़ियां लगातार शारदीय कांवड़ यात्रा करती आ रही हैं। इस यात्रा का उद्देश्य अपने देश नेपाल सहित संपूर्ण विश्व में शांति स्थापित करना हउन्होंने बताया दल में शामिल सभी श्रद्धालु एक माह पहले ही सांसारिक सुविधाओं से दूर रहकर संन्यास जीवन का पालन शुरू कर देते हैं। इसके बाद सामूहिक रूप से नेपाल से भारत के विभिन्न तीर्थ मार्गों से होते हुए हरिद्वार पहुंचते हैं। कई सदस्य प्रयागराज, काशी और उज्जैन जैसे प्रमुख शिवधामों की यात्रा भी करते हैं, लेकिन शारदीय कांवड़ यात्रा उनके लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखती है।

श्रद्धालुओं ने बताया कि हरिद्वार में रहकर उनके द्वारा यज्ञ, पूजन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। भगवान शिव और मां गंगा में उनकी गहरी आस्था है। यही कारण है कि समुदाय की आठवीं पीढ़ी भी अनवरत कांवड़ यात्रा पर निकली है।दल में शामिल लोगों ने बताया कि कांवड़ यात्रा के दौरान उनका जीवन संन्यासी की तरह हो जाता है, वो संन्यासियों की तरह केवल धोती पहनते हैं। सात्विक आहार विहार के साथ भजन, यज्ञ और नियमित पूजा पाठ की जाती है। खुले आसमान के नीचे रहकर केवल प्रभु का ध्यान लगाते हैं। उन्हें सालभर शारदीय कांवड़ मेले का इंतजार रहता है। उनके दादा परदादा और उनसे भी पूर्व के पूर्वज आठ पीढ़ियों से यह परम्परा निभाते आ रहे हैं।



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