14 Mar 2026
रोहित पारीक पिछले कुछ समय से खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। तेल और गैस के बड़े उत्पादक देशों के बीच बढ़ते टकराव और क्षेत्रीय असुरक्षा के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका गहराती जा रही है। इसका सीधा असर भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों पर पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। कच्चे तेल के मामले में देश लगभग 85 प्रतिशत तक आयात पर निर्भर है, जबकि एलपीजी और प्राकृतिक गैस का भी महत्वपूर्ण हिस्सा विदेशों से आता है। इन आयातों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से ही प्राप्त होता है। ऐसे में यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या समुद्री मार्गों पर खतरा पैदा होता है, तो भारत की ईंधन आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। हालांकि, ईरान ने भारत के ईंधन लदे जहाजों को अपनी सीमा के होर्मुज से सुरक्षित निकालने पर सहमति दी है, लेकिन जहाजों के भारत पहुंचने तक तो संकट बना रहेगा। बड़ी बात यह है कि देश के कई राज्यों में घरेलू गैस आपूर्ति को लेकर संकट देखा जा रहा है। गैस सिलेण्डरों के लिए एजेन्सियों के बाहर लंबी कतारें होने के समाचार आ रहे हैं। होटल-रेस्टारेंट और गैस आधारित उद्योगों के बुरी तरह प्रभावित होने की सूचनाएं साझा हो रही है। हालांकि, सरकारें और प्रशासन अपने स्तर पर इस संकट से पार पाने और आमजन के दिलों में पैदा हुए डर को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आमजन के मन में बन रही संकट की तस्वीर मिट नहीं पा रही है। हाल के दिनों में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खाड़ी क्षेत्र में स्थिति और बिगड़ती है, तो तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इससे भारत में पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। इसके साथ ही गैस आधारित उद्योगों और बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। भारत सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। सरकार ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का निर्माण किया है, ताकि आपातकालीन स्थिति में देश के पास कुछ समय तक ईंधन की उपलब्धता बनी रहे। इसके अलावा सरकार तेल आयात के स्रोतों को भी विविध बनाने की कोशिश कर रही है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को दीर्घकालिक समाधान के तौर पर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन पर तेजी से काम करना होगा। इससे न केवल आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी। हालांकि फिलहाल देश में ईंधन और गैस की आपूर्ति सामान्य बनी हुई है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने भविष्य को लेकर चिंता जरूर बढ़ा दी है। ऐसे समय में सरकार, ऊर्जा कंपनियों और नीति निर्माताओं के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें और किसी भी संभावित संकट से निपटने के लिए ठोस रणनीति तैयार रखें। कुल मिलाकर, खाड़ी देशों के बीच बढ़ता तनाव सिर्फ क्षेत्रीय राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश के लिए यह स्थिति एक चुनौती भी है और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर भी।