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अगली पीढ़ी के सुधारों में विनियमन कम करने की जरूरत: राजीव गौबा

10 Sep 2026

मुंबई, 10 सितंबर (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने गुरुवार को अगली पीढ़ी के सुधारों में विनियमन को कम करने तथा नियमों और कानून को सरल एवं बाधारहित बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने सुधारों के अगले चरण में जमीनी स्तर के बुनियादी सुधारों पर ध्यान देने की जरूरत बताई। गौबा ने अलग-अलग रूप में मौजूद लाइसेंस, मंजूरी, अनुमति और बार-बार नवीनीकरण की व्यवस्था को समाप्त करने की वकालत की।


राजीव गौबा ने मुबई में ग्लोबल फिनटेक सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह बात कही। 'विनियमन से परिवर्तन तक: भारत की अगली पीढ़ी के सुधार ढांचे का निर्माण' विषय पर अनौपचारिक चर्चा में पिछले दशक के सुधारों पर विचार करते हुए गौबा ने कहा कि वस्तु एवं सेवा कर, दिवालियापन एवं दिवालिया संहिता और उदारीकृत विदेशी निवेश व्यवस्था जैसे उपायों ने अर्थव्यवस्था को नया रूप दिया है और उन क्षेत्रों को भी खोल दिया है, जिन्हें कभी निजी उद्यम के लिए वर्जित माना जाता था, जिनमें रक्षा, अंतरिक्ष तथा अब परमाणु ऊर्जा शामिल हैं।


गौबा ने आगे कहा कि अगली पीढ़ी के सुधारों की रूपरेखा "विनियमन" से परिभाषित होनी चाहिए, जिसमें बुनियादी और व्यावहारिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया जाए और लाइसेंस-अनुमोदन-अनुमति तथा बार-बार नवीनीकरण की प्रचलित व्यवस्था को समाप्त किया जाए। उन्होंने अपने संबोधन में कानूनों, विनियमों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की व्यवस्थित समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कई महत्वपूर्ण सुधार राज्यों और नगर निगम सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उन्होंने राज्य और शहर स्तर पर विश्वास-आधारित शासन सिद्धांतों को लागू करने के लिए गठित विनियमन कार्य बल द्वारा किए जा रहे कार्यों की ओर इशारा किया।


पूंजी निवेश के लिए राज्यों को विशेष सहायता योजना और शहरी चुनौती कोष का हवाला देते हुए उन्होंने केंद्र सरकार के दृष्टिकोण को "प्रतिस्पर्धी बढ़त वाला सहकारी संघवाद" बताया, जहां योजना प्रोत्साहन सुधार के लक्ष्यों से जुड़े होते हैं और परियोजनाओं का चयन चुनौती पद्धति के माध्यम से किया जाता है। फिनटेक के विषय पर बोलते हुए गौबा ने इस क्षेत्र में भारत की अभूतपूर्व वृद्धि और वित्तीय समावेशन एवं पहुंच में इसके योगदान पर प्रकाश डाला।


उन्होंने भारत के डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, आधार और यूपीआई से लेकर डिजिलॉकर और खाता एकत्रीकरण ढांचे तक को एक ऐसे मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया, जिसे विश्व अनुकरण कर सकता है। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी-आधारित क्षेत्रों में विनियमन को जनहित की रक्षा और नवाचार को फलने-फूलने देने के बीच एक गतिशील संतुलन बनाए रखना चाहिए। उन्होंने वित्तीय नियामकों के बीच बेहतर समन्वय, सरल और अधिक पूर्वानुमानित अनुपालन प्रक्रियाओं और घर्षण एवं अंतरसंचालनीयता अंतराल को कम करने के निरंतर प्रयासों की आवश्यकता पर भी बल दिया।


गौबा ने निष्पक्ष व्यवहार, पूर्वानुमानित नीति, मजबूत डेटा प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और नवाचार के लिए पर्याप्त अवसर जैसे पहलुओं में निवेशकों का विश्वास बढ़ाकर दीर्घकालिक घरेलू और विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए सरकार के उठाए गए कदमों पर ध्यान दिया। अपने संबोधन के समापन में कहा कि सुधार, शासन की संस्कृति का अभिन्न अंग होना चाहिए, जिसे दीर्घकालिक और रणनीतिक सोच का समर्थन प्राप्त हो। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के प्रधानमंत्री के आह्वान को एक राष्ट्रीय उद्यम के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें सरकार, उद्योग और नागरिक भारत के सुधार और विकास की गति को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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