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वसुधैव कुटुम्बकम् की दिव्य अनुभूति है योग दिवस

20 Jun 2026


डॉ. मोक्षराज


जब हम कहते हैं कि हमारी योग संस्कृति का इतिहास एक सौ छियानवें करोड़ वर्ष पुराना है, तब विशेष मानसिकता वाला भारत विरोधी वर्ग इसे नकार देता है । कुछ पक्षपाती व दुराग्रही विदेशी इतिहासकार डार्विन थ्योरी की आड़ में आरंभिक मनुष्य को असभ्य, अविकसित व पाषाणयुगीन कहकर सत्य पर पर्दा डालते हैं । किंतु जब उन्हें दक्षिण अफ्रीका के केप तट पर चट्टानों में लगभग 1,50,000 वर्ष पुराने जीवाश्मीकृत जूते मिलते हैं, तब इनके मुँह में दही जम जाता है । ये सभ्य मानव के अस्तित्व को कुछ हजार वर्षों में समेटना चाहते थे, इसलिए इन्होंने भारतीय इतिहास में रामायण व महाभारत को काल्पनिक सिद्ध करने के षड्यंत्र किए । हमारी पुरातन संस्कृति की उपेक्षा के साथ ही इन्होंने हमारे महान राष्ट्र को सपेरों व भिखारियों का देश सिद्ध करने के प्रयास किए । जबकि डार्विन थ्योरी से उलट आर्यावर्तीय जन आरंभ से ही योगी, तपस्वी, ऋषि, मुनि, वैज्ञानिक, शिल्पशास्त्री, खगोलविद्, श्रेष्ठ राजा हुए तथा सोना-चाँदी-हीरे-मोती जैसे मूल्यवान रत्नों के जानकार होने के साथ-साथ सामुद्रिक विमान व वायुयानों का प्रयोग करते रहे हैं । उन्हें लाखों प्रकार की वनस्पति व औषधियों का भी आधिकारिक ज्ञान था।

प्रकृति प्रेमी वे आर्यजन नगर, ग्राम, अरण्य, कंदरा, अनुकूल समुद्रतट व नदीतट आदि पर बस्तियाँ बसाकर रहते थे तथा उन कर्मयोगियों की दिनचर्या समस्त प्राणियों के हित में होती थी ।


सबके उपकार की भावना योग से सम्भव-

इन सब उदात्त जीवन मूल्यों के मूल में हमारे पूर्वजों का सर्वहितकारी व विशुद्ध चिंतन ही था । मानव मस्तिष्क में उठने वाले निर्मल विचारों के लिए योग साधना करना अत्यंत उपयोगी रहता है, और क्योंकि चिंतन ही क्रिया में परिणत होता है इसलिए हमारे योगारूढ चिंतन में विश्व का हित ही परम उद्देश्य था । यही कारण रहा कि हमारे नीतिकारों ने लिखा अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसां उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्॥


मानव जाति को एक मंच पर लाने का प्रयोग है, योग दिवस-

जिस दिन भारतीय इतिहास व परंपराओं पर विश्वास कर ईमानदारी के साथ अनुसंधान होने लगेंगे तब धरती के समस्त मानव आर्यों को अपना पूर्वज मानते हुए एक कौटुम्बिक स्वरूप में आ जाएँगे । वस्तुतः यह विश्व योग दिवस सम्पूर्ण मानव जाति को एक मंच पर लाने का अभिनव प्रयोग है।


योग ध्यान में निमग्न पूर्वजों की लंबी श्रृंखला-

पौराणिक ग्रंथों में ध्यान में लीन महर्षि ब्रह्मा, योगनिद्रा में निरत भगवान विष्णु , योग समाधि में लीन नीलकंठ महादेव, प्रभु संकीर्तन करते नारद मुनि, तपस्या करते हुए ध्रुव व भक्त प्रहलाद, समाधिस्थ होकर अन्वेषण करने वाले महर्षि भारद्वाज, महर्षि अगस्त्य, महर्षि विश्वामित्र व अत्रि आदि योग साधना परंपरा के प्राचीन उदाहरण हैं। भारतीय इतिहास जहाँ 1, 8100,000 वर्ष पूर्व श्रीरामचन्द्रजी व माता जानकी व अनुज लक्ष्मण को सरयू नदी के तट पर योग करते हुए दिखाता है वहीं 5200 वर्ष पूर्व लिखा इतिहास ग्रंथ महाभारत अंगिरस घोर के सानिध्य में श्रीकृष्ण व रुक्मिणी को 12 वर्ष तक योग-तप करते हुए व्यक्त करता है।


योग साधना का यह क्रम अमेरिका में महर्षि उद्दालक, अफ़्रीका में महर्षि कण्व, ऑस्ट्रेलिया में महर्षि पुलस्त्य तथा महाभारत काल के बाद भी भारत में महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, गोरखनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, भर्तृहरि तथा आधुनिक युग में महर्षि दयानंद पर्यंत चलता रहा । इन अनेक प्रसिद्ध नामों के अलावा हज़ारों संत साधु योगी-यति गिरि -कंदराओं में योग साधना द्वारा ब्रह्मांड में व्याप्त दिव्य रश्मियों को हृदय में उतारते रहे हैं।


(लेखक प्रसिद्ध योगगुरु एवं जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी अमेरिका में प्रोफेसर रहे हैं)

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