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रक्षा उत्पादन में छलांग के बाद असली सवाल- क्या भारत टेक्नोलॉजी का भी मालिक बन रहा है?

01 Oct 2026

- राकेश मिश्रा


भारत के रक्षा क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। जिस देश को लंबे समय तक रक्षा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में विदेशों से हथियार और सैन्य उपकरण खरीदने पड़ते थे, वही भारत अब तेजी से अपने यहां रक्षा उपकरण बनाने, नई प्रणालियां विकसित करने और उन्हें दूसरे देशों तक पहुंचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस बदलाव की तस्वीर वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों में साफ दिखाई देती है।


भारत का रक्षा उत्पादन बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह 2024-25 के ₹1.54 लाख करोड़ की तुलना में 15.6 प्रतिशत अधिक है। 2020-21 में यही उत्पादन ₹84,643 करोड़ था। रक्षा निर्यात भी बढ़कर ₹38,424 करोड़ तक पहुंच गया है और सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारतीय रक्षा उत्पाद 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं। यह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण बदलाव है लेकिन किसी भी बड़ी उपलब्धि के बाद अगला सवाल उससे आगे का होना चाहिए।


भारत अब कितना हथियार बना रहा है- यह सवाल महत्वपूर्ण है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है कि भारत उन हथियारों के पीछे की कितनी टेक्नोलॉजी खुद बना रहा है? यहीं से भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की अगली कहानी शुरू होती है।


‘भारत में बना’ और ‘भारत ने बनाया’-फर्क समझना जरूरी है। किसी रक्षा उपकरण पर अगर लिखा हो कि वह भारत में बना है, तो इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि उसकी पूरी टेक्नोलॉजी भी भारत की है। किसी उपकरण की असेंबली भारत में हो सकती है। उसके कुछ पार्ट्स भारत में बन सकते हैं। उसका डिजाइन भारत में तैयार हो सकता है। एक स्थिति यह भी हो सकती है कि उसकी मूल टेक्नोलॉजी, डिजाइन, पेटेंट और आगे के अपग्रेड पर भी भारत का पूरा अधिकार हो। ये चारों बातें अलग-अलग हैं।


इसलिए अब रक्षा आत्मनिर्भरता को केवल उत्पादन की मात्रा से नहीं मापा जाना चाहिए। हमें पूछना होगा कि कितना भारत में बना के साथ-साथ कितना भारत ने डिजाइन किया? कितनी टेक्नोलॉजी भारत ने विकसित की? कितने महत्वपूर्ण पार्ट्स भारत में बनते हैं? कितने जरूरी सिस्टम के लिए हमें अभी भी बाहर देखना पड़ता है? और सबसे बड़ा सवाल है कि अगर किसी संकट के समय विदेशी सप्लाई अचानक बंद हो जाए तो क्या भारत अपनी रक्षा प्रणालियों को लंबे समय तक खुद चला और अपग्रेड कर सकता है? यही असली आत्मनिर्भरता की परीक्षा होगी।


सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन यानी सैट-साआव इसका एक अच्छा उदाहरण है। यह हवा से जमीन पर हमला करने वाला एक सटीक-निर्देशित ग्लाइड वेपन है। इसे जगुआर, हॉक और सुखोई-30 एमकेआई जैसे विमान से इस्तेमाल किया जा सकता है। इस प्रणाली को डीआरडीओ ने डिजाइन और विकसित किया है और संबंधित खरीद में 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का प्रावधान है। इसके कुछ महत्वपूर्ण सब-सिस्टम को भी आगे और अधिक स्वदेशी बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है।


यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक बात साफ होती है- आत्मनिर्भरता एक बार हासिल कर लेने वाली चीज नहीं है। यह लगातार आगे बढ़ने वाली प्रक्रिया है। आज अगर किसी हथियार में 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री है तो कल सवाल होना चाहिए कि बाकी 40 प्रतिशत में सबसे महत्वपूर्ण चीजें कौन-सी हैं। कौन-सा पार्ट ऐसा है जिसके बिना पूरा सिस्टम काम नहीं करेगा? कौन-सी टेक्नोलॉजी ऐसी है जिसे संकट के समय बाहर से मंगाना मुश्किल हो सकता है? और कौन-से पार्ट्स भारत में बनाना जरूरी है? यही सोच भारत को सिर्फ निर्माता से आगे ले जाकर टेक्नोलॉजी निर्माता बनाएगी।


भविष्य का युद्ध सिर्फ मिसाइल और टैंक का नहीं होगा युद्ध का तरीका बदल रहा है। भविष्य के युद्ध में केवल टैंक, लड़ाकू विमान, मिसाइल और युद्धपोत ही महत्वपूर्ण नहीं होंगे। सेंसर, रडार तथा सुरक्षित कम्युनिकेशन महत्वपूर्ण होगा। इसके साथ ही उपग्रह से मिलने वाला डेटा, ड्रोन और ड्रोन को रोकने वाली टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, साइबर क्षमता महत्वपूर्ण होगी। इन सबसे ऊपर एआई युद्ध की योजना, निगरानी, लक्ष्य पहचान और निर्णय प्रक्रिया को तेजी से बदल सकता है। इन सबके पीछे माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, सॉफ्टवेयर, सेंसर, बैटरी, विशेष धातु और नई तरह की मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी होगी।


इसका मतलब साफ है कि अगले दौर की सैन्य ताकत केवल इस बात से तय नहीं होगी कि किसी देश के पास कितने हथियार हैं। यह भी तय करेगा कि उन हथियारों को बनाने और लगातार बेहतर करने वाली टेक्नोलॉजी किसके पास है।


एक आधुनिक हथियार प्रणाली को एक बड़ी मशीन की तरह समझिए। उसका मुख्य ढांचा भारत में बना हो सकता है लेकिन अगर उसके किसी छोटे से जरूरी पार्ट की सप्लाई बाहर से आती है और वह पार्ट उपलब्ध नहीं होता तो पूरी मशीन प्रभावित हो सकती है। यह पार्ट कोई इंजन का हिस्सा हो सकता है। कोई सेंसर हो सकता है। रडार का कोई मॉड्यूल हो सकता है। कोई माइक्रोचिप हो सकती है। कोई इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम हो सकता है। कोई खास धातु या विशेष सामग्री हो सकती है। या कोई ऐसा सॉफ्टवेयर हो सकता है, जिसके बिना पूरा सिस्टम सही तरीके से काम न करे। इसलिए रक्षा आत्मनिर्भरता का मतलब अब केवल बड़े हथियारों में आत्मनिर्भर होना नहीं है। भारत को छोटे लेकिन महत्वपूर्ण पार्ट्स और टेक्नोलॉजी में भी आत्मनिर्भर होना होगा। यही भविष्य की असली चुनौती है।


₹1.78 लाख करोड़ के बाद अगली छलांग रिसर्च की होगी। कारखाने उत्पादन बढ़ा सकते हैं लेकिन नई टेक्नोलॉजी रिसर्च से पैदा होती है। 2026-27 में रक्षा मंत्रालय के लिए ₹7,84,678 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसमें ₹2,31,010 करोड़ पूंजीगत खर्च के लिए हैं। पीआरएस के विश्लेषण के अनुसार पूंजीगत खर्च में रिसर्च और डेवलपमेंट की हिस्सेदारी लगभग 7 प्रतिशत है। उसके विश्लेषण में रक्षा क्षेत्र में हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग की सीमित मौजूदगी और रिसर्च एवं डेवलपमेंट से जुड़ी चुनौतियों को भी रेखांकित किया गया है।


भारत ने मिसाइल, अंतरिक्ष, परमाणु विज्ञान, विमानन और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण क्षमताएं विकसित की हैं। लेकिन दुनिया में टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से बदल रही है। इसलिए सवाल यह है कि क्या हमारी रिसर्च की रफ्तार भी उतनी ही तेज है? क्योंकि आज की अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी कुछ वर्षों बाद पुरानी हो सकती है। इसलिए रक्षा क्षेत्र में रिसर्च कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि भविष्य की सैन्य क्षमता की बुनियाद है।


किसी टेक्नोलॉजी का सफल होना केवल लैब में उसका सफल परीक्षण नहीं है। उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब वह सैनिक के काम आती है। इसलिए रक्षा रिसर्च का पूरा चक्र तेज और लगातार चलना चाहिए। रिसर्च → प्रोटोटाइप → टेस्टिंग → सैनिकों का फीडबैक → सुधार → प्रोडक्शन → इस्तेमाल → अपग्रेड। अगर कोई अच्छी टेक्नोलॉजी लैब से निकलने के बाद वर्षों तक प्रक्रिया में अटक जाती है तो दुनिया उससे आगे निकल सकती है।


इसके विपरीत अगर सेना, वैज्ञानिक, उद्योग, स्टार्टअप और विश्वविद्यालय मिलकर काम करें तो नई टेक्नोलॉजी जल्दी उपयोगी सिस्टम में बदल सकती है। यहीं भारत के निजी क्षेत्र और एमएसएमई की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।


बड़ी कंपनियों के साथ हजारों छोटी कंपनियां भी जरूरी है। एक आधुनिक लड़ाकू विमान या मिसाइल के पीछे सैकड़ों तरह के पार्ट्स होते हैं। सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर, कम्युनिकेशन सिस्टम, मशीनिंग, बैटरी, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और सुरक्षा सिस्टम।


इनमें से कई क्षेत्रों में छोटे और मध्यम भारतीय उद्योग बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता केवल कुछ बड़ी कंपनियों पर निर्भर नहीं हो सकती। एक मजबूत रक्षा उद्योग के लिए बड़ी कंपनियों के साथ हजारों छोटे भारतीय टेक्नोलॉजी उद्यमों की जरूरत होगी। बड़ी कंपनी पूरा सिस्टम बना सकती है। लेकिन उसके पीछे सैकड़ों छोटी कंपनियां जरूरी पार्ट्स और टेक्नोलॉजी तैयार कर सकती हैं। यही एक मजबूत रक्षा औद्योगिक व्यवस्था की पहचान होगी।


रक्षा निर्यात बढ़ा—अब टेक्नोलॉजी का निर्यात कितना बढ़ेगा? ₹38,424 करोड़ का रक्षा निर्यात एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन भविष्य में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि भारत ने कितने रुपये का रक्षा सामान निर्यात किया। हमें यह भी देखना होगा कि भारत ने क्या निर्यात किया? क्या भारत केवल रक्षा उपकरण बेच रहा है? या ऐसी टेक्नोलॉजी भी बेच रहा है जिसे भारत ने खुद विकसित किया है? क्या भारतीय सेंसर दूसरे देशों के सैन्य प्लेटफॉर्म पर लगाए जा रहे हैं? क्या भारतीय ड्रोन टेक्नोलॉजी अंतरराष्ट्रीय बाजार में जगह बना रही है? क्या भारतीय रडार और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम की मांग बढ़ रही है? क्या भारतीय सॉफ्टवेयर और एआई आधारित रक्षा प्रणालियां दुनिया के बाजार में पहुंच रही हैं? अगर भारत ऐसा कर पाता है तो रक्षा निर्यात का अर्थ केवल व्यापार नहीं रहेगा। यह भारतीय टेक्नोलॉजी की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण भी बनेगा।


भारत ने यह दिखा दिया है कि वह बड़े पैमाने पर रक्षा उत्पादन बढ़ा सकता है। अब अगला चरण यह दिखाने का है कि वह कितनी निर्णायक टेक्नोलॉजी खुद बना सकता है। इसलिए आने वाले वर्षों में कुछ सवाल महत्वपूर्ण होंगे कितनी रक्षा प्रणालियों का मूल डिजाइन भारत में हुआ? कितनी मूल टेक्नोलॉजी भारत ने विकसित की? कितने महत्वपूर्ण पार्ट्स भारत में बन रहे हैं? कितने पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकार भारत के पास हैं? कितनी प्रणालियों को भारत बिना बाहरी तकनीकी मदद के अपग्रेड कर सकता है?


सबसे महत्वपूर्ण- अगर किसी संकट के समय विदेशी सप्लाई रुक जाए तो क्या भारत अपनी रक्षा व्यवस्था को लंबे समय तक खुद चला सकता है? यही सवाल आने वाले समय में रक्षा आत्मनिर्भरता की असली गहराई बताएगा। भारत के सामने अब उत्पादन नहीं, टेक्नोलॉजी के स्वामित्व की चुनौती है। भारत का रक्षा उत्पादन ₹1.78 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है। रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ तक पहुंच गया है। भारतीय कंपनियां और भारतीय संस्थान पहले से कहीं अधिक रक्षा प्रणालियों के निर्माण और विकास में दिखाई दे रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण चरण है लेकिन मंजिल अभी इससे आगे है।


भारत को दुनिया का बड़ा रक्षा निर्माता बनने के साथ बड़ा रक्षा टेक्नोलॉजी निर्माता भी बनना होगा। क्योंकि आने वाले समय में असली ताकत केवल हथियारों की संख्या में नहीं होगी। असली ताकत होगी टेक्नोलॉजी बनाने में। टेक्नोलॉजी को नियंत्रित करने में। उसकी बौद्धिक संपदा अपने पास रखने में। जरूरी पार्ट्स खुद बनाने में।


सबसे महत्वपूर्ण बदलती जरूरत के अनुसार अपनी रक्षा प्रणालियों को खुद लगातार बेहतर करने में। भारत ने उत्पादन की बड़ी छलांग लगा दी है। अब अगली छलांग और भी महत्वपूर्ण है- उत्पादन से टेक्नोलॉजी तक। टेक्नोलॉजी से बौद्धिक संपदा तक और बौद्धिक संपदा से तकनीकी स्वामित्व तक। क्योंकि रक्षा आत्मनिर्भरता की अंतिम पहचान यह नहीं होगी कि भारत कितने हथियार बना सकता है। बल्कि यह होगी कि भारत उन हथियारों के पीछे की कितनी निर्णायक टेक्नोलॉजी खुद बना सकता है, उसका मालिक हो सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए उसे लगातार बेहतर कर सकता है। तभी ‘भारत में बना’ केवल उत्पादन का प्रमाण नहीं रहेगा। वह वास्तव में ‘भारत ने बनाया’ की पहचान बनेगा।


(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)