08 Oct 2026
कोलकाता, 08 अक्टूबर (एजेंसी)। कथित तौर पर बांग्लादेशी नागरिक बताए जा रहे एक व्यक्ति को हिरासत में रखने और उसके निर्वासन (डिपोर्टेशन) आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने गुरुवार को राज्य सरकार से तीखा सवाल पूछा। अदालत ने पूछा कि 1970 के दशक में भारत-बांग्लादेश सीमा पार कर कितने लोग आए थे और क्या व्यावहारिक रूप से उन सभी को पूरी तरह वापस भेजना संभव है।
न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने मामले की सुनवाई के दौरान अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएजी) राजदीप मजूमदार से यह सवाल किया। न्यायाधीश ने यह टिप्पणी भी की कि जमीनी हकीकत को समझने के लिए किसी को बांग्लादेश सीमा से सटे जिलों का दौरा करना चाहिए। अदालत साहिदुल शेख नामक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (एफआरआरओ) द्वारा उसे हिरासत में लेने और निर्वासित करने के आदेश को चुनौती दी है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि शेख को बांग्लादेशी नागरिक के रूप में चिह्नित करने का आधार क्या था और उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना उसे दो महीने से अधिक समय तक हिरासत में क्यों रखा गया। अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब शेख के पास आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र मौजूद हैं, तो उसे विदेशी नागरिक कैसे माना गया। इसके जवाब में राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि ये दस्तावेज स्थानीय पंचायत द्वारा जारी किए गए फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर हासिल किए गए थे।
राज्य सरकार के अनुसार, मुर्शिदाबाद जिले के रानीनगर थाने के प्रभारी की रिपोर्ट के आधार पर एफआरआरओ ने यह आदेश दिया था। पुलिस ने अवैध प्रवासी होने के संदेह में शेख को आठ अगस्त को हिरासत में लिया था, जिसकी पुष्टि एफआरआरओ ने 10 अगस्त को की थी। सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार ने दो मई 2026 को अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों और रोहिंग्याओं की पहचान कर उन्हें निर्वासित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिसके तहत विशेष अभियान चलाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जाली दस्तावेजों के आधार पर आधार, वोटर आईडी और पैन कार्ड बनवाना संदेह पैदा करता है और यह निर्वासन का वैध आधार हो सकता है। इसके अलावा, जिन लोगों को शेख अपना परिजन बता रहा था, उन्होंने अधिकारियों से कहा कि वे उसे नहीं पहचानते।
इस पर अदालत ने कहा कि केवल परिजनों द्वारा पहचानने से इनकार कर देने भर से यह साबित नहीं हो जाता कि वह व्यक्ति बांग्लादेशी है। न्यायमूर्ति ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल को एक होल्डिंग सेंटर में रखा गया है और मामला लंबित होने के कारण अभी तक उसे निर्वासित नहीं किया गया है। वहीं, राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि इस मामले की सुनवाई उपयुक्त क्षेत्राधिकार वाली दूसरी पीठ द्वारा की जानी चाहिए। इसके बाद न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने याचिका को अपनी अदालत से अवमुक्त करते हुए निर्देश दिया कि इसे आगामी 14 अक्टूबर को उचित पीठ के समक्ष पेश किया जाए। साथ ही अदालत ने यह भी आदेश दिया कि जब तक उचित पीठ इस मामले की सुनवाई नहीं करती, तब तक शेख के खिलाफ निर्वासन आदेश स्थगित (अमान्य) रहेगा।