06 Nov 2026
शिमला, 06 नवंबर (एजेंसी)। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बिलासपुर की एक ट्रक परिवहन सहकारी सोसायटी के चार पुराने सदस्यों को मतदान करने, बैठकों में हिस्सा लेने और चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार देने के सरकारी आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सोसायटी में पहले से सदस्य के रूप में दर्ज लोगों को बिना नोटिस और उचित कारण के नाममात्र का सदस्य घोषित कर उनके अधिकार नहीं छीने जा सकते। हाईकोर्ट ने सोसायटी की याचिका खारिज करते हुए उसे चारों सदस्यों को उनके अधिकार देने के सरकारी आदेश को तुरंत लागू करने का निर्देश दिया है।
किरतपुर में कारोबार करने पर छीने सदस्यता के अधिकार
न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की अदालत ने सुनाए आदेश में कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि चारों निजी प्रतिवादी सोसायटी के पुराने सदस्य हैं और बिलासपुर जिले के स्थायी निवासी हैं। सोसायटी ने उनके किरातपुर (पंजाब) में कारोबार करने के आधार पर उन्हें नाममात्र का सदस्य घोषित कर दिया था। इसके बाद उनके ट्रकों को भी गट्टा नंबर-1 से हटाकर गट्टा नंबर-2 में डाल दिया गया। इससे उनके मतदान, बैठकों में भागीदारी और चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने के अधिकार प्रभावित हुए। अदालत ने पाया कि सोसायटी ने इस कार्रवाई से पहले उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया और न ही इसके लिए उचित कारण साबित किए।
1983 में 62 सदस्यों के साथ बनी थी सोसायटी
मामले के अनुसार संबंधित सहकारी सोसायटी का पंजीकरण 14 फरवरी 1983 को 62 सदस्यों के साथ हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य सरकारी और निजी संस्थानों के साथ समझौता कर परिवहन वाहनों के जरिए सामान की ढुलाई करना था। सोसायटी ने एसीसी सीमेंट के बरमाणा कारखाने से हिमाचल प्रदेश और पड़ोसी राज्यों के विभिन्न स्थानों तक सीमेंट पहुंचाने के लिए समझौता किया था।
शुरुआत में सोसायटी की सदस्यता के लिए 18 वर्ष से अधिक आयु, स्वस्थ मानसिक स्थिति, बिलासपुर जिले का सामान्य निवासी होना, अच्छा चरित्र और ट्रक का मालिक होना जैसी शर्तें थीं। एक फरवरी 1993 को सोसायटी ने अपने उपनियमों में बदलाव कर सदस्यता के लिए नई शर्त जोड़ी। इसके अनुसार नया सदस्य बिलासपुर जिले में पीढ़ियों से रहने वाला और वर्ष 1970 से पहले से जिले में जमीन का मालिक होना चाहिए था। वर्ष 1970 के बाद जमीन खरीदने वालों को नाममात्र का सदस्य मानने का प्रावधान किया गया। 20 मार्च 2001 को उपनियमों में एक और बदलाव किया गया, जिसके तहत एक सदस्य के पास दो से अधिक ट्रक नहीं हो सकते थे।
ट्रकों की संख्या बढ़ने पर नए वाहनों की एंट्री पर रोक
सोसायटी में ट्रक को दिया जाने वाला एक विशेष नंबर गट्टा कहलाता है। इसी नंबर और ट्रक के पंजीकरण नंबर के आधार पर सीमेंट ढुलाई का काम आवंटित किया जाता है। वर्ष 2001 से पहले सोसायटी से जुड़े ट्रकों को सामान्य रूप से ढुलाई का काम मिलता था। बाद में सोसायटी के सदस्यों की संख्या 1500 से अधिक और ट्रकों की संख्या करीब 2000 तक पहुंच गई। इसके मुकाबले सीमेंट ढुलाई का काम नहीं बढ़ा। ऐसे में नए ट्रकों को सोसायटी से जोड़ने पर रोक लगाने की जरूरत महसूस हुई।
सोसायटी ने 28 मई 2001 को हुई बैठक में नए ट्रकों के पंजीकरण पर पूरी तरह रोक लगा दी। इसके बाद 20 अप्रैल 2003 को आम सभा ने भी इस रोक को जारी रखने का सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया। उस समय सोसायटी से 2032 ट्रक जुड़े हुए थे। रोक से पहले पंजीकृत ट्रकों को सोसायटी के रजिस्टर में दर्ज कर गट्टा नंबर दिए गए थे। इन्हीं नंबरों के आधार पर ट्रकों को सीमेंट ढुलाई का काम मिलता था।
सरकार की विशेषज्ञ समिति ने भी दिए थे सुझाव
मामले में वर्ष 2007 में दायर एक अन्य याचिका विषाल बंसल बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार में हाईकोर्ट ने 15 जून 2016 को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का अंतरिम आदेश दिया था। इस समिति में दो आईएएस अधिकारियों और हिमाचल प्रदेश के सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार को शामिल किया गया था।
समिति को सोसायटी में कारोबार के आवंटन और ट्रकों को जोड़ने की पूरी प्रक्रिया की जांच करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसका उद्देश्य पक्षपात और अनियमितताओं को रोकना था। समिति ने पाया कि सोसायटी में सदस्यों की तुलना में ट्रकों की संख्या अधिक है। हर ट्रक को गट्टा नंबर दिया जाता है और इसी आधार पर रोजाना बारी-बारी से ढुलाई का काम आवंटित होता है।
समिति ने सुझाव दिया था कि भविष्य में नए ट्रक जोड़ने की जरूरत पड़ने पर सभी पात्र लोगों से व्यापक प्रचार के जरिए आवेदन मांगे जाएं। जिन मौजूदा सदस्यों के पास केवल एक ट्रक है, उन्हें दूसरे ट्रक के लिए भी आवेदन करने का अवसर दिया जाए। यदि उपलब्ध ट्रकों की संख्या से अधिक आवेदन आते हैं तो सहायक पंजीयक, सहकारी समितियां, बिलासपुर की अध्यक्षता में आवेदकों की मौजूदगी में लॉटरी के जरिए चयन किया जाए।
चारों सदस्य पहले से सोसायटी में थे दर्ज
मौजूदा विवाद में शामिल चारों लोगों का कहना था कि उनके पिता सोसायटी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे और उनके जीवनकाल में ही सोसायटी से जुड़े ट्रक खरीदे गए थे। इनमें से दो सदस्य वर्ष 1990 में और अन्य दो वर्ष 1996 और 1994 में सोसायटी में दर्ज हुए थे। उनका कहना था कि वे बिलासपुर जिले के निवासी और कृषि भूमि के मालिक हैं। किरातपुर में कारोबार करने से उन्हें हिमाचल में सोसायटी के माध्यम से ट्रक चलाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर सोसायटी ने अदालत में दलील दी कि उसके उपनियमों के अनुसार सदस्य का बिलासपुर जिले का सामान्य निवासी होना जरूरी है। चारों लोग किरातपुर में कारोबार कर रहे थे, इसलिए उन्हें नाममात्र का सदस्य बनाए रखने का निर्णय गलत नहीं था।
सदस्यता के दस्तावेजों को हाईकोर्ट ने माना अहम
हाईकोर्ट ने पाया कि चारों लोगों के सदस्यता पहचान पत्र, नामांकन रजिस्टर, सदस्यता संख्या और कृषि प्रमाणपत्र यह साबित करते हैं कि वे बिलासपुर जिले के स्थायी निवासी हैं। अदालत के अनुसार वे वर्ष 2001 में नए सदस्य बनने का दावा नहीं कर रहे थे, बल्कि पहले से दर्ज सदस्यता के अधिकार बहाल करने की मांग कर रहे थे। सोसायटी उनके पहले से सदस्य होने के तथ्य को गलत साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सकी।
अदालत ने कहा कि चारों सदस्य पहले से सोसायटी में नामांकित थे और संशोधित उपनियमों के तहत भी सदस्यता के पात्र हैं। ऐसे में संयुक्त पंजीयक (विपणन), सहकारी समितियों की ओर से 11 अप्रैल 2023 को पारित आदेश को सहकारिता विभाग के संयुक्त सचिव ने 22 दिसंबर 2025 को सही तरीके से पलटा था।
हाईकोर्ट ने संयुक्त सचिव (सहकारिता) के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई और उसे बरकरार रखा। इसके साथ ही सोसायटी की याचिका खारिज कर दी और सरकारी आदेश को तुरंत पूरी तरह लागू करने का निर्देश दिया। लंबित आवेदनों का भी निपटारा कर दिया गया।