07 Oct 2026
नई दिल्ली, 07 अक्टूबर (हि.स.)। सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना विवाद मामले पर सुनवाई के दौरान बुधवार को एकनाथ शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि शिवसेना के 2011 के संविधान के बाद कोई भी संविधान कभी निर्वाचन आयोग को सौंपा गया था। मामले पर कल भी सुनवाई होगी।
कौल ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने खुद दो आदेशों में कहा है कि उसके पास पार्टी का जो एकमात्र संविधान मौजूद था, वह 2011 का संविधान ही था, जिसे निर्वाचन आयोग को सौंपा गया था। कौल ने दलील दी कि निर्वाचन आयोग ने खुद अपने दो आदेशों में यह स्पष्ट किया है कि उसके पास पार्टी का जो एकमात्र वैध संविधान रिकॉर्ड में मौजूद था, उसी के आधार पर विचार किया गया।
कौल ने कहा कि उद्धव ठाकरे गुट का यह कहना गलत है कि निर्वाचन आयोग ने शिवसेना के संविधान के आधार पर फैसला नहीं दिया। उन्होंने कहा कि अयोग्यता की अर्जी दाखिल करना और निर्वाचन आयोग का फैसला दोनों अलग-अलग कानूनी मसले हैं। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि निर्वाचन आयोग अपना फैसला करने से पहले अयोग्यता पर लोकसभा के स्पीकर के फैसले का इंतजार करे।
इससे पहले 6 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने सांसदों और विधायकों की राय के आधार पर फैसला किया है, जो सही है। इस पर न्यायाधीश जॉयमाल्य बागची ने पूछा कि क्या शिवसेना का धनुष बाण चुनाव चिह्न उन सांसदों-विधायकों को मिलना चाहिए, जिनके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही चल रही है? इस पर कौल ने उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों का हवाला दिया, जिसमें बहुमत के आधार पर पार्टी सिम्बल आवंटित किए गए।
इसके पहले सुनवाई के दौरान शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट की ओर से कहा गया था कि निर्वाचन आयोग की ओर से एकनाथ शिंदे गुट को शिवसेना नाम और धनुष बाण का चिह्न आवंटित करने का फैसला गैरकानूनी था। निर्वाचन आयोग के फैसले ने पार्टी के लोकतंत्र को कमतर आंकते हुए मूल पार्टी से अलग हुए विधायकों को इनाम दे दिया।
उद्धव गुट की ओर से कहा गया था कि विधायक दल में बहुमत का ये मतलब नहीं है कि उनका पूरी पार्टी और संगठन पर कब्जा होगा। निर्वाचन आयोग द्वारा बागी गुट को मान्यता देने से मुख्य पार्टी के सदस्यों और संगठन के प्रतिनिधियों की आवाज को दबा दिया गया। सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट की ओर से कहा गया कि उनके पास ही पार्टी संगठन और विधायकों के बीच वास्तविक बहुमत है और निर्वाचन आयोग का फैसला कानून को ध्यान में रखकर किया गया है।