02 Oct 2026
नई दिल्ली, 2 अक्टूबर (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश और पंजाब में संगठनात्मक नेतृत्व में बड़ा बदलाव किया है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी (यूपीसीसी) की कमान विधायक आराधना मिश्रा 'मोना' को सौंप दी है। सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष तथा देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इसके साथ ही कांग्रेस विधायक दल के नेता की जिम्मेदारी चौधरी वीरेंद्र सिंह को सौंपी गई है। पार्टी ने निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के योगदान की सराहना की है। दूसरी ओर, पंजाब में पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान और जालंधर कैंट से विधायक परगट सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। वह अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की जगह लेंगे, जिन्होंने शुक्रवार को पद से इस्तीफा दिया।
दोनों राज्यों में यह बदलाव ऐसे समय हुआ है, जब कांग्रेस के सामने 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी के साथ संगठन को मजबूत करने और आंतरिक चुनौतियों से निपटने की जिम्मेदारी है। उत्तर प्रदेश में पार्टी नेतृत्व ने प्रदेश संगठन के साथ विधायक दल की कमान में भी बदलाव किया है। पंजाब में प्रदेश अध्यक्ष बदलने का फैसला लंबे समय से जारी संगठनात्मक मतभेदों और गुटीय खींचतान की खबरों के बीच आया है।
उत्तर प्रदेश में नेतृत्व की नई व्यवस्था
उत्तर प्रदेश में आराधना मिश्रा 'मोना' को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना इस फेरबदल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। वह प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट से लगातार तीन बार विधायक चुनी गई हैं। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी हैं। 2014 के उपचुनाव, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने जीत दर्ज की। प्रदेश अध्यक्ष बनने से पहले वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस विधायक दल की नेता थीं।
उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद विधायक दल के नेता का पद रिक्त हुआ, जिसे चौधरी वीरेंद्र सिंह की नियुक्ति से भरा गया है। इस तरह पार्टी ने संगठन और विधानसभा में नेतृत्व की जिम्मेदारियां अलग-अलग नेताओं को सौंप दी हैं। यह व्यवस्था प्रदेश में संगठनात्मक गतिविधियों और विधानसभा के भीतर पार्टी की भूमिका को समानांतर रूप से आगे बढ़ाने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण है।
सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाना भी इस नई टीम का उल्लेखनीय पहलू है। उनके साथ देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया गया है। अलग-अलग नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर पार्टी ने प्रदेश संगठन में व्यापक नेतृत्व ढांचा तैयार किया है। हालांकि, इस टीम की वास्तविक उपयोगिता इस बात से तय होगी कि वह प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों और सामाजिक समूहों तक पार्टी की पहुंच कितनी बढ़ा पाती है।
अजय राय अगस्त 2023 से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनके कार्यकाल में कांग्रेस ने विपक्षी गठबंधन के साथ मिलकर 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में छह सीटें जीती थीं। समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस ने 2019 की तुलना में अपने प्रदर्शन में सुधार दर्ज किया था। अब नए नेतृत्व के सामने उस राजनीतिक आधार को विधानसभा चुनाव तक बनाए रखने और संगठन को अपने दम पर अधिक सक्रिय बनाने की चुनौती होगी।
पंजाब में परगट सिंह को क्यों मिली कमान?
पंजाब में परगट सिंह की नियुक्ति भी 2027 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर महत्वपूर्ण है। वह भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान और ओलंपियन रहे हैं। खेल के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के बाद राजनीति में आए परगट सिंह जालंधर कैंट से विधायक हैं। वह पंजाब सरकार में शिक्षा और खेल मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है।
परगट सिंह की नियुक्ति अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के इस्तीफे के बाद हुई है। वड़िंग चार साल से अधिक समय तक पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। उन्होंने शुक्रवार को राहुल गांधी से मुलाकात के बाद अपना इस्तीफा सौंपा। उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसे अपना फैसला बताया, हालांकि उनके बयान और प्रदेश कांग्रेस में चल रही खींचतान के कारण नेतृत्व परिवर्तन को लेकर राजनीतिक चर्चाएं भी तेज हुईं।
पंजाब कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी सहित कई वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग राजनीतिक समूहों और नेतृत्व को लेकर मतभेदों की खबरें आती रही हैं। पार्टी के पंजाब प्रभारी सचिन पायलट ने हाल के दिनों में राज्य के नेताओं और संगठन के पदाधिकारियों से बातचीत कर फीडबैक लिया था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, संगठनात्मक स्थिति और गुटीय मतभेदों को दूर करने की जरूरत भी नेतृत्व परिवर्तन के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण रही है।
परगट सिंह के सामने सबसे बड़ी संगठनात्मक चुनौती विभिन्न गुटों के बीच समन्वय स्थापित करने की होगी। उन्हें ऐसे समय कमान मिली है, जब कांग्रेस को आम आदमी पार्टी की सरकार के खिलाफ विपक्ष की भूमिका निभाने के साथ अपने संगठन को भी चुनाव के लिए तैयार करना है।
दोनों राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक चुनौतियां
उत्तर प्रदेश और पंजाब में नेतृत्व परिवर्तन के पीछे परिस्थितियां अलग हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अपना संगठनात्मक विस्तार करना है। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन से मिले राजनीतिक लाभ को 2027 के विधानसभा चुनाव में किस तरह आगे बढ़ाया जाए, यह नए नेतृत्व के सामने अहम सवाल होगा। प्रदेश में पार्टी का परंपरागत जनाधार सीमित होने के कारण उसे नए सामाजिक और राजनीतिक समूहों तक पहुंच बनानी होगी।
आराधना मिश्रा को अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने एक महिला और अनुभवी विधायक को संगठन की कमान दी है। इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष तथा देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाने से प्रदेश संगठन में अलग-अलग क्षेत्रों और राजनीतिक पृष्ठभूमियों के प्रतिनिधित्व को स्थान मिला है। हालांकि, इन नियुक्तियों का चुनावी प्रभाव संगठन की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व के साथ तालमेल और बूथ स्तर तक पहुंच पर निर्भर करेगा।
पंजाब में स्थिति कुछ अलग है। वहां कांग्रेस के सामने सत्ता में वापसी की चुनौती के साथ पार्टी के भीतर एकजुटता बनाए रखना भी जरूरी है। परगट सिंह को संगठन की कमान सौंपने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह वरिष्ठ नेताओं और अलग-अलग गुटों को एक मंच पर लाने में कितने सफल होते हैं। प्रदेश में आम आदमी पार्टी के साथ राजनीतिक मुकाबले के बीच कांग्रेस के लिए अपना स्पष्ट राजनीतिक एजेंडा और संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना अहम होगा।
चुनाव से पहले संगठनात्मक परीक्षा
कांग्रेस का यह फेरबदल बताता है कि पार्टी ने 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले दोनों राज्यों में नेतृत्व के स्तर पर नए प्रयोग किए हैं। उत्तर प्रदेश में जहां संगठन और विधायक दल की जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण किया गया है, वहीं पंजाब में प्रदेश अध्यक्ष बदलकर नई नेतृत्व व्यवस्था बनाई गई है। लेकिन केवल पदाधिकारियों के बदलाव से चुनावी सफलता सुनिश्चित नहीं होती। नए नेतृत्व को कार्यकर्ताओं में विश्वास पैदा करना, स्थानीय स्तर पर गुटीय मतभेद कम करना, संगठनात्मक ढांचे को सक्रिय करना और जनता के मुद्दों पर प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभानी होगी। दोनों राज्यों में नए प्रदेश अध्यक्षों और उनकी टीमों के सामने यही असली परीक्षा होगी। आने वाले महीनों में उनके कामकाज से स्पष्ट होगा कि कांग्रेस का यह संगठनात्मक फेरबदल चुनावी तैयारियों को किस दिशा में ले जाता है।