03 Oct 2026
एशियाई खेलों का औपचारिक समापन रविवार को होगा लेकिन भारतीय स्पर्धाओं का फिलहाल शनिवार को ही समापन हो गया है। जापान के आइची-नागोया में पिछले एक पखवाड़े के दौरान भारतीय खिलाड़ियों ने जिस जज्बे, संघर्ष और आत्मविश्वास का परिचय दिया, उसने देश की खेल संभावनाओं को लेकर नई उम्मीदें जगाई हैं। भारतीय दल ने 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य सहित कुल 85 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया क्रमशः पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। चीन ने 169 स्वर्ण सहित 341, जापान ने 83 स्वर्ण सहित 269 और दक्षिण कोरिया ने 39 स्वर्ण सहित 150 पदक अपने नाम किए। भारत के बाद उज्बेकिस्तान 70 पदकों के साथ पांचवें स्थान पर रहा। यह उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है कि भारतीय खिलाड़ियों ने कई ऐसी खेल विधाओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया, जिनमें देश को लंबे समय से पदक का इंतजार था या जहां कभी कोई पदक नहीं मिला था।
इन खेलों में भारतीय अभियान की सबसे बड़ी विशेषता उसका संघर्ष और आखिरी दिनों में किया गया शानदार पलटवार रहा। शुरुआत में पदकों की रफ्तार अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही, लेकिन जैसे-जैसे प्रतियोगिताएं आगे बढ़ीं, भारतीय खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ता गया। खासकर अंतिम चार दिनों में तीरंदाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती और हॉकी में मिले स्वर्ण पदकों ने भारतीय दल की तस्वीर बदल दी। पुरुष हॉकी टीम ने फाइनल में मलेशिया को 5-1 से हराकर 21वां स्वर्ण दिलाया तो पुरुष क्रिकेट टीम ने पाकिस्तान को 19 रन से पराजित कर देशवासियों को दोहरी खुशी दी। महिला हॉकी टीम ने भी फाइनल में चीन को हराकर स्वर्णिम सफलता हासिल की। 44 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद एशियाई खेलों में महिला हॉकी का स्वर्ण भारत के खाते में आया। यह जीत केवल एक पदक नहीं, बल्कि भारतीय महिला हॉकी के पुनरुत्थान का महत्वपूर्ण संकेत है।
इस बार कुछ उपलब्धियां ऐसी भी रहीं, जिन्हें भारतीय खेल इतिहास में विशेष स्थान मिलेगा। सॉफ्ट टेनिस में जय मीणा ने देश को पहली बार एशियाई खेलों का पदक दिलाया। नौकायन में पुरुष स्किफ स्पर्धा का रजत भारत का इस खेल के इतिहास में पहला एशियाई पदक बना। पुरुष डबल स्कल्स में भी भारत ने पहली बार पदक हासिल किया। महिला गोल्फ में व्यक्तिगत स्वर्ण जीतकर प्रणवी उर्स ने इतिहास रचा। इस स्पर्धा में भारत को पहली बार स्वर्ण मिला, जबकि महिला टीम ने भी रजत पदक हासिल किया। इसी तरह महिला व्यक्तिगत रिकर्व तीरंदाजी में 17 वर्षीय कुमकुम मोहोड़ का स्वर्ण ऐतिहासिक रहा। ग्रेको-रोमन कुश्ती में नितेश सिवाच का रजत पदक भी छह दशक से अधिक समय बाद इस शैली में भारत की उल्लेखनीय सफलता बना। भारत को इस स्पर्धा में पिछला रजत 1962 में मिला था। ये उपलब्धियां बताती हैं कि भारतीय खेल प्रतिभा अब कुछ गिनी-चुनी विधाओं तक सीमित नहीं है।
तीरंदाजी में भारतीय खिलाड़ियों ने विशेष प्रभाव छोड़ा। कंपाउंड और रिकर्व दोनों वर्गों में पुरुषों तथा महिलाओं ने स्वर्ण पदक जीतकर अपनी श्रेष्ठता दिखाई। मुक्केबाजी में लवलीना बोरगोहेन, परवीन हुड्डा और अंकुश ने स्वर्ण जीतकर भारत की ताकत का प्रदर्शन किया। कुश्ती में अमन सहरावत और सुजीत कलकल की स्वर्णिम सफलताओं ने देश की पारंपरिक ताकत को फिर रेखांकित किया। निशानेबाजी में भी भारतीय खिलाड़ियों ने महत्वपूर्ण पदक जीते। वहीं स्क्वाश, नौकायन, नौकायन से जुड़ी विभिन्न स्पर्धाओं, नौकायन के अतिरिक्त नौकायन-पारंपरिक खेलों, टेबल टेनिस, कुराश और मिश्रित मार्शल आर्ट्स जैसी विधाओं में भी भारतीय खिलाड़ियों ने पदक तालिका में योगदान दिया। क्रिकेट और कबड्डी में महिला तथा पुरुष दोनों टीमों का स्वर्ण जीतना भी भारतीय खेलों की व्यापकता को दर्शाता है।
हालांकि, उपलब्धियों के उत्साह में एक तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वर्ष 2022 के हांगझोऊ एशियाई खेलों में भारत ने 107 पदक जीतकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था। उस समय खाते में 28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 कांस्य पदक आए थे। इस बार कुल पदकों की संख्या 85 रही और स्वर्ण पदक भी सात कम मिले। इसलिए इसे पिछले संस्करण से बेहतर प्रदर्शन कहना उचित नहीं होगा। लेकिन पदकों की संख्या से इतर खेलों में विस्तार, नए खिलाड़ियों का उभार और पहली बार मिली सफलताएं इस अभियान के महत्वपूर्ण पक्ष हैं। चौथा स्थान बरकरार रखना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, खासकर तब जब एशिया में चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी खेल शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार कठिन हो रही है।
इन परिणामों से भविष्य के लिए कई सबक भी निकलते हैं। भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन उसे पहचानने, तराशने और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। छोटे शहरों, गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले खिलाड़ियों को आधुनिक प्रशिक्षण, खेल विज्ञान, पोषण, बेहतर उपकरण और आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध करानी होगी। पदक जीतने के बाद सम्मान और पुरस्कार देना पर्याप्त नहीं है। खिलाड़ियों को उनके पूरे करियर के दौरान सुविधाएं और संस्थागत सहयोग मिलना चाहिए। जिन खेलों में पहली बार पदक मिले हैं, वहां इस सफलता को संयोग नहीं, बल्कि मजबूत आधार बनाने का अवसर समझा जाना चाहिए।
आखिरकार, किसी देश की खेल शक्ति का आकलन केवल एक प्रतियोगिता में मिले पदकों से नहीं होता। असली कसौटी यह है कि क्या वह सफलता आने वाले वर्षों में भी दोहराई जा सकती है। एशियाई खेलों ने भारतीय खिलाड़ियों की क्षमता और उनके अदम्य हौसले का परिचय दिया है। अब खेल प्रशासकों, सरकारों, खेल संस्थानों और प्रायोजकों की जिम्मेदारी है कि इस ऊर्जा को स्थायी व्यवस्था में बदलें। अगला लक्ष्य केवल एशिया में चौथा स्थान बनाए रखना नहीं, बल्कि विश्व खेल मंच पर भारत की पहचान को और व्यापक बनाना होना चाहिए। 85 पदकों की यह कहानी इसी बड़े सपने की ओर बढ़ते कदमों का संकेत देती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)