07 Nov 2026
-शादी-ब्याह में भी बरतते हैं परहेज
कोयंबटूर, 07 नवंबर (एजेंसी)। दीपावली का त्योहार हो और पटाखों की गूंज न सुनाई दे, यह कल्पना आमतौर पर मुश्किल लगती है। दीयों की जगमगाहट, मिठाइयों की मिठास और आसमान में रंग-बिरंगी आतिशबाजी को इस पर्व की पहचान माना जाता है। लेकिन तमिलनाडु में कुछ गांव ऐसे भी हैं, जहां दीपावली की खुशियां पटाखों के शोर से नहीं, बल्कि पक्षियों की चहचहाहट के बीच मनाई जाती हैं। यहां के ग्रामीणों ने बेजुबान पक्षियों और चमगादड़ों की सुरक्षा के लिए अपनी परंपराओं में बदलाव किया है।
तमिलना़डु के कोयंबटूर जिले के किट्टाम्पालयम गांव में पिछले 25 वर्षों से पटाखे नहीं फोड़े जा रहे हैं, जबकि तिरुनेलवेली जिले के कूंथनकुलम में भी पक्षियों के संरक्षण के लिए दीपावली से लेकर शादी-विवाह और अन्य आयोजनों तक आतिशबाजी से परहेज किया जाता है।
पक्षियों की परेशानी ने बदल दी दीपावली मनाने की परंपरा
कोयंबटूर जिले में करुमत्तमपट्टी के पास स्थित किट्टाम्पालयम गांव में करीब 25 साल पहले ग्रामीणों ने पटाखे नहीं फोड़ने का सामूहिक निर्णय लिया था। गांव के पुराने बरगद, पीपल और अन्य विशाल पेड़ों पर बड़ी संख्या में पक्षियों और चमगादड़ों का बसेरा है। दीपावली के दौरान पटाखों की तेज आवाज और उनसे निकलने वाले धुएं के कारण इन जीवों को परेशानी होती थी। ग्रामीणों ने महसूस किया कि जिस त्योहार को वे उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं, उसी दौरान पक्षियों का प्राकृतिक जीवन प्रभावित हो रहा है।
इस समस्या को देखते हुए गांव के बुजुर्गों ने पटाखे नहीं फोड़ने का फैसला किया। उनका उद्देश्य पक्षियों और चमगादड़ों को उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रखना था। समय के साथ इस फैसले को युवा पीढ़ी ने भी अपना लिया और यह गांव की पहचान बन गया। आज करीब ढाई दशक बाद भी ग्रामीण उसी संकल्प के साथ दीपावली मनाते हैं।
पूर्वजों के फैसले का सम्मान कर रही नई पीढ़ी
किट्टाम्पालयम गांव की विशेषता यह है कि यहां पटाखे नहीं फोड़ने की परंपरा केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही। बच्चों और युवाओं ने भी इसे अपनी जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया है। स्कूलों में जब उनके दोस्त पटाखे खरीदने और आतिशबाजी करने की चर्चा करते हैं, तब भी गांव के युवा अपने पूर्वजों के फैसले पर कायम रहते हैं।
ग्रामीणों के लिए यह केवल पटाखों से दूरी बनाने का मामला नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहने की सोच है। उन्होंने अपनी खुशियों के साथ पक्षियों के जीवन और सुरक्षा को भी महत्व दिया है। यही वजह है कि गांव में पीढ़ी दर पीढ़ी यह परंपरा आगे बढ़ रही है।
पक्षियों के लिए लगा रहे बरगद, पीपल और फलदार पेड़
ग्रामीणों की पहल केवल आतिशबाजी से परहेज तक सीमित नहीं है। वे पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय और भोजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से नए पेड़ भी लगा रहे हैं। इनमें बरगद, पीपल, अंजीर, जामुन और अमरूद जैसे पेड़ प्रमुख हैं। इन पेड़ों पर पक्षियों को घोंसले बनाने के लिए जगह मिलती है और फल तथा अन्य प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के रूप में भोजन भी उपलब्ध होता है।
इस पहल से गांव में हरियाली बढ़ रही है और पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हो रहा है। ग्रामीणों का मानना है कि पक्षियों को सुरक्षित आश्रय देना और उनके प्राकृतिक आवास को बचाना भी समाज की जिम्मेदारी है।
कूंथनकुलम में 129 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हैं पक्षी अभयारण्य और तालाब
तिरुनेलवेली जिले में भी पक्षियों के संरक्षण की ऐसी ही अनूठी परंपरा देखने को मिलती है। तिरुनेलवेली जिला वन अधिकारी इलंगो के अनुसार, जिले में नांगुनेरी के पास कूंथनकुलम और कट्टनकुलम नाम के दो पक्षी अभयारण्य स्थित हैं। इन अभयारण्यों और उनसे जुड़े तालाबों का कुल क्षेत्रफल 129 हेक्टेयर है। इनमें अकेले कूंथनकुलम अभयारण्य 71.02 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है।
मानसून के दौरान इन इलाकों में विकसित होने वाली हरियाली और अनुकूल प्राकृतिक वातावरण बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करता है। विदेशों से आने वाले ये पक्षी तिरुनेलवेली जिले के विभिन्न तालाबों और झीलों में अपने घोंसले बनाते हैं तथा प्रजनन करते हैं। इस तरह मानसून के मौसम में यह पूरा क्षेत्र पक्षियों की गतिविधियों से गुलजार हो उठता है।
पक्षियों को अपने बच्चों की तरह मानते हैं कूंथनकुलम के ग्रामीण
कूंथनकुलम गांव के लोगों ने पक्षियों के महत्व को समझते हुए उन्हें अपने परिवार का हिस्सा बना लिया है। ग्रामीण पक्षियों को अपने बच्चों की तरह मानते हैं और उनकी सुरक्षा के लिए विशेष सावधानी बरतते हैं। उन्हें इस बात का एहसास है कि पटाखों की तेज आवाज और धुआं पक्षियों के जीवन तथा उनके प्रजनन के अनुकूल वातावरण को प्रभावित कर सकता है।
इसी कारण यहां के लोग कई वर्षों से दीपावली पर पटाखे नहीं फोड़ते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने इस परंपरा को अन्य सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों में भी अपनाया है। गांव में शादी-विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर भी आतिशबाजी नहीं की जाती। यहां तक कि किसी घर में शोक होने पर भी पटाखे नहीं फोड़े जाते। ग्रामीणों के लिए पक्षियों की सुरक्षा किसी एक त्योहार तक सीमित नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही ग्रामीणों की पहल
दीपावली के दौरान पटाखों से होने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण को लेकर हर साल सरकार की ओर से जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। तमिलनाडु सरकार ने भी पटाखे फोड़ने के लिए सुबह 6 से 7 बजे और शाम 7 से 8 बजे तक का समय निर्धारित किया है। इसके बावजूद त्योहार के दौरान पटाखों से होने वाला प्रदूषण और जीव-जंतुओं पर उसका प्रभाव चिंता का विषय बना रहता है।
ऐसे में किट्टाम्पालयम और कूंथनकुलम के ग्रामीणों की पहल पर्यावरण संरक्षण का एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। इन गांवों ने साबित किया है कि त्योहारों की खुशियां मनाने के लिए तेज आवाज और आतिशबाजी जरूरी नहीं है। सामूहिक इच्छाशक्ति और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता से ऐसी परंपराएं विकसित की जा सकती हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को भी पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करें।
इन गांवों में दीपावली का उत्सव दीयों की रोशनी, अपनों के साथ खुशियों और पेड़ों पर चहचहाते पक्षियों के बीच मनाया जाता है। ग्रामीणों की सोच का सार यही है कि हमारी खुशियां किसी दूसरे जीव के लिए परेशानी का कारण नहीं बननी चाहिए। पटाखों से रोशन होने वाले आसमान के बजाय पक्षियों से गुलजार पेड़ों को प्राथमिकता देकर इन गांवों ने सह-अस्तित्व और प्रकृति प्रेम की एक अनूठी मिसाल पेश की है।