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अंग संस्कृति की धरोहर मंजूषा कला को नई जिंदगी दे रहे भागलपुर के मंजूषा गुरु मनोज पंडित

18 Sep 2026

भागलपुर, 18 सितंबर (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक और बिहार की प्राचीन लोकचित्रकला 'मंजूषा कला' आज आधुनिकता के दौर में अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।


अंग प्रदेश (भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों) की इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने और इसे वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने में भागलपुर के विख्यात मंजूषा गुरु मनोज पंडित एक अभूतपूर्व मिसाल बनकर उभरे हैं। जहाँ एक ओर बाजारवाद और कम आमदनी के कारण युवा इस कला से विमुख हो रहे हैं, वहीं मनोज पंडित इसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के संकल्प के साथ दिन-रात जुटे हुए हैं।


मंजूषा कला का सीधा संबंध लोककथा बिहुला-विषहरी से है। मान्यता है कि सती बिहुला ने अपने पति लखिंदर के प्राण वापस लाने के लिए बांस की मंजूषा में शव को रखकर देवलोक तक की कठिन यात्रा की थी। सदियों से इस कथा को रंगों और रेखाओं के जरिए उकेरा जाता रहा है।


पारंपरिक रूप से इसमें केवल तीन रंगों लाल, पीला और हरा का उपयोग होता है, जिसमें सांप, बिहुला, लखिंदर, सूर्य-चंद्रमा और विशिष्ट रेखीय बॉर्डर इसकी मुख्य पहचान हैं। कभी घरों की दीवारों और पूजा के पिटारों की शोभा बढ़ाने वाली यह कला आज सिमटती जा रही है।


मंजूषा गुरु मनोज पंडित बताते हैं कि हाथ से बारीक कारीगरी करने में महीनों की मेहनत लगती है, जिससे उत्पाद महंगे होते हैं। इसके विपरीत, बाजार में मशीनों से बने सस्ते सामानों की भरमार है। उचित बाजार न मिलने और कम आमदनी के कारण कई पारंपरिक कलाकारों ने दूसरे रोजगार अपना लिए हैं। युवाओं में भी इसे सीखने के प्रति उदासीनता देखी जा रही थी।


इस कला को यादों में सिमटने से बचाने के लिए मनोज पंडित ने इसे आधुनिक रूप देना शुरू किया है। उनके प्रयासों से अब मंजूषा कला केवल बांस के संदूकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे साड़ियों, दुपट्टों, आधुनिक परिधानों, घरेलू सजावटी सामानों (होम डेकोर) और स्टेशनरी उत्पादों पर भी उतारा जा रहा है।


मनोज पंडित न केवल खुद इस कला को सहेज रहे हैं, बल्कि उन्होंने स्थानीय युवाओं और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण शिविरों की शुरुआत की है। वे अब तक सैकड़ों छात्र-छात्राओं को इस प्राचीन विधा की बारीकियां सिखा चुके हैं, ताकि यह विरासत अगली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुँच सके।


उनका मानना है कि जब तक स्थानीय स्तर पर कलाकारों को नियमित रोजगार और बड़ा बाजार नहीं मिलेगा, तब तक कला का पूर्ण विकास संभव नहीं है।


अंग संस्कृति की इस खूबसूरती को जिंदा रखने के लिए सरकारी प्रोत्साहन और बड़े कॉरपोरेट बाजारों के सहयोग की सख्त जरूरत है। 'मंजूषा गुरु' मनोज पंडित जैसे समर्पित कलाकारों की मेहनत तभी रंग लाएगी, जब हम और आप मिलकर इन हस्तनिर्मित कलाकृतियों को अपने घरों में स्थान देंगे और इस अनमोल विरासत के खरीदार बनेंगे।

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