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बिहार में सीवन जिले की सलमा का अयोध्या की एक मूर्ति से शुरू हुआ सफर, अब कृष्ण भक्ति के लिए हुआ समर्पित

19 Sep 2026

सीवान, 19 सितंबर (एजेंसी)। कुछ कहानियां किसी एक मोड़ से नहीं, बल्कि मन के भीतर उठे किसी अनजाने आकर्षण से शुरू होती हैं। बिहार में सीवान जिले के मैरवा प्रखंड अन्तर्गत गोपालचक निवासी सलमा खातून की कहानी भी ऐसी ही है। मुस्लिम परिवार में जन्मीं सलमा आज राधा-कृष्ण की भक्ति में लीन रहती हैं। माला जपती हैं, तुलसी धारण करती हैं और भगवान कृष्ण के प्रति अपने गहरे लगाव को ‘इनकी कृपा’ बताती हैं। हालांकि वह अपने इस आध्यात्मिक सफर को किसी योजना का परिणाम नहीं मानतीं।


सलमा ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में बताया कि उनके जीवन में यह बदलाव अयोध्या की एक यात्रा के बाद महसूस हुआ। वह पहली बार अयोध्या गई थीं। वहां उनके मुस्लिम समुदाय से आने के कारण उन्हें कुछ दिनों तक एक धार्मिक परिसर के भीतर जाने की अनुमति नहीं मिली। सलमा के अनुसार, इस दौरान वह अपने कमरे में रहकर रोती रहीं। अयोध्या से लौटते समय एक दुकान पर उनकी नजर भगवान गोपाल की एक मूर्ति पर पड़ी। मूर्ति हाथ में लेने के बाद उन्हें लगा कि वह उसे अपने साथ ले जाएं। लेकिन साथ मौजूद लोगों ने ऐसा करने से मना किया।


सलमा ने बताया कि उन्होंने संबंधित व्यक्ति से फोन पर बात भी की, जिसके बाद मूर्ति वहीं छोड़कर लौट आईं। “मूर्ति छोड़कर जब वहां से आई तो ऐसा लगा जैसे मेरा कुछ छूट गया हो। उसके बाद मन नहीं लगता था और बार-बार वृंदावन जाने का मन करता था,। सलमा कहती हैं कुछ समय बाद उन्हें दिल्ली जाने का अवसर मिला और वहां से वह पहली बार वृंदावन पहुंचीं।


सलमा के मुताबिक, वह अकेले ही वृंदावन घूमीं और बांके बिहारी मंदिर में दर्शन किया। मंदिर से बाहर निकलने के बाद कुछ देर के लिए उन्हें रास्ते समझ में नहीं आए। यही यात्रा उनके लिए आध्यात्मिक अनुभवों की एक नई कड़ी बन गई। आज सलमा कहती हैं कि कृष्ण भक्ति में उन्हें “बहुत सुख” मिलता है। उनके शब्दों में, “शायद मुझे लगता है कि इनके सिवा मेरा कोई नहीं है। जब इनके सामने आती हूं तो सबको भूल जाती हूं। मुझे यह भी याद नहीं रहता कि मेरा कोई है। है तो सिर्फ यही हैं।”


दिलचस्प बात यह है कि सलमा की पहचान केवल कृष्ण भक्ति तक सीमित नहीं है। वह खेलों में भी गहरी रुचि रखती हैं। बचपन से ही खेल के प्रति आकर्षित सलमा अब रानी लक्ष्मीबाई स्पोर्ट्स अकादमी में बच्चों को प्रशिक्षण देने का काम भी करती हैं। खेल मैदान में बच्चों को अनुशासन और मेहनत का पाठ पढ़ाने वाली सलमा का दूसरा संसार मंदिर, माला और कृष्ण भक्ति से जुड़ा है।


उनकी कहानी धार्मिक पहचान से अधिक उनके व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव की कहानी है। सलमा इसे किसी बदलाव की घोषणा नहीं, बल्कि अपने शब्दों में “भगवान की कृपा” मानती हैं। वह कहती हैं, “इस संसार में इनके सिवा कुछ नहीं है।”

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