18 Jun 2026
कोलकाता, 18 जून (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। कलकत्ता उच्च न्यायालय (कलकत्ता हाई कोर्ट) ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया । न्यायमूर्ति कृष्ण राव की एकल पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए मामले में सभी पक्षों को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हुए सुनवाई तीन सप्ताह बाद के लिए निर्धारित की । यह याचिका तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय की ओर से दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि विधानसभा अध्यक्ष ने पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा नेता प्रतिपक्ष के लिए शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम के प्रस्ताव को नजरअंदाज कर विद्रोही विधायक ऋतब्रत बनर्जी को मान्यता दे दी। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने विधानसभा अध्यक्ष की निर्णय प्रक्रिया पर कई सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि तृणमूल नेतृत्व द्वारा भेजे गए पहले प्रस्ताव को लंबित रखते हुए बाद में कुछ विधायकों द्वारा भेजे गए दूसरे प्रस्ताव को इतनी जल्दी स्वीकार करने का आधार क्या था। न्यायालय ने कहा कि मुख्य प्रश्न यह है कि क्या अध्यक्ष सभी पक्षों को सुने बिना एक प्रस्ताव को नजरअंदाज कर दूसरे को स्वीकार कर सकते हैं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी संबंधित पक्षों को सुनना आवश्यक है। न्यायालय ने पूछा कि केवल कथित जालसाजी के आरोपों के आधार पर पहले प्रस्ताव को किनारे कैसे किया जा सकता है। विधानसभा अध्यक्ष की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि यह एक असाधारण स्थिति थी, जिसमें नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर परस्पर विरोधी दावे सामने आए थे। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष ने तृणमूल कांग्रेस को विपक्षी दल के रूप में स्वीकार किया, लेकिन यह तय करना आवश्यक था कि पार्टी के विधायकों के बीच किस दावेदार को बहुमत का समर्थन प्राप्त है। अध्यक्ष की ओर से बताया गया कि 80 में से 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में अपना समर्थन पत्र दिया था और व्यक्तिगत रूप से अध्यक्ष के समक्ष उपस्थित भी हुए थे। इसी आधार पर उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई। ऋतब्रत बनर्जी और अन्य विद्रोही विधायकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता तिलक बोस ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष का पद विधानसभा की कार्यवाही से जुड़ा हुआ है और अध्यक्ष को यह अधिकार है कि वह यह निर्धारित करें कि किस दावेदार को विपक्षी विधायकों का बहुमत समर्थन प्राप्त है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि बाद में विधायकों का समर्थन बदलता है तो अध्यक्ष नए व्यक्ति को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे सकते हैं। वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने राजनीतिक दल और उसके विधायक दल के बीच के अंतर को नजरअंदाज किया है। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष का चयन राजनीतिक दल के नेतृत्व का अधिकार है, न कि विधायक दल के किसी गुट का। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब अध्यक्ष को ऋतब्रत बनर्जी के पार्टी से निष्कासन संबंधी सूचनाएं प्राप्त हो चुकी थीं, तब उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में कैसे मान्यता दी जा सकती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि विधायक दल का कोई गुट राजनीतिक दल के निर्णय के विरुद्ध नेता प्रतिपक्ष चुन सकता है, तो इससे दलगत अनुशासन और संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांत प्रभावित होंगे। अब सभी पक्षों के हलफनामों के बाद तीन सप्ताह पश्चात पुनः सुनवाई होगी।