05 Feb 2026
नई दिल्ली, 5 फरवरी (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। अमेरिका और रूस के बीच आखिरी परमाणु हथियार नियंत्रण समझौता गुरुवार को खत्म हो गया। इसके साथ ही परमाणु हथियारों की तैनाती पर लगी रोक भी खत्म हो जाएगी। इससे अब दोनों महाशक्तियों के बीच बेरोकटोक परमाणु हथियारों की होड़ की आशंका बढ़ गई है। यूक्रेन और रूस के बीच जारी युद्ध की चिंताओं के बीच मास्को और वाशिंगटन इस संधि को आगे बढ़ाने के इच्छुक नहीं हैं। इस संधि ने एक दौर में जहां शीत युद्ध को खत्म करने में मदद की थी, वहीं वैश्विक शांति की दिशा में भी मील का पत्थर साबित हुई थी।
दरअसल, अमेरिका और रूस के पास दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक परमाणु हथियार हैं। स्ट्रेटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी, जिसे 'न्यू स्टार्ट' के नाम से जाना जाता है, इसे 2010 में रिन्यू किया गया था। इसके तहत, दोनों पक्षों को रणनीतिक परमाणु बलों की आवाजाही के बारे में जानकारी साझा करनी थी। कम समय के नोटिस पर मिसाइलों का ऑन-साइट निरीक्षण भी इस समझौते का हिस्सा था। इस संधि पर 2010 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूस के दिमित्री मेदवेदेव ने हस्ताक्षर किए थे। इस संधि ने महत्वपूर्ण रूप से मॉस्को को एक परमाणु महाशक्ति के रूप में अमेरिका के लगभग बराबर का दर्जा दिया। यह संधि 5 फरवरी, 2011 से लागू हुई थी और इस संधि को 2021 में जो बाइडेन ने पांच और सालों के लिए बढ़ाया था, जिसमें दोनों पक्षों के लिए परमाणु हथियारों की संख्या 1,550 तय की गई थी। इसके खत्म होने से अब परमाणु सीमाओं के बिना दुनिया में भयावह आशंकाएं पैदा हो गई है। क्योंकि अमेरिका और रूस अब जितने चाहें उतने परमाणु मिसाइल बनाने के लिए स्वतंत्र हैं।
ट्रंप और पुतिन ने इस समझौते को रिन्यू करने की कोई इच्छा नहीं दिखाई है। ट्रम्प कम चिंतित दिखे, उन्होंने पिछले महीने न्यू यार्क टाइम्स से कहा, "अगर यह खत्म होता है, तो खत्म हो जाए।" असल में, राष्ट्रपति इंटरनेशनल लिमिट्स के मुखर आलोचक रहे हैं और पिछले साल उन्होंने सेना को न्यूक्लियर हथियारों का परीक्षण फिर से शुरू करने का आदेश दिया था।
उधर, रूस ने घोषणा की है कि वह अब न्यूक्लियर वॉरहेड्स पर लगी लिमिट्स से बंधा नहीं है, क्योंकि ट्रम्प ने संधि को एक साल बढ़ाने का प्रस्ताव अनसुना कर दिया। हालांकि, मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पुतिन ने बुधवार को चीन के शी जिनपिंग के साथ एक कॉल में कहा कि रूस "सोच-समझकर और जिम्मेदारी से काम करेगा"।
साल 2010 में ओबामा के साथ संधि पर हस्ताक्षर करने वाले रूस के मेदवेदेव ने इस डील को खत्म होने देने के खतरे के बारे में चेतावनी दी है। मेदवेदेव ने मॉस्को में पत्रकारों से कहा, "इसका तुरंत मतलब है कि एक तबाही और एक न्यूक्लियर युद्ध शुरू हो जाएगा... इस बारे में सभी को चिंता करनी चाहिए।"
दरअसल, इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा यह है कि अमेरिका ने किसी भी भविष्य की हथियार नियंत्रण संधि में चीन को शामिल करने की मांग की है। अमेरिका चीन के अपने न्यूक्लियर हथियारों के जखीरे को बढ़ाने को लेकर सतर्क रहा है। इससे भारत के लिए भी चिंता बढ़ जाती है, जो चीन के साथ सीमा विवाद साझा करता है, भले ही संबंधों में नरमी आई हो।
हालांकि, चीन के न्यूक्लियर वॉरहेड्स, जिनके बारे में माना जाता है कि लगभग 600 हैं, अमेरिका के जखीरे के आकार से 12 प्रतिशत कम हैं।
इस बीच, रूस ने किसी भी भविष्य की डील में फ्रांस और यूके - यूरोप की न्यूक्लियर शक्तियों - को शामिल करने की मांग की है।
वैश्विक प्रतिक्रियाः
इस घटनाक्रम से संयुक्त राष्ट्र हिल गया है, जिसने अमेरिका और रूस से डील को जल्दी से रिन्यू करने का आग्रह किया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने एक बयान में कहा कि न्यूक्लियर हथियार के इस्तेमाल का जोखिम दशकों में सबसे ज़्यादा है। उन्होंने कहा, "आधी सदी से भी ज़्यादा समय में पहली बार, हम दो महाशक्तियों के न्यूक्लियर हथियारों के जखीरे पर बिना किसी बाध्यकारी सीमा के दुनिया का सामना कर रहे हैं।"
पोप ने भी इस बात पर ज़ोर दिया कि दोनों पक्षों को नई न्यूक्लियर हथियारों की होड़ को रोकने के लिए "हर संभव" प्रयास करना चाहिए। अमेरिका-रूस डील का खत्म होना सिर्फ़ इन देशों से जुड़ा नहीं है। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
फिलहाल, इसका तात्कालिक असर 1970 की परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) के लिए खतरा बन सकता है, जिसकी इस साल के आखिर में समीक्षा होनी है। एक तरह से अमेरिका-रूस डील के खत्म होने से वह बुनियाद ही कमजोर हो गई है जिस पर एनपीटी टिकी है। एनपीटी के तहत जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, उन्होंने इन्हें हासिल न करने का वादा किया है।