17 Feb 2026
अर्पित शर्मा
बुजुर्गों से कहते सुना है कि “पांव उतने पसारियों, जितनी लंबी हो चादर" मगर इस वक्त यह कहावत मध्यप्रदेश सरकार ने उलट कर रखदी है। प्रदेश के इतिहास में पहली बार होने जा रहा हे कि प्रदेश के कुल बजट से ज्यादा इस समय प्रदेश के ऊपर कर्ज चढ़ चुका है । 18 फरवरी को प्रदेश की मोहन सरकार 2026 - 27 का बजट पेश करने जा रही है मगर यह तो वही बात हो गई कि घर की जरूरतें शौक से पूरी होंगी और कर्जदार दरवाजे पर आवाज देगें। ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि बजट सत्र के दौरान मोहन यादव प्रदेश के विकास की चिंता जाहिर करेंगे या कर्ज चुकाने की कोई स्कीम लेकर आयेंगे।
पिछले सत्र में मध्यप्रदेश का कुल बजट 4.21 लाख करोड़ रुपए रहा हे जो कि इस बार लगभग 4.65 लाख करोड़ होने का अनुमान है यानि पिछले सत्र से लगभग 15 प्रतिशत ज्यादा होगा, मगर सोचने वाली बात यह है कि प्रदेश के ऊपर कुल कर्जा लगभग 5 लाख करोड़ रुपए हो चुका है। 2025 - 26 के अनुमानों के मुताबिक मध्यप्रदेश की जनसंख्या 8.5 करोड़ से 8.9 करोड़ के करीब है यानि प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से लगभग 62,500 रुपए हर नागरिक पर कर्ज है।
चुनाव जीतने के उद्देश्य से लाई गई लाडली बहना, लाडली लक्ष्मी जैसी प्रलोभन वाली योजनाएं अब सरकार पर भारी पड़ने वाली है, वही कर्मचारियों के वेतन भत्तों का खर्च और अन्य खर्च पर लगभग 1.14 लाख करोड़ खर्च होंगे। लाडली बहना योजना का खर्च ही आगामी वित्तीय वर्ष में लगभग 23 हजार करोड़ पार कर जाएगा और लाडली लक्ष्मी योजना पर करीब 1200 करोड़ रुपया खर्च होगा उसी के साथ कर्मचारी और पेंशनर्स के वेतन भत्तों पर 90 हजार करोड़ रुपए खर्च होना है, सब को मिलाकर देखा जाए तो पिछले वित्तीय वर्ष के हिसाब से इस वर्ष 45 हजार करोड़ ज्यादा खर्च होना है।
अब इन सब में सोचने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री अगले वित्तीय वर्ष में अकेले बाजार से ही करीब करीब 78 हजार करोड़ रुपए अनुमानित कर्ज ले सकते है। और आप सोचिए कि इतनी ही राशि कर्ज की किस्त और ब्याज को चुकाने में जाएगी।
2020-21 में शिवराज सिंह के मुख्यमंत्री कार्यकाल में सरकार लगभग साल भर में 31686 करोड़ रुपए उधार लेती थी जो अब 1.10 लाख करोड़ पहुंच सकता है यानि 6 सालों में सालाना कर्ज लेने की जरूरत ढाई गुना बढ़ गई है।
चिंता बढ़ाती रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्टः
हाल ही में आई आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल राज्यों की देनदारियों में मध्यप्रदेश का हिस्सा 5% है और इस हिसाब से देनदारियों के मामले में प्रदेश देश के 9 वें स्थान पर आता है।
मध्यप्रदेश सरकार की 2007 में 52,731.1 करोड़ देनदारी थी जो कि अब 2026 में 5,31,012.8 करोड़ रुपए हो गई है यानि 19 सालों में 10 गुना बढ़ गई।
मार्च 2026 तक प्रमुख राज्यों की देनदारी
राज्य देनदारी (करोड़ रुपये)
तमिलनाडु 10,42,858.2
महाराष्ट्र 9,37,159.6
उत्तर प्रदेश 8,83,977.1
कर्नाटक 8,14,277
प. बंगाल 7,90,237
राजस्थान 7,14,993.0
आंध्र प्रदेश 6,45,461.1
गुजरात 5,34,339.1
मध्यप्रदेश 5,31,012.8
कहां से लिया इतना कर्ज और चुकाया कितना ?
सरकार ने वित्तीय संस्थानों एवं बाजारों से कुल 85,076 करोड़ रुपए कर्ज लिया था जिसमे से 76,210 हजार करोड़ रुपए बॉन्ड के जरिए बाजार से लिया गया और 58,616 करोड़ रुपए सरकार ने इस वर्ष सिर्फ पुराने कर्ज की किस्त और ब्याज में दे दिया, इसमें 29,980 करोड़ रुपए मूल रकम की किस्त थी और ब्याज 28,636 करोड़ रुपए था।
इसका असर भविष्य पर कितना भयावह पड़ने वाला है?
जब पूरे बजट में से इतनी बड़ी रकम ब्याज और किस्त में ही चली जाएगी तो पूरे वर्ष सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि का भार कैसे पूर्ण होगा? जब पैसा ही कम पड़ जाएगा। वहीं दूसरी ओर प्रदेश में बढ़ती बेरोजगारी एक बड़ा विषय बन चुका है। हालांकि सरकार का तर्क तो यही है कि जो कर्ज लिया जा रहा वह प्रदेश के आधारभूत संरचना और व्यवस्थाओं पर ही खर्च होगा और भविष्य में आय देने वाले संसाधन खड़े किए जायेंगे। मगर प्रदेश के हालातों से सभी वाकिफ है।
बजट तो बढ़ा दिया मगर इतनी बड़ी राशि कहां से आएगी?
यह राशि तो प्रदेश के राजस्व से ही प्राप्त हो सकती है मगर इसकी गुंजाइश तो कम है, क्योंकि आगामी वित्तीय वर्ष में यह राशि 15 से 17 प्रतिशत बढ़ने के आसार है, और इसमें अभी 43 हजार करोड़ का अतिरिक्त इंतजाम सरकार को करना होगा।
इसी सप्ताह में सरकार ने दो बार कर्ज लियाः
अभी साल का दूसरा महीना शुरू हुआ ही था कि सरकार ने बजट सत्र से पहले ही 3 फरवरी को 53 हजार करोड़ और 10 फरवरी को 5 हजार करोड़ रुपए कर्ज ले लिया। 6 साल में सालाना उधारी में कुल 78,314 करोड़ की बढ़ोतरी हो गई है। यानी सालाना कर्ज लेने की क्षमता या जरूरत ढाई गुना से ज्यादा हो गई है।
देश में डबल इंजन की सरकार होने की वजह से प्रदेश सरकार को कर्ज पर कर्ज तो मिलता जा रहा है मगर चुनाव जीतने के चक्कर में जो फ्री की योजना शिवराज सिंह देकर गए थे वह अब प्रदेश के विकास पर सीधा असर डाल रही है, यह सारे आंकड़े दैनिक भास्कर की रिपोर्ट से प्राप्त किए गए है। और इन आंकड़ों से पता चलता है कि बिना कार्य के दिए जा रहे पैसे एक ओर तो जनता को अकर्मण्य बनाकर गरीबी की ओर धकेल रही है वही सरकार भी अब व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने में नाकाम होती दिखाई दे रही है। प्रदेश में कर्मचारी की तनख्वाह, ठेकेदारों के पैसे, विभाग की व्यवस्थाओं का खर्ज सब कुछ अस्त - व्यस्त हो चुका है और हालत यह होते जा रहे है कि अगर यही हाल रहा तो अगला चुनाव सरकार को जीतना भारी पड़ सकता है एवं अगर सरकार बदली तो आने वाली नई सरकार किस तरह प्रदेश को संभाल पाएगी यह सोचनीय बात है।
वित्तीय एवं कर विशेषज्ञ गजेन्द्र शर्मा कहते हैं कि मध्यप्रदेश की वित्तीय स्थिति फिलहाल नियंत्रित है, लेकिन बढ़ती उधारी पर सतर्क प्रबंधन आवश्यक है। उच्च स्टाम्प ड्यूटी कम कर राज्य में कंपनी पंजीकरण बढ़ाया जा सकता है, जिससे राजस्व मजबूत होगा। सब्सिडी व योजनाओं की समीक्षा कर संसाधन शिक्षा और रोजगार जैसे उत्पादक क्षेत्रों में लगाए जाने चाहिए। संतुलित वित्तीय नीति ही दीर्घकालीन आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करेगी।
(लेखक राजनीतिज्ञ विश्लेषक हैं)