22 Jan 2026
मनोज कुमार मिश्र दिल्ली में बढ़ रही बेहिसाब आबादी से केवल मकान और रोजगार का संकट ही नहीं बढ़ रहा है बल्कि इसका असर बिजली-पानी की आपूर्ति से लेकर प्रदूषण बढ़ाने पर हो रहा है। दिल्ली का क्षेत्रफल 1915 से आज तक 1483 वर्ग किलोमीटर ही है लेकिन आबादी 2 लाख 38 हजार से बढ़कर करीब तीन करोड़ हो गई। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की कुल आबादी चार करोड़ से ज्यादा हो गई है। दिल्ली की सीमा बढ़ने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। ऐसे में दिल्ली से आबादी का दबाव कम करने और हर साल बाहर से आकर दिल्ली में बसने वाली औसतन पांच लाख की अतिरिक्त आबादी को दिल्ली में आने से रोकने के लिए दिल्ली जैसी सुविधा दिल्ली के बाहर उपलब्ध कराना सरकारों के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसा न होने पर दिल्ली में मूलभूत सुविधाओं का संकट बढ़ता जाएगा, प्रदूषण की समस्या और बड़ी और स्थाई होती जाएगी।आबादी के दबाव से अनधिकृत कालोनी बढ़ती जाएगी और यमुना कभी भी साफ नहीं हो पाएगी। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव और वोट की राजनीति में पिछड़ने के भय से पहले की सरकारों ने दिल्ली पर आबादी के बोझ को कम करने के फैसले लिए लेकिन उस पर अमल नहीं हो पाया। सत्तर के दशक में करीब पचास बड़े सरकारी दफ्तर दिल्ली से बाहर ले जाने का फैसला हुआ। एक को उसमें से गए ही गिनती के, जो गए भी उनके मुख्य दफ्तर से ज्यादा उनकी दिल्ली शाखा का दफ्तर बड़ा होता गया। उसी तरह 1985 में एनसीआर योजना बोर्ड बनी। उसे 1988 से लागू करना शुरू किया गया। बोर्ड के पास कार्रवाई का ठोस अधिकार न होने से वह काम शुरू करने से पहले ही विफल हो गया। यह बात बोर्ड के सदस्य सचिव रहे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ओमेश सहगल ने सदस्य सचिव रहते 1996 में भी कही जो बाद में दिल्ली के मुख्य सचिव भी रहे। उनका कहना था कि साल 1971-72 में केन्द्र सरकार ने सरकारी और अर्ध सरकारी करीब 50 संस्थानों के दफ्तर दिल्ली से बाहर भेजना तय किया। ओएनजीसी की मुख्यालय देहरादून, कोल इंडिया लिमिटेड का कोलकाता, भारत पेट्रोलियम, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम और भारतीय स्टेट बैंक आदि के मुख्यालय मुंबई इत्यादि बाहर गए तो लेकिन न जाने वालों की संख्या ज्यादा रही। जो गए भी उनके क्षेत्रीय दफ्तर मुख्यालय से ज्यादा बड़े हो गए। उसके कर्मचारी और संबंधित लोग दिल्ली में रह गए। सालों पहले अदालत ने साफ तौर पर दिल्ली में उद्योग लगाने पर पाबंदी लगाई। माना गया कि केवल सेवा क्षेत्र के काम-स्कूल, अस्पताल, होटल इत्यादि ही दिल्ली में लगेंगे। वास्तव में ऐसा हुआ नहीं। जब एनसीआर योजना बनी तब दिल्ली में और पड़ोस के राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं। बावजूद योजना ठीक से लागू नहीं हो पाई। ओमेश सहगल इसका एक बड़ा कारण मानते हैं कि बोर्ड के पास कोई ठोस अधिकार है ही नहीं। वह किसी को सजा दे ही नहीं सकती। इसलिए योजना कागजों पर ही रही और बेहिसाब तरीके से आबादी बढ़ती गई। इतना ही नहीं कोई राज्य सरकार दिल्ली के उपयोग के लिए अपनी जमीन देना तो दूर अपने राज्य सरकार के अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं करने देती। सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि पूरे एनसीआर ही नहीं पड़ोसी शहरों के लोग नागरिक सुविधाओं के लिए दिल्ली आने पर मजबूर हैं। हवाई अड्डा (अब जेवर में शुरू होने वाला है), बड़े रेलवे स्टेशन, बड़े अस्पताल, बढ़िया स्कूल-कालेज के लिए तो लोगों को दिल्ली ही आना पड़ रहा है। लोग आएंगे तो गाड़ियां आएंगी। उससे प्रदूषण बढ़ेगा। इसलिए बिना ठोस योजना और राजनीतिक इच्छा शक्ति के दिल्ली पर से आबादी का बोझ कम ही नहीं हो सकता। वे कहते हैं कि दो बार दिल्ली की अनधिकृत कालोनियों को नियमित किया गया। जब वे मुख्य सचिव थे तब पता नहीं कैसे एरियल सर्वे में एक भी अनधिकृत कालोनी नहीं दिखी और आज यह संख्या तीन हजार पार कर गई। सवाल है कि यह सारी कालोनियां या दिल्ली के हर इलाके में अनधिकृत निर्माण कैसे और किसने किए, इस पर ठोस कारवाई हुए बिना दिल्ली को बचाया नहीं जा सकता है। दिल्ली में आबकारी आयुक्त रहे एके सिंह कहते हैं कि कोई भी राज्य आपकी सलाह मानने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि आबकारी आयुक्त रहते हुए शराब की तस्करी को रोकने के लिए उन्होंने हरियाणा के आबकारी आयुक्त से आबकारी कर समान करने के लिए पहल करने को कहा, वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। दिल्ली में अपने आप ही आबादी बेहिसाब बढ़ रही है, ऊपर से पड़ोस के इलाकों से हर रोज पचास से साठ लाख लोग आते हैं। वे पैदल तो आते नहीं। उनके वाहन पहले से बढ़े प्रदूषण को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। दिल्ली की अपनी सरकारी एजेंसियों में तालमेल न होने के चलते भी दिल्ली का नुकसान होता जा रहा है। दिल्ली विकास प्राधिकरण(डीडीए) की स्थापना दिल्ली को व्यवस्थित करने की योजना बनाने के लिए की गई, मकान बना कर बेचना उसने अपना मुख्य काम बना लिया। धीरे-धीरे उसके मास्टर प्लान बेकार साबित होने लगे और वह एक बड़ा बिल्डर जैसा बन गया। दुनिया के अमीर देश-अमेरिका और चीन बिजली बचाने के लिए अंतरिक्ष में डाटा सेंटर बना रहे हैं। अपने देश में अभी तक एक दूसरे राज्य से बिजली-पानी खरीदने-बेचने में ही लगे हुए हैं। दिल्ली अपनी जरूरत का केवल दस फीसदी पानी अपने से जुटा पाती है। बाकी के लिए तो दूसरे राज्यों पर ही निर्भरता है। फिर भी लगातार दिल्ली में पानी का संकट बना ही हुई है। हिमाचल प्रदेश के रेणुका बांध से दिल्ली को पानी मिलने का भरोसा सालों से मिल रहा है। यह कैसे संभव है कि दूसरे राज्य अपने पानी न लेकर सारा ही पानी दिल्ली को देने लगेंगे। हालात इस बार बदले हुए हैं। एनसीआर योजना के समय दिल्ली और पड़ोस के राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी तो अभी हर जगह भाजपा की सरकार है। इतना ही नहीं गजब राजनीतिक इच्छाशक्ति वाले नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। दिल्ली पर यातायात का दबाव घटाने के लिए मोदी सरकार ने ईस्टर्न पेरिफेरियल एक्सप्रेसवे, वेस्टर्न पेरिफेरियल एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे बनाया। दिल्ली मेट्रो रेल दिल्ली और एनसीआर में 295 किलोमीटर तक बन चुका है। चौथे चरण में इसमें करीब 48 किलोमीटर और जुड़ जाएगा। इस पर भी काम शुरू हो गया है। दिल्ली मेट्रो से हर रोज यात्रा करने वालों की औसत संख्या पचास लाख से ऊपर है। यह संख्या 70 लाख भी पार कर जाती है। दिल्ली-मेरठ नमो भारत रेल कोरिडोर के बाद दिल्ली-करनाल और दिल्ली-अरवल कोरिडोर बनने वाला है। इन सभी का लाभ तो दिल्ली को होगा ही। दिल्ली की समस्या यह है कि दिल्ली का अपना ज्यादा कुछ नहीं है। मौसम भी पड़ोसी राज्यों पर निर्भर है। इतना ही नहीं दिल्ली अपनी जरूरतों को पूरा करने के संसाधनों के लिए भी दूसरे राज्यों पर निर्भर है। 1911 में दिल्ली देश की राजधानी बनी तब दिल्ली की आबादी करीब 2,38 हजार थी, जो 1947 में बढ़कर 6,95 हजार हो गई थी। अब आबादी करीब तीन करोड़ है और एनसीआर की कुल आबादी की करीब साढ़े चार करोड़ हो गई है। एनसीआर की आबादी भी मूल रूप से दिल्ली की आबादी ही है। दिल्ली से बाहर बसने वाले ज्यादातर लोग आज भी दिल्ली से ही जुड़े हुए हैं। उनमें ज्यादातर के कारोबार या नौकरी दिल्ली में ही है। राजधानी बनने के बाद 1915 में यमुना पार के 65 गांव दिल्ली में जुड़े। तब से दिल्ली का इलाका 1483 किलोमीटर ही बना हुआ है। निकट भविष्य में इसमें बढ़ोतरी होने की संभावना नहीं दिख रही। दिल्ली से आबादी का दबाव घटाने और अब बेकार मानी जाने वाली डीडीए को सहयोग देने के लिए डीडीए की तरह ही केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अधीन एनसीआर बनाने की योजना तो 1962 में ही बनी लेकिन उसका गठन 1985 में हो पाया। केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री इसके अध्यक्ष और दिल्ली के उप राज्यपाल के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्री इसके सदस्य बनाए गए। एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी इसके सदस्य सचिव होते हैं। 1985 में बोर्ड बनने पर 2001 की आबादी को लक्ष्य मानकर 1988 में काम शुरू हुआ तब तक योजना से ज्यादा आबादी हो गई थी। एनसीआर के शहरों और दिल्ली के बीच में एक किलोमीटर का गलियारा हरियाली के लिए छोड़ना था। यानि एनसीआर बसना था दिल्ली से हट कर वे बस गए दिल्ली से सटकर। इतना ही नहीं दिल्ली में एक तरह से हर किसी को हर जगह एक तरह से अवैध निर्माण करने की छूट दे दी गई। जो योजनाएं पहले से बनी उसमें तो केवल खामियां ही खामियां हैं। दुनिया के सबसे महंगे इलाके कनाट प्लेस में हर वर्ग के सरकारी कर्मचारियों के लिए फ्लैट बना दिए गए। यह तो मान भी लिया जाए कि गरीब लोगों को खाली जगह मुफ्त में सरकार आवास उपलब्ध करवाए लेकिन अमीरों की कई-कई करोड़ की एक-एक अवैध सैनिक फार्म हाऊस को भी न तोड़ा जाए, यह समझ से परे है। एनसीआर के गठन के समय इसे दिल्ली के 1483 के अलावा हरियाणा के छह जिलों के 13,413, उत्तर प्रदेश के चार जिलों के 10,885 और राजस्थान के 4,493 यानि 30, 240 वर्ग किलोमीटर इलाके को एनसीआर में शामिल किया गया। तब योजना थी कि 2001 में दिल्ली की हो जाने वाली 1,32 लाख आबादी में से 20 लाख आबादी को इन इलाकों में भेजा जाए। इसके लिए इन सभी जगहों में दिल्ली जैसी सुविधा उपलब्ध कराई जाए। ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया और दिल्ली की आबादी लगातार बढ़ती गई। यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रही है। लोगों को भरोसा है कि तीसरी बार भारी जनादेश से प्रधानमंत्री अपनी कार्यशैली से इस बदल पाएं। (लेखक, जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं।)