05 Jun 2026
दधिबल यादव
दिल्ली एक बार फिर शोक में डूबी है। मालवीय नगर स्थित एक रेस्तरां-होटल में लगी भीषण आग ने 21 लोगों की जान ले ली और बड़ी संख्या में लोग झुलस गए या घायल हो गए। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए यह केवल एक हादसा नहीं बल्कि जीवन भर न भरने वाला घाव है। लेकिन इस त्रासदी का सबसे दुखद पहलू यह है कि यह कोई अप्रत्याशित घटना नहीं थी। यह उस व्यवस्था का परिणाम है जो हर दुर्घटना के बाद जागती है, शोक व्यक्त करती है, आर्थिक मदद का ऐलान करती है, जांच बैठाती है और फिर कुछ समय बाद सब कुछ भूल जाती है।
सवाल यह नहीं है कि मालवीय नगर में आग क्यों लगी? सवाल यह है कि आखिर दिल्ली में ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों होती हैं? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी शासन व्यवस्था ने इन्हें रोकने की क्षमता खो दी है या फिर इन्हें नियति मान लिया है?
दिल्ली के हालिया इतिहास पर नजर डालें तो आग, भवन ध्वंस और सुरक्षा संबंधी दुर्घटनाओं की एक लंबी श्रृंखला दिखाई देती है। अनाज मंडी की आग, करोल बाग के होटल अर्पित पैलेस की त्रासदी, मुंडका के व्यावसायिक भवन में लगी आग, प्रीत विहार के अस्पताल में लगी आग और ऐसी अनेक घटनाएं राजधानी की स्मृति में अभी भी ताजा हैं। हर बार दर्जनों परिवार उजड़ते हैं, हर बार जांच होती है और हर बार कुछ अधिकारियों तथा भवन मालिकों पर कार्रवाई की घोषणा होती है। लेकिन कुछ महीनों बाद हालात फिर वैसे ही हो जाते हैं जैसे पहले थे।
यही कारण है कि मालवीय नगर की घटना को केवल एक अलग-थलग दुर्घटना मानना वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा। यह एक ऐसे शहरी मॉडल की विफलता है जिसमें इमारतें तो खड़ी हो जाती हैं, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था नहीं; कारोबार तो बढ़ता है, लेकिन जवाबदेही नहीं; नियम तो बनाए जाते हैं, लेकिन उनका पालन नहीं कराया जाता।
आमतौर पर ऐसी घटनाओं के बाद सबसे पहले तकनीकी कारणों की चर्चा शुरू होती है—शॉर्ट सर्किट, गैस रिसाव या किसी उपकरण में खराबी। लेकिन अनुभव बताता है कि आग से अधिक घातक वह लापरवाही होती है जो उसे सामूहिक मृत्यु में बदल देती है। यदि अग्निशमन यंत्र काम कर रहे हों, आपातकालीन निकास खुले हों, भवन की क्षमता का पालन किया गया हो और सुरक्षा निरीक्षण वास्तव में हुए हों, तो अधिकांश आग की घटनाएं इतनी भयावह नहीं बनतीं।
यही दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या सामने आती है। राजधानी में अवैध निर्माण, नियमों की अनदेखी और निरीक्षण तंत्र की कमजोरी अब अपवाद नहीं बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। व्यावसायिक प्रतिष्ठान अतिरिक्त लाभ के लिए सुरक्षा मानकों से समझौता करते हैं। कई बार निकास मार्गों को स्टोर रूम बना दिया जाता है, अग्निशमन उपकरण केवल कागजों में मौजूद रहते हैं और भवनों का उपयोग उनकी स्वीकृत क्षमता से कहीं अधिक किया जाता है। जब तक कोई हादसा नहीं होता, तब तक सब कुछ चलता रहता है।
मालवीय नगर की इस त्रासदी के बाद भी वही परिचित दृश्य सामने आया है। उपराज्यपाल ने तत्काल उच्चस्तरीय बैठक बुलाई, मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए और संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांगी। दिल्ली के गृह मंत्री ने राजधानी भर में होटल, रेस्तरां और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की अग्नि सुरक्षा जांच के लिए व्यापक अभियान चलाने की घोषणा की है। पहली नजर में यह सक्रियता स्वागतयोग्य प्रतीत होती है। किसी भी जिम्मेदार सरकार से यही अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसी घटना के बाद तुरंत कार्रवाई करे।
लेकिन जनता का प्रश्न कुछ और है। दिल्ली ने ऐसे दृश्य पहले भी अनेक बार देखे हैं। हर बड़ी दुर्घटना के बाद आपात बैठकें होती हैं। अधिकारी तलब किए जाते हैं। विशेष अभियान चलाए जाते हैं। सैकड़ों प्रतिष्ठानों को नोटिस दिए जाते हैं। कुछ दिनों तक प्रशासनिक सख्ती दिखाई देती है। फिर जैसे-जैसे मीडिया का ध्यान हटता है और जनाक्रोश कम होता है, वैसे-वैसे पूरा अभियान ठंडा पड़ जाता है। यही कारण है कि इस बार भी लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या घोषित कदमों का परिणाम वास्तव में दिखाई देगा या फिर नतीजा पहले की तरह ‘वही ढाक के तीन पात’ निकलेगा?
क्योंकि असली सवाल जांच के आदेश देना नहीं है। असली सवाल यह है कि जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक होगी या नहीं। दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी या नहीं। नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों पर केवल जुर्माना लगेगा या उन्हें स्थायी रूप से बंद भी किया जाएगा। क्या उन अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी जिन्होंने निरीक्षण के बावजूद खामियों को नजरअंदाज किया? यदि इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तो हर जांच केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
वास्तव में दिल्ली की समस्या केवल अग्नि सुरक्षा की नहीं, बल्कि शासन की संस्कृति की है। यहां व्यवस्था दुर्घटनाओं को रोकने के बजाय दुर्घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने में अधिक सक्षम दिखाई देती है। प्रदूषण बढ़ता है तो आपात बैठक होती है। बारिश में जलभराव होता है तो निरीक्षण शुरू होता है। कोई इमारत गिरती है तो जांच समिति बनती है। आग लगती है तो विशेष अभियान चलाया जाता है। यानि कार्रवाई हमेशा घटना के बाद होती है, पहले नहीं। यह प्रतिक्रियात्मक शासन मॉडल किसी आधुनिक राजधानी के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता। दुनिया के विकसित शहरों की पहचान इस बात से होती है कि वे जोखिमों को पहले पहचानते हैं और दुर्घटनाओं को रोकने के लिए निरंतर निगरानी करते हैं। दिल्ली में इसके उलट व्यवस्था अक्सर तब सक्रिय होती है जब जानें जा चुकी होती हैं।
इस त्रासदी का एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जिस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। मृतकों में बड़ी संख्या अफ्रीकी देशों और अन्य विदेशी नागरिकों की बताई जा रही है। इससे यह घटना केवल स्थानीय या राष्ट्रीय मुद्दा नहीं रह जाती, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि से भी जुड़ जाती है। दिल्ली केवल देश की राजधानी नहीं, बल्कि दुनिया के लिए भारत का चेहरा है। हर वर्ष हजारों विदेशी पर्यटक, छात्र, कारोबारी और राजनयिक यहां आते हैं। ऐसे में यदि राजधानी में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण विदेशी नागरिकों की जान जाती है, तो उसका संदेश दुनिया भर में जाता है।
अब समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि व्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव लाने का है। अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्रों को कागजी औपचारिकता से निकालकर वास्तविक निरीक्षण से जोड़ना होगा। सभी व्यावसायिक भवनों का डिजिटल सुरक्षा ऑडिट सार्वजनिक किया जाना चाहिए। निरीक्षण में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय होनी चाहिए। अवैध निर्माण और सुरक्षा उल्लंघनों के खिलाफ नियमित और पारदर्शी अभियान चलाए जाने चाहिए, न कि केवल किसी बड़ी दुर्घटना के बाद।
मालवीय नगर की आग में जिन लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि केवल संवेदना व्यक्त करना नहीं है। उनकी स्मृति का सम्मान तभी होगा जब यह त्रासदी एक और फाइल बनकर सरकारी अलमारियों में बंद न हो जाए। यदि इस बार भी जांच रिपोर्टें धूल फांकती रहीं, यदि अभियान कुछ दिनों की सुर्खियों तक सीमित रहे और यदि जिम्मेदार लोगों को वास्तविक दंड नहीं मिला, तो मालवीय नगर की यह आग केवल एक और आंकड़ा बनकर रह जाएगी। तब प्रश्न यह नहीं होगा कि 21 लोगों की मौत कैसे हुई; प्रश्न यह होगा कि क्या हमारी व्यवस्था ने उनकी मौत को पहले से ही स्वीकार कर लिया था।
अब फैसला दिल्ली को करना है—क्या वह इस आग से सबक सीखेगी, या फिर अगली त्रासदी तक इंतजार करेगी।