21 Feb 2026
-एक साल से ज्यादा समय से खाली पड़े पद, हाईकोर्ट ने 23 फरवरी तक मांगा जवाब जोधपुर, 21 फरवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य में बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा करने वाली सर्वोच्च संस्था राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग में लंबे समय से अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति न होने पर सख्त ऐतराज जताया है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर दायर जनहित याचिका की शुरुआती सुनवाई में राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की डिवीजन बेंच ने जुवेनाइल जस्टिस एडवोकेट्स एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट को चेताया कि पिछले एक साल से ज्यादा समय से आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों के पद खाली पड़े हैं। जिससे यह महत्वपूर्ण संस्था पूरी तरह ठप हो चुकी है, और बच्चों के अधिकारों की निगरानी का काम रुक गया है। याचिका में दलील दी गई कि आयोग के निष्क्रिय होने से राज्य में बच्चों से जुड़े कई क्रिटिकल कानूनों का क्रियान्वयन और मॉनिटरिंग बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इनमें पॉक्सो एक्ट, आरटीई एक्ट, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट शामिल हैं। वकील ने तर्क दिया कि आयोग की अनुपस्थिति में राज्य के संवेदनशील और कमजोर वर्ग के बच्चों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा में एक बड़ा शून्य उत्पन्न हो गया है। आयोग का मुख्य कार्य इन कानूनों के तहत बच्चों को मिलने वाले लाभों और सुरक्षा की निगरानी करना है, लेकिन नेतृत्व के अभाव में यह संस्था केवल कागजों तक सीमित रह गई है। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए आदेश जारी किए। अदालत की ओर से जारी नोटिस को राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण खंडेलवाल ने स्वीकार किया। कोर्ट ने इस मामले में बाल अधिकार विभाग के मंत्री और मुख्य सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव बाल अधिकार विभाग के आयुक्त से जवाब मांगा है। खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वे 23 फरवरी तक इस संबंध में एक डिटेल्ड रिपोर्ट पेश करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इतने महत्वपूर्ण पदों को लंबे समय तक खाली रखना बच्चों के अधिकारों के प्रति लापरवाही को दिखाता है।