14 Feb 2026
-हाईकोर्ट का फैसला, देरी होने पर देना होगा हर्जाना जोधपुर, 14 फरवरी (हि.स.)। राजस्थान उच्च न्यायााालयय की मुख्यपीठ ने राज्य के निजी नर्सिंग कॉलेजों और सरकार के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद पर एक रिपोर्टेबल निर्णय दिया है। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की डिवीजन बेंच ने व्यवस्था दी है कि राज्य सरकार को नर्सिंग कॉलेजों की अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) के आवेदनों पर काउंसलिंग शुरू होने से कम से कम 45 दिन पहले निर्णय लेना होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार इस समय सीमा का उल्लंघन करती है, तो उसे प्रभावित संस्थानों को देरी के अनुपात में हर्जाना देना होगा। खंडपीठ का यह निर्णय आर्यमान नर्सिंग कॉलेज (जयपुर) और एमएलडी कॉलेज ऑफ नर्सिंग (केकड़ी) सहित अन्य संस्थानों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया है। इन संस्थानों ने राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज (आरयूएचएस) द्वारा आयोजित बी.एससी. नर्सिंग काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल होने के लिए राज्य सरकार से समय पर एनओसी नहीं मिलने को चुनौती दी थी। कॉलेजों का तर्क था कि प्रक्रियात्मक देरी के कारण वे काउंसलिंग से बाहर हो जाते हैं, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान होता है और क्षेत्र के छात्र नर्सिंग शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता संस्थानों की ओर से वकीलों ने तर्क दिया कि नर्सिंग कॉलेज सभी जरूरी आधारभूत ढांचा और संसाधन विकसित करने के बाद आवेदन करते हैं, लेकिन सरकार के स्तर पर फाइलों के अटके रहने से जीरो सेशन होने का खतरा बना रहता है। काउंसलिंग की तारीखें घोषित होने के बाद भी एनओसी पर निर्णय न लेना प्रशासनिक विफलता है, जिसका खामियाजा केवल निजी संस्थानों को भुगतना पड़ता है। कई मामलों में कॉलेजों के पास इंडियन नर्सिंग काउंसिल और राजस्थान नर्सिंग काउंसिल के अनुमोदन होते हैं, फिर भी राज्य सरकार की एनओसी के अभाव में आरयूएचएस उन्हें काउंसलिंग पोर्टल पर शामिल नहीं करता। डिवीजन बेंच ने अपने विस्तृत फैसले में माना कि हालांकि याचिकाकर्ताओं की कुछ मांगें वर्तमान सत्र के लिए स्वीकार नहीं की जा सकतीं, लेकिन भविष्य की व्यवस्था को सुधारना आवश्यक है। कोर्ट ने प्रोस्पेक्टिव डायरेक्शन (भावी निर्देश) जारी करते हुए कहा कि आगामी शैक्षणिक सत्र से, सरकार को काउंसलिंग के पहले दौर के शुरू होने से न्यूनतम 45 दिन पहले एनओसी के आवेदनों पर अपना अंतिम निर्णय (स्वीकृति या अस्वीकृति) लेना होगा। यदि सरकार 45 दिन की इस डेडलाइन का पालन करने में विफल रहती है, तो उसे देरी के कारण प्रभावित होने वाले कॉलेजों को हर्जाना देना होगा। यह हर्जाना देरी के दिनों के अनुपात में तय किया जाएगा।