27 Jan 2026
जोधपुर, 27 जनवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी बिल्डर द्वारा लिए गए लोन के बदले बैंक किसी खरीदार के फ्लैट पर कब्जा करने का नोटिस देता है, तो इसके खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि पीडि़त पक्ष को डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (डीआरटी) में अपील करनी चाहिए क्योंकि सरफेसी एक्ट में इसके लिए प्रभावी प्रावधान मौजूद हैं। जस्टिस सुनील बेनीवाल की एकल पीठ ने जोधपुर निवासी राजीव भंडारी की याचिका को सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस मामले पर 14 जनवरी को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सुनाया गया। घटनाक्रम के अनुसार याचिकाकर्ता राजीव भंडारी ने 21 अगस्त 2018 को बिल्डर पार्श्वनाथ डवलपर्स से जोधपुर की पार्श्वनाथ सिटी में एक फ्लैट खरीदा था। यह फ्लैट जिस जमीन पर बना था, उसका सब-डिविजन जोधपुर जेडीए द्वारा 30 अगस्त 2017 को अनुमोदित किया गया था। राजीव अपने परिवार के साथ वहां रह रहे थे। विवाद तब खड़ा हुआ जब 24 सितंबर 2025 को एडलवाइस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने सरफेसी एक्ट के तहत एक नोटिस जारी कर फ्लैट को अपने कब्जे में लेने की कार्यवाही शुरू कर दी। पता चला कि बिल्डर पार्श्वनाथ डवलपर्स ने इस फ्लैट को गिरवी रखकर लोन लिया था और उसे चुकाया नहीं। कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि राजीव भंडारी न तो कर्जदार हैं और न ही गारंटर। वकील ने बताया कि बैंक ने सरफेसी एक्ट की जरूरी प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे नोटिस जारी कर दिया। वकील ने तर्क दिया कि चूंकि यह मामला संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़ा है, इसलिए डीआरटी के पास सुनवाई का अधिकार नहीं है और हाई कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने केवल रिट ही दायर नहीं की, बल्कि बिल्डर द्वारा दिए गए धोखे के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करवाई है। प्राइवेट बैंक स्टेट नहीं, रिट नहीं चलेगी : हाईकोर्ट इस मामले में कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी है, जो संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य (स्टेट) की परिभाषा में नहीं आता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजी बैंक या एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी अपने व्यावसायिक लेन-देन में कोई सार्वजनिक कार्य नहीं कर रहे हैं, इसलिए उनके खिलाफ रिट याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने सरफेसी एक्ट की धारा 17 की व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें कोई भी व्यक्ति शब्द का प्रयोग किया गया है। कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा धारा 17(1) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति कोई भी व्यक्ति का दायरा बहुत विस्तृत है। इसमें न केवल कर्जदार बल्कि गारंटर या कोई अन्य व्यक्ति भी शामिल है, जो धारा 13(4) के तहत की गई कार्रवाई से प्रभावित हो सकता है। कोर्ट ने माना कि भले ही याचिकाकर्ता कर्जदार नहीं है, लेकिन नोटिस से उसके अधिकार प्रभावित हुए हैं, इसलिए वह पीडि़त व्यक्ति की श्रेणी में आता है और डीआरटी में अपील कर सकता है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील द्वारा दिए गए सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया वाले दृष्टांत को इस मामले में लागू करने से मना कर दिया, क्योंकि यहां सीधे तौर पर टाइटिल का विवाद नहीं, बल्कि रिकवरी की कार्यवाही का विरोध है। अंतत: कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार उचित मंच (डीआरटी) के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दी है।