28 Dec 2025
अजमेर, 28 दिसंबर (हि.ला.)। हर क्षेत्र के नेताओं को आर्यसमाज व आर्यसमाज के द्वारा तैयार किए गए देशभक्त योद्धाओं के संघर्षपूर्ण इतिहास से प्रेरणा लेकर अपना आचरण सुधारना चाहिए, तभी हम विकसित भारत के सपने को साकार कर सकेंगे । यह विचार पूर्व राजनयिक एवं भारतीय संस्कृति शिक्षक डॉ. मोक्षराज ने आर्यसमाज अजमेर द्वारा केसरगंज स्थित सभागार में आयोजित साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम में व्यक्त किए।
उन्होंने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखते हुए कहा कि जब से आर्यसमाज स्थापित हुआ है तब से भारत की आजादी मिलने तक व उसके बाद भी हिंदी आंदोलन, गौरक्षा आंदोलन तथा हैदराबाद मुक्ति संग्राम में हजारों आर्यसमाजियों ने बलिदान दिए। आर्यसमाज द्वारा हर दशक में बलिदान आर्यसमाज द्वारा हर दशक में दिए बलिदानों में शुद्धि आंदोलन व अंग्रेजों के विरुद्ध संचालित विद्रोह प्रमुख थे। 1875 में आर्यसमाज की स्थापना के बाद इस संस्था के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती का 1883 में अजमेर में बलिदान हुआ, एक मुस्लिम ने 1897 में महर्षि के शिष्य पंडित लेखराम की छुरे मारकर हत्या की। उनके बाद 1908 व 1909 में आर्यसमाजी युवक खुदीराम बोस व मदनलाल ढींगरा को अंग्रेज़ों ने फांसी दी तथा 1913 में महर्षि दयानंद के शिष्य गोविंद गुरु के नेतृत्व में मानगढ बॉंसवाडा में विद्रोह हुआ जिसमें 1500 से अधिक भील व वनवासी शहीद हुए, 1919 में जलियाँवाला बाग की दुर्दांत घटना से पहले 1918 में ही आर्य युवक प्रताप सिंह बारहठ 5 वर्ष तक अंग्रेजों की यातनाओं के बाद जेल में ही शहीद हो गए। 1926 में मुस्लिम युवक अब्दुल रशीद ने शुद्धि आंदोलन के महानायक स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती की गोली मारकर हत्या कर दी।
मोक्षराज कहा कि उसी दशक 1927 में आर्यसमाजी युवक पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां व ठाकुर रोशन सिंह को अंग्रेजों ने फांसी दी। 1928 में लाला लाजपतराय तथा 1930 में श्यामजी कृष्ण वर्मा शहीद हुए । 1931 में आर्यसमाजी युवक सरदार भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव तथा 1940 में सरदार ऊधम सिंह को फांसी दी गई तथा 1941 में लोहारू कांड में मुस्लिम नवाब के अत्याचारों के विरोध में आर्यसमाज का संघर्ष चला, जिसमें स्वामी स्वतंत्रानंद जी जैसे नेता शामिल थे और कई बलिदान हुए, जिनमें नागपुर में कालूराम आर्य को फाँसी दी गई तथा 1947 में भारत विभाजन की दुःखांतिका में आर्यसमाज लाहौर, पेशावर, मुल्तान व कराची के सैकड़ों आर्यों के बलिदान के बाद विभिन्न हिंदी आंदोलन, अछूतोद्धार, हैदराबाद मुक्ति संग्राम व गौरक्षा आंदोलनों के माध्यम से 1960 के दशक तक बलिदान देने का यह सिलसिला चलता ही रहा ।
हवन-सत्संग समारोह मोहन चंद गुप्ता व जागेश्वर प्रसाद निर्मल के ब्रह्मत्व तथा डॉ आराधना आर्य, चिरंजीलाल शर्मा, डॉ राधेश्याम शास्त्री ,लालचंद आर्य, सीताराम यादव व विष्णु गौड़ व नया युगपुरुष के सम्पादक नवीन शर्मा आदि के यजमानत्व में वेद मंत्रों के साथ यज्ञ में आहुतियों से आरंभ हुआ । लालचंद आर्य ने ईश प्रार्थना की, आर्यसमाज के प्रधान नवीन मिश्र ने ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका व डॉ राधेश्याम शास्त्री ने सत्यार्थ प्रकाश का पाठ किया तथा आशीष कटारिया ने ऋषि महिमा गीत गाया । कार्यक्रम का संचालन डॉ .आराधना आर्य ने किया।