04 Feb 2026
जोधपुर, 04 फरवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने बिना सजा के ही आरोपित को 6 साल से अधिक समय जेल में रखने पर गहरी नाराजगी जताते हुए इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का घोर उल्लंघन करार दिया। जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने मामले में सुनवाई करते हुए संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी के पूर्व चेयरमैन शैतान सिंह को जमानत देते हुए कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जब न्यायिक प्रक्रिया खुद दंड देने का रूप धारण कर ले, तो यह कानून के राज के लिए बेहद खतरनाक संदेश है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव सुराणा ने बहस में बताया कि आरोपित के खिलाफ दर्ज धाराओं में अधिकतम 7 साल की सजा का प्रावधान है। वह 20 सितंबर 2019 से यानी 6 साल 4 महीने से जेल में है। एसओजी ने 2020 में जांच पूरी कर ली, लेकिन उसके पास से कोई वसूली नहीं हुई। मामले में सह-आरोपित देवी सिंह समेत 12 अन्य को पहले ही जमानत मिल चुकी है। सबसे बड़ी बात, ट्रायल शुरू होने से पहले चार्ज फ्रेम ही नहीं हुए हैं, ऐसे में मुकदमा लंबा खिंचेगा। सरकार की ओर से जमानत का विरोध करते हुए दावा किया गया कि ट्रायल में देरी आरोपित की वजह से है। वह चार्ज फ्रेमिंग पर दलीलें देने के लिए 60 बार से अधिक सुनवाई स्थगित करवा चुका है। आरोपित के खिलाफ 38 अन्य मामले दर्ज हैं, और यह करोड़ों के घोटाले का केस है, इसलिए गंभीरता को देखते हुए जमानत ना दी जाए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने इसे न्याय व्यवस्था की पूर्ण विफलता बताते हुए चिंता जताई। न्यायमूर्ति ने कहा कि कोई आरोपी तब तक अपराधी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसका अपराध कानूनी रूप से सिद्ध ना हो। सालों जेल में रखना सजा देने जैसा है, जो संविधान की आत्मा के विरुद्ध है। देरी का ठीकरा सिर्फ आरोपित के सिर नहीं फोड़ा जा सकता, खासकर जब अभियोजन पक्ष खुद तत्परता नहीं दिखा रहा।