31 May 2026
नई दिल्ली, 31 मई (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति केवल आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति में नहीं, बल्कि उसकी सभ्यतागत चेतना, सांस्कृतिक परंपराओं और नैतिक मूल्यों में निहित है। उन्होंने कहा कि इस विरासत का संरक्षण राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य आवश्यकता है।
रविवार को शंकर लाल कॉन्सर्ट हॉल में आयोजित पुस्तक ‘प्रथम सिंधु कुंभ : आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व’ के विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। कार्यक्रम का आयोजन सिंधु दर्शन समिति द्वारा किया गया।
अपने संबोधन में विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि यह आयोजन केवल पुस्तक विमोचन तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की सभ्यतागत विरासत और सांस्कृतिक चेतना से पुनः जुड़ने का महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने पुस्तक के प्रकाशन के लिए समिति को बधाई देते हुए डॉ. इन्द्रेश कुमार तथा डॉ. दयालु जी महाराज के प्रयासों की सराहना की।
गुप्ता ने कहा कि सिंधु नदी केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृति और सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि ‘हिंद’, ‘हिंदू’ और ‘हिंदुस्तान’ जैसे शब्दों की ऐतिहासिक जड़ें भी सिंधु से जुड़ी हैं। उनके अनुसार सिंधु भारत की उस निरंतर सभ्यतागत यात्रा का प्रतीक है, जिसने हजारों वर्षों से देश की सांस्कृतिक चेतना को आकार दिया है।
उन्होंने कहा कि देश में भाषाओं, परंपराओं और जीवन-शैलियों की विविधता होने के बावजूद उसकी सांस्कृतिक आत्मा एक है। यही एकता भारत की स्थायी शक्ति रही है और सिंधु उसी सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतीक है, जो देशवासियों को क्षेत्रों और पीढ़ियों की सीमाओं से परे जोड़ती है।
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि तकनीकी प्रगति और तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश के दौर में युवा पीढ़ी कई बार अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होती दिखाई देती है। ऐसे समय में भारत की सभ्यतागत विरासत का दस्तावेजीकरण करने वाली पुस्तकें और सांस्कृतिक पहलें ऐतिहासिक स्मृति के संरक्षण तथा सांस्कृतिक जागरूकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
उन्होंने प्रथम सिंधु कुंभ को आध्यात्मिक चिंतन, सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक समरसता से समाज को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताते हुए कहा कि कुंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामूहिक ज्ञान-विमर्श का भी सशक्त मंच रहा है।
इस अवसर पर उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक सांस्कृतिक जागरूकता और राष्ट्रीय एकता को और अधिक सुदृढ़ करेगी तथा नई पीढ़ी को भारत की समृद्ध सभ्यतागत धरोहर के प्रति प्रेरित करेगी। कार्यक्रम में संत-महात्माओं, शिक्षाविदों, विद्वानों एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।