14 Apr 2026
जोधपुर, 14 अपै्रल (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद के एक अहम मामले में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में तैनात एक महिला जवान के पक्ष में फैसला सुनाया है। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने पति द्वारा नौकरी छोडऩे का दबाव बनाने, 10 लाख रुपए की मांग करने, क्रिमिनल रिकॉर्ड और 10 साल से अलग रहना को क्रूरता व परित्याग मानते हुए तलाक की डिक्री जारी की है। कोर्ट ने चूरू के सरदारशहर की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें महिला की याचिका खारिज कर दी गई थी। चूरू जिले के एक गांव की अपीलार्थी वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में बीएसएफ में कार्यरत हैं। उसकी शादी साल 2009 को चूरू के एक अन्य गांव के रहने वाले व्यक्ति के साथ हुई थी। दोनों की सात साल की एक बेटी है, जो महिला जवान के पास है। याचिका में बताया गया कि शादी के बाद से ही पति और ससुराल वालों ने 10 लाख रुपए और एक पॉश इलाके में मकान की मांग को लेकर उसके साथ मारपीट शुरू कर दी। पति उसकी सैलरी छीनकर शराब पर उड़ा देता था। कोर्ट के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि पति क्रिमिनल प्रवृत्ति का है और भानीपुरा थाने में दर्ज एक मामले में वह कस्टडी में भी रह चुका है, जिससे पत्नी हमेशा खौफ और असुरक्षा में रहती थी। जब महिला को वर्ष 2013 में सरकारी नौकरी (बीएसएफ में) मिली, तो पति ने उस पर नौकरी से इस्तीफा देने का भारी दबाव बनाया। फैमिली कोर्ट में दिए गए अपने जवाब में पति ने पत्नी पर बेहद आपत्तिजनक आरोप लगाए। पति ने आरोप लगाया कि सरकारी नौकरी मिलने के बाद उसकी पत्नी खुद को महान समझने लगी है और किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संबंधों में है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना कि एक कामकाजी महिला पर करियर छोडऩे का दबाव बनाना और उसकी गरिमा व चरित्र पर आधारहीन आरोप लगाना स्पष्ट रूप से गंभीर मानसिक क्रूरता की कैटेगिरी में आता है। खंडपीठ ने इस बात पर गौर किया कि पति-पत्नी मई 2015 से यानी पिछले 10 वर्षों से ज्यादा समय से पूरी तरह अलग रह रहे हैं। इतने लंबे अलगाव के बाद उनके बीच वैवाहिक संबंध बहाल होने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। मामले की गंभीरता इस बात से भी साबित होती है कि नोटिस मिलने के बावजूद पति हाईकोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ। कोर्ट ने इसे पति की मौन सहमति माना और हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13 के तहत महिला जवान की अपील स्वीकार करते हुए तलाक के फैसले पर मुहर लगा दी।