21 Apr 2026
नई दिल्ली, 21 अप्रैल (हि.स.)। सबरीमाला मंदिर मामले पर सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय की नौ सदस्यीय संविधान बेंच ने जन्म या वंश के आधार पर भक्तों को मूर्ति छूने से रोकने पर सवाल उठाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान बेंच ने पूछा कि क्या संविधान उस भक्त की रक्षा नहीं करेगा जिसे मूर्ति छूने की अनुमति नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने ये सवाल सबरीमाला मंदिर की ओर से पेश वकील वी गिरी की उस दलील पर किया कि जब कोई भक्त पूजा के लिए मंदिर जाता है तो वह देवता के गुणों के खिलाफ नहीं जा सकता, क्योंकि उसका उद्देश्य देवता की पूजा करना है। उसे देवता के मूल गुणों को स्वीकार करना होता है। सुनवाई के दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने पूछा कि जब मैं किसी मंदिर में जाता हूं, तो मेरी मान्यता होती है कि वह भगवान हैं, वह मेरे सृष्टिकर्ता हैं। इसी आस्था के साथ मैं वहां जाता हूं। मैं पूरी तरह समर्पित हूं, मेरे ह्रदय में कोई अशुद्धता नहीं है और वहां मुझे बताया जाता है कि जन्म, वंश या किसी विशेष परिस्थिति के कारण आपको देवता को छूने की अनुमति नहीं है। अब क्या संविधान मेरी मदद नहीं करेगा। इस पर सबरीमाला मंदिर प्रबंधन कमेटी की ओर से वकील वी गिरी ने कहा कि अगर किसी के पुजारी बनने पर पूर्ण प्रतिबंध है तो इसका ध्यान संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत रखा जाए या इसका ध्यान राज्य द्वारा रखा जाए। गिरी ने कहा कि पुजारी का अर्थ वह व्यक्ति है जिसे शास्त्रों में पूजा-अर्चना करने और देवता आराधना करने का निर्देश दिया गया है। गिरी ने कहा कि अनुच्छेद 25(1) के तहत मेरा अधिकार मंदिर के भीतर अपनाई जाने वाली प्रथाओं के साथ जुड़ा हुआ है। शास्त्रों के मुताबिक केवल एक विशेष संप्रदाय के पुजारी ही मूर्ति को छू सकते हैं। अगर कोई अनाधिकृत व्यक्ति मूर्ति को छूता है तो उसे अपवित्रता माना जाता है। ऐसे में राज्य का कोई भी हस्तक्षेप हिन्दू उपासकों की धार्मिक आस्था का उल्लंघन होगा। सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि कुछ मंदिरों में आप शिवलिंग पर जल चढ़ा सकते हैं, जबकि अन्य में आप मूर्ति छू भी नहीं सकते। यह छुआछूत से जुड़ा नहीं है, बल्कि पूजा की एक विशेष विधि का हिस्सा है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनाराय़ण ने धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अदालतों को अनिवार्य धार्मिक प्रथा परीक्षण को पूरी तरह त्याग देना चाहिए। अगर किसी प्रथा का धर्म से संबंध है, तो संप्रदाय जो कहता है, कोर्ट को उसे मान लेना चाहिए। एक गैर-धार्मिक अदालत को इन प्रथाओं का परीक्षण नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैसे अल्पसंख्यक संस्थानों को सामान्य संस्थानों से ज्यादा स्वायतता मिलती है वैसे ही धार्मिक संप्रदायों को भी अपने मामलों को प्रबंधित करने की अधिक छूट मिलनी चाहिए। इसके पहले सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि किसी संप्रदाय की प्रथाएं न्यायिक जांच का विषय हो सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि था आस्था से जुड़े मामलों पर फैसला सुनाते समय जजों को अपने निजी धार्मिक विश्वासों से ऊपर उठना चाहिए और अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा व्यापक संवैधानिक ढांचे से निर्देशित होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय की 9 जजों की संविधान बेंच ने इस मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरु की थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस एजे मसीह, जस्टिस पीबी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। उच्चतम न्यायालय ने 28 सितंबर 2018 को 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं के साथ काफी समय से भेदभाव होता रहा है। महिला पुरुष से कमतर नहीं है। एक तरफ हम महिलाओं को देवी स्वरुप मानते हैं दूसरी तरफ हम उनसे भेदभाव करते हैं। कोर्ट ने कहा था कि बायोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल वजहों से महिलाओं के धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता को खत्म नहीं किया जा सकता है।