20 Jun 2026
-विकास सक्सेना प्रख्यात शायर मिर्जा गालिब का बहुचर्चित शेर ‘उम्र भर गालिब यही भूल करता रहा, धूल चेहरे पर थी आइना साफ करता रहा’, इन दिनों विपक्षी राजनैतिक दलों के प्रमुख नेताओं और कर्णधारों पर काफी सटीक बैठ रहा है। पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद से क्षेत्रीय दलों के नेताओं में दलबदल की भगदड़ मची हुई है। इससे बौखलाए क्षेत्रीय दलों के नेता ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं के दुरूपयोग का आरोप लगाकर भाजपा को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं तो भाजपा और राजग के नेता इसके लिए विपक्षी दलों के अपरिपक्व नेतृत्व, ढुलमुल नीतियों, जनता से दूरी और वैचारिक अक्षमता आदि को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। गली-नुक्कड़ पर होने वाली चर्चाओं का स्थान ले चुके सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर राजनैतिक निष्ठा बदलने वाले इन नेताओं पर लोग अपने सियासी झुकाव के अनुसार टीका टिप्पणी कर रहे हैं। कोई इन्हें डरपोक और अवसरवादी बता कर कोस रहा है तो कोई क्षेत्रीय दलों के शीर्ष नेतृत्व की खामियां गिनाकर इनके कदम को उचित ठहराने की कोशिश में जुटा हुआ हैसही मायने में देखा जाए तो कोई भी नेता जब किसी दल में रहते हुए राजनैतिक असुरक्षा के भाव से घिर जाता है तो वह अपने सुरक्षित राजनैतिक भविष्य के आश्वासन के साथ उपहार स्वरूप मिलने वाले लाभों के लिए राजनैतिक निष्ठाएं बदलने का मौका नहीं गंवाता। सामान्यतौर पर दलबदल सत्ताधारी दल के पक्ष में या सत्ता परिवर्तन के लिए होता है इसलिए इसके ईनाम स्वरूप बड़े पद मिलना स्वभाविक सी बात है, कई बार तो दलबदल करने वाले नेता राज्य के मुख्यमंत्री तक का पद हासिल करने में कामयाब रहे हैं। हालांकि राजनैतिक निष्ठा बदलते समय ये नेता सबसे ज्यादा दुहाई पुराने दल में हुए वैचारिक पतन की देते हैं लेकिन हकीकत है कि अपवाद स्वरूप कुछ मामलों को छोड़ दें तो शायद ही कभी सिर्फ विचारधारा में बदलाव की वजह से किसी नेता ने दलबदल का रास्ता अपनाया हो।सत्ताधारी दल पर अक्सर ताकत का दुरूपयोग करके विपक्षी दलों में तोड़फोड़ करने के आरोप लगाए जाते हैं। केंद्र की सत्ता पर काबिज दलों पर तो आमतौर पर सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और आयकर विभाग जैसी केेद्रीय संस्थाओं का दुरूपयोग करके विपक्षी नेताओं को डराने धमकाने की चर्चा होती रहती है। इन दिनों मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर आरोप लगाने वाले भी जानते हैं कि समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती पर आय से अधिक सम्पत्ति का मामला कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार के दौरान दर्ज किया गया था। यूपीए शासनकाल में एआईएडीएमके नेत्री जयललिता और वाईएसआर कांग्रेस के जगनमोहन रेड्डी भी केंद्रीय जांच संस्थाओं के निशाने पर रहे। ऐसा नहीं है कि जांच के दायरे में आए इन नेताओं ने ताकत का दुरूपयोग नहीं किया होगा लेकिन सवाल यह है कि इनके खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई का उद्देश्य दोषियों को दंडित करना था या अपने राजनैतिक हित साधना। पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद राजनैतिक दलों में हैरान करने वाली भगदड़ मची है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली खबरें पश्चिम बंगाल से आ रही हैं। चुनावी नतीजे आने के एक महीने के भीतर ही पिछले 15 साल पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज रही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के समाने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। संघर्ष के दम पर 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने वाली ममता दीदी की टीएमसी ने इस बार के विधानसभा चुनावों में 80 सीटों पर जीत दर्ज की, लेकिन उसके 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बगावत कर दी। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष रविन्द्र नाथ बोस को चिट्ठी लिखकर अगल गुट के तौर पर मान्यता देने की मांग की। उनके गुट को मान्यता मिल गई है और ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुने गए हैं। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में त्रिपुरा के एक गुमनाम से राजनैतिक दल नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इण्डिया (एनसीपीआई) में शामिल होने का ऐलान किया है। इस बावत उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भी लिखा है। एनसीपीआई राजग का हिस्सा है जबकि इन बागी सांसदों में चंद हफ्ते पहले तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा के कटु आलोचक रहे टीएमसी नेता सुदीप बंदोपाध्याय, सायोनी घोष और उनकी नेता काकोली घोष दस्तीदार भी शामिल हैंहाल के दिनों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के अलावा, अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में बड़ी टूट हुई है। इनमें से टीएमसी में भगदड़ की पटकथा तो 2021 में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद ही लिख दी गई थी। तब जीत के नशे में चूर तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों ने विरोधियों के घरों को आग लगा दी, उनकी सम्पत्ति लूट ली, महिलाओं से बलात्कार तक के आरोप लगे। अनेक लोगों को जान बचाने के लिए दूसरे राज्य में शरण लेनी पड़ी। कई लोगों ने नाक रगड़कर और सिर मुंडवाकर भाजपा का साथ देने का ‘प्रायश्चित’ किया फिर उन्हें वापस टीएमसी में शामिल किया गया। अब भाजपा की प्रचण्ड जीत के बाद टीएमसी नेताओं को भी इसी तरह के व्यवहार खौफ सता रहा है, इसीलिए वे ममता दीदी से पीछा छुड़ा रहे हैं। उन्हें पता है कि पश्चिम बंगाल की नई सरकार का नेतृत्व टीएमसी की राजनैतिक संस्कृति में पले बड़े सुबेंदू अधिकारी के हाथ मेंसात राज्यसभा सांसदों के साथ आम आदमी पार्टी छोड़ने वाले राघव चड्ढा ने निष्ठा बदलने के पीछे राजनैतिक शुचिता और नैतिकता के बड़े बड़े कारण गिनाए हैं लेकिन उनकी अन्तरात्मा उस समय नहीं जगी जब पार्टी के संस्थापक सदस्यों और लोकपाल को बाहर का रास्ता दिखाया गया, जब उनके नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे, उनके नेता जेल जाकर भी मंत्री और मुख्यमंत्री का पद छोड़ने को राजी नहीं हुए और तब भी नहीं जब उनकी साथी राज्यसभा सांसद स्वाती मालीवाल ने अरविन्द केजरीवाल पर घर बुलाकर मारपीट करने के गंभीर आरोप लगाए। शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों के दल बदल में एक कारण वैचारिक विचलन हो सकता है क्योंकि बाला साहेब ठाकरे ने जिस विचारधारा के साथ शिवसेना बनाई थी, मुख्यमंत्री बनने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर उद्धव ठाकरे उससे उलटे रास्ते पर चल पड़े। लेकिन अगर सिर्फ यही एक कारण होता तो वह भी एकनाथ शिंदे के साथ 2022 में उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ चुके हलोकसभा और राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत न होने के कारण बीते अप्रैल में हुए संसद सत्र के दौरान विधायी संस्थाओं में महिलाओं का आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए परिसीमन संबंधी 131वां संविधान संशोधन पारित कराने में नाकाम रही भाजपा निश्चित तौर पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इसके लिए सभी हथकंडे अपना रही होगी। लेकिन क्या सिर्फ भाजपा के प्रयासों से इस तरह का राजनैतिक भूचाल आ पाना संभव है? दरअसल इस राजनैतिक भूचाल का वास्तविक कारण क्षेत्रीय दलों की मतदाताओं कमजोर होती पकड़ और उनके उम्मीदवारों की चुनावी जीत की घटती संभावना है जिसे स्वीकार करने के लिए इनके नेता और रणनीतिकार तैयार नहीं हैं। सत्ता में रहते इन दलों ने जिस अराजकता और भ्रष्टाचार को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन दिया था आज वही उनके गले की फांस बन गया है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)