09 Jul 2026
दधिबल यादव
बिहार की राजनीति में कुछ फैसले समय के साथ केवल प्रशासनिक नहीं रह जाते बल्कि सरकार की आर्थिक सोच और राजनीतिक विश्वसनीयता की कसौटी बन जाते हैं। राज्य सरकार द्वारा सड़कों और पुलों पर फिर से टोल टैक्स लगाने की तैयारी भी ऐसा ही एक निर्णय है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो यह आठ वर्ष पहले लिये गए उस फैसले के उलट होगा, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2018 में राज्य सरकार के अधीन पुलों पर टोल टैक्स समाप्त कर दिया था। उस समय तर्क दिया गया था कि टोल वसूली से होने वाली आय, उसके संग्रहण पर होने वाले खर्च से बहुत अधिक नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया था कि टोल हटने से परिवहन लागत घटेगी, व्यापार को गति मिलेगी और आम लोगों को राहत मिलेगी।
अब सवाल यह है कि क्या आठ वर्षों में परिस्थितियां इतनी बदल गई हैं कि वही सरकार—या उसी गठबंधन की सरकार—उस फैसले को पलटने की जरूरत महसूस कर रही है? यदि हां, तो जनता को इसका स्पष्ट आर्थिक औचित्य भी बताया जाना चाहिए। पिछले हफ्ते सम्राट सरकार ने स्टेट हाईवे और राज्य के पुलों पर बड़ा ऐलान करते हुए उन पर टोल लगाने का फैसला किया है। सरकार ने पथ उपयोगकर्ता शुल्क नियमावली 2026 को मंजूरी दे दी है। टोल की रकम भी तय की है। कार जीप और हल्के वाहनों को नेशनल हाइवे के इतर अब राज्य के हाइवे पर चलने के लिए 1.25 रुपये प्रति किलोमीटर का टोल देना होगा। बिहार में स्टेट हाइवे का दायरा 3614 किलोमीटर तक है। इस लिहाज से एनएचएआई के फॉर्मूले पर मापें तो सरकार 62 टोल बनाएगी और इन टोलों से टैक्स की वसूली होगी।
बिहार का वार्षिक बजट लगातार बढ़ा है। 2025-26 का बजट तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक का है और सड़क, पुल तथा आधारभूत संरचना पर हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। राज्य में पिछले डेढ़ दशक में हजारों किलोमीटर सड़कें बनी हैं और सैकड़ों नए पुल तैयार हुए हैं। स्वाभाविक है कि इनके रखरखाव का खर्च भी तेजी से बढ़ा है। वित्तीय दृष्टि से सरकार यह तर्क दे सकती है कि जो व्यक्ति सड़क और पुल का उपयोग कर रहा है, उसके रखरखाव में उसका भी योगदान होना चाहिए। दुनिया के अनेक देशों में "यूजर-पे" सिद्धांत इसी आधार पर लागू है। लेकिन आर्थिक सिद्धांत का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भारत में कुल माल परिवहन का लगभग दो-तिहाई हिस्सा सड़क मार्ग से होता है। किसी भी राज्य में परिवहन लागत बढ़ने का पहला असर ट्रांसपोर्टरों पर और अंतिम असर उपभोक्ता पर पड़ता है। यदि बिहार के राज्य मार्गों और पुलों पर अतिरिक्त टोल लगाया जाता है तो ट्रक, बस और व्यावसायिक वाहन संचालक इस अतिरिक्त लागत को मालभाड़े में जोड़ेंगे। इसका असर केवल परिवहन उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा। खाद्यान्न, फल-सब्जी, दूध, सीमेंट, स्टील, उर्वरक, दवा और निर्माण सामग्री—लगभग हर वस्तु की कीमत पर इसका असर पड़ सकता है। यही कारण है कि अर्थशास्त्री टोल को केवल सड़क उपयोग शुल्क नहीं, बल्कि एक प्रकार का अप्रत्यक्ष आर्थिक भार भी मानते हैं।
सरकार के सामने दूसरा बड़ा प्रश्न विश्वसनीयता का है। 2018 में टोल समाप्त करते समय स्वयं सरकार ने कहा था कि कई टोल प्लाजा घाटे का सौदा बन चुके हैं। कर्मचारियों का वेतन, सुरक्षा व्यवस्था, ठेकेदारी और प्रशासनिक खर्च जोड़ने के बाद शुद्ध आय बहुत कम बचती थी। यदि अब तकनीक, फास्टैग या डिजिटल संग्रहण के कारण व्यवस्था लाभकारी हो गई है तो सरकार को उसके वित्तीय आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि प्रस्तावित टोल से सकल राजस्व कितना होगा, संग्रहण पर कितना खर्च आएगा और वास्तविक शुद्ध आय कितनी बचेगी।
एक और प्रश्न दोहरे कराधान का भी है। वाहन मालिक पहले ही रोड टैक्स, पंजीकरण शुल्क, डीजल-पेट्रोल पर कर और राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल का भुगतान करते हैं। ऐसे में यदि राज्य सरकार अपने पुलों पर अलग से टोल लगाएगी तो आम नागरिक यह पूछने का अधिकार रखता है कि सड़क अवसंरचना के लिए आखिर उसे कितनी बार भुगतान करना होगा।
सरकार यह तर्क दे सकती है कि राष्ट्रीय राजमार्गों की तरह राज्य मार्गों के रखरखाव के लिए भी अलग वित्तीय स्रोत आवश्यक है। यह तर्क पूरी तरह असंगत नहीं है। लेकिन इसके साथ पारदर्शिता की भी उतनी ही आवश्यकता है। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि टोल से प्राप्त राशि सामान्य राजस्व में जाएगी या केवल सड़क एवं पुलों के रखरखाव पर ही खर्च होगी। यदि इसके लिए पृथक "रोड मेंटेनेंस फंड" बनाया जाता है और उसकी वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाती है तो जनता का विश्वास बढ़ सकता है।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह निर्णय कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। बिहार पहले से ही महंगाई, बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों से जूझ रहा है। ऐसे समय में यदि परिवहन लागत बढ़ती है तो उसका असर ग्रामीण बाजारों तक जाएगा। कृषि उत्पादों के परिवहन की लागत बढ़ेगी और छोटे व्यापारियों का मार्जिन घटेगा। विपक्ष इसे "महंगाई टैक्स" बताकर राजनीतिक मुद्दा बनाएगा, जबकि सरकार इसे विकास और रखरखाव की अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत करेगी।
यह भी याद रखना चाहिए कि सड़कें केवल निर्माण से नहीं, नियमित रखरखाव से टिकाऊ बनती हैं। यदि रखरखाव के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे तो कुछ वर्षों बाद वही सड़कें फिर टूटेंगी और जनता को दोहरी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिए केवल टोल का विरोध भी समाधान नहीं है। असली प्रश्न यह है कि सरकार राजस्व जुटाने का कौन-सा मॉडल अपनाती है।
सबसे बेहतर विकल्प यह हो सकता है कि छोटे निजी वाहनों, एंबुलेंस, स्कूल बसों, कृषि कार्य में लगे वाहनों तथा स्थानीय निवासियों को पर्याप्त छूट दी जाए। भारी व्यावसायिक वाहनों के लिए दूरी और भार के अनुसार वैज्ञानिक शुल्क निर्धारित हो। पूरी व्यवस्था डिजिटल हो, नकद वसूली समाप्त हो और प्रत्येक वर्ष सार्वजनिक रूप से यह बताया जाए कि टोल से कितनी आय हुई तथा उसका कितना हिस्सा सड़क रखरखाव पर खर्च किया गया।
लोकतांत्रिक शासन में कर या शुल्क केवल राजस्व का विषय नहीं होता, वह सरकार और नागरिकों के बीच विश्वास का भी प्रश्न होता है। यदि नागरिकों को बेहतर सड़कें, सुरक्षित पुल, समयबद्ध मरम्मत और पारदर्शी व्यवस्था दिखाई देगी तो वे उपयोगकर्ता शुल्क को अधिक सहजता से स्वीकार करेंगे। लेकिन यदि टोल केवल राजस्व संग्रह का माध्यम बनकर रह गया और सुविधाओं में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ, तो जनता इसे अतिरिक्त आर्थिक बोझ ही मानेगी।
इसलिए बिहार सरकार को इस विषय पर जल्दबाजी से बचना चाहिए। एक श्वेतपत्र जारी कर यह बताना चाहिए कि 2018 में टोल समाप्त करने से कितना राजस्व छूटा, वर्तमान में रखरखाव पर कितना खर्च हो रहा है, प्रस्तावित टोल से कितनी आय होने का अनुमान है और उससे जनता को क्या प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।
सड़कें विकास की धमनियां होती हैं। उन पर लगाया गया हर शुल्क अंततः राज्य की अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित करता है। इसलिए टोल टैक्स की वापसी का निर्णय केवल वित्त विभाग की फाइल का विषय नहीं, बल्कि बिहार की विकास नीति, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और आम नागरिक की क्रयशक्ति से जुड़ा हुआ प्रश्न है। सरकार यदि इस संतुलन को साध लेती है तो टोल विकास का साधन बन सकता है, अन्यथा यह महंगाई की नई दस्तक के रूप में याद किया जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)