03 Jul 2026
दधिबल यादव
भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर इन दिनों एक बड़े नीतिगत और तकनीकी चौराहे पर खड़ा है। देश के पेट्रोल पंपों पर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा एथनॉल मिश्रित ईंधन (Ethanol Blended Petrol) इस समय चर्चा, आशंकाओं और कानूनी पेचीदगियों के केंद्र में है। एक तरफ सरकार इसे देश की ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत और पर्यावरण संरक्षण के अचूक नुस्खे के रूप में पेश कर रही है, तो दूसरी तरफ उपभोक्ताओं का एक बड़ा वर्ग—विशेषकर सोशल मीडिया पर सक्रिय कार मालिक—इंजन खराब होने के दावों के साथ डरा हुआ है। इस बहस को सबसे बड़ा मोड़ तब मिला जब सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने स्वीकार किया कि फिलहाल एथनॉल का उपयोग 'परीक्षण के दौर' में है।
यह विरोधाभास कि जो ईंधन पंपों पर बिकने लगा है, वह तकनीकी रूप से अभी 'ट्रायल' के दौर में है, इस पूरी नीति के क्रियान्वयन, इसके पीछे के राजनीतिक अर्थशास्त्र और उपभोक्ता अधिकारों पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। दरअसल, एथनॉल बुनियादी रूप से एक अल्कोहल (एथिल अल्कोहल) है, जिसे मुख्य रूप से गन्ने के रस, शीरे (Molasses), मक्का और क्षतिग्रस्त खाद्यान्नों से तैयार किया जाता है। रासायनिक रूप से एथनॉल में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है, जो ईंधन के बेहतर दहन (Combustion) में मदद करती है और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को कम करती है। लेकिन, सिक्के का दूसरा पहलू इसकी भौतिक और रासायनिक प्रकृति है।
एथनॉल की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह हवा से नमी (पानी) को बहुत तेजी से सोखता है। जब पेट्रोल में एथनॉल मिलाया जाता है और गाड़ी लंबे समय तक खड़ी रहती है, तो यह नमी सोखकर 'फेज सेपरेशन' (Phase Separation) की स्थिति पैदा करता है। यानी पानी और एथनॉल का मिश्रण टैंक के नीचे बैठ जाता है और पेट्रोल ऊपर रह जाता है। यह गाढ़ा और अम्लीय मिश्रण जब इंजन में जाता है, तो मिसफायरिंग और स्टार्टिंग की समस्या पैदा करता है। एथनॉल रबर, प्लास्टिक और कुछ धातुओं (जैसे एल्युमिनियम और तांबा) के प्रति बेहद संक्रामक होता है। पुरानी कारें और मोटरसाइकिलें, जो 'E10' (10% एथनॉल) या 'E20' (20% एथनॉल) के लिए अनुकूलित (Compliant) नहीं हैं, उनके फ्यूल पंप, होज पाइप, इंजेक्टर्स और कार्बोरेटर के समय से पहले खराब होने का खतरा शोध में साबित हो चुका है। एथनॉल का ऊर्जा घनत्व शुद्ध पेट्रोल की तुलना में लगभग 33% कम होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि एथनॉल मिश्रण का अनुपात जितना बढ़ेगा, गाड़ी का माइलेज उतना ही कम होगा। उपभोक्ताओं की यह शिकायत तकनीकी रूप से पूरी तरह जायज है कि एथनॉल मिश्रित पेट्रोल से उनकी गाड़ियों का औसत गिर रहा है।
एथनॉल नीति को सिर्फ एक पर्यावरणीय पहल के रूप में देखना इसकी अधूरी व्याख्या होगी। इसके पीछे एक मजबूत राजनीतिक और आर्थिक ताना-बाना है, जिसे 'एथनॉल का राजनीतिक अर्थशास्त्र' कहा जा सकता है। अगर आर्थिक आयाम की बात करें तो भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। एथनॉल सम्मिश्रण से सालाना अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत का अनुमान है। चीनी उद्योग लंबे समय से अधिशेष उत्पादन और बकाए के संकट से जूझ रहा था। एथनॉल ने मिलों को एक नया और आकर्षक रेवेन्यू मॉडल दिया है। अगर इसके राजनीतिक आयाम की बात करें तो गन्ना किसानों को समय पर भुगतान और मक्का उत्पादकों को बेहतर दाम देना देश के बड़े चुनावी राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक) में राजनीतिक जीवनरेखा है। कारपोरेट लॉबिंग के नजरिये से देखा जाए तो देश के बड़े डिस्टिलरी मालिक और चीनी मिल लॉबी सरकार की इस नीति के सबसे बड़े पैरोकार और लाभार्थी हैं।
सरकार का लक्ष्य 2025-26 तक पेट्रोल में 20% एथनॉल मिश्रण (E20) हासिल करने का है। यह लक्ष्य पर्यावरण और आत्मनिर्भरता के लिहाज से जितना आकर्षक है, राजनीतिक मोर्चे पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को साधने का उतना ही बड़ा हथियार भी है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इस राजनीतिक जल्दबाजी में तकनीकी सुरक्षा उपायों और उपभोक्ता जागरूकता को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार का यह बयान कि "एथनॉल अभी परीक्षण के दौर में है", नीतिगत मोर्चे पर एक गंभीर चूक को उजागर करता है। यदि यह परीक्षण के दौर में है, तो देश के करोड़ों अनभिज्ञ वाहन मालिकों को इसे सीधे पंपों पर क्यों परोसा जा रहा है? एक बड़ा सवाल है कि क्या जनता की गाड़ियां और उनकी गाढ़ी कमाई इस राष्ट्रीय परीक्षण की प्रयोगशाला बनने के लिए मजबूर हैं?
भारतीय सड़कों पर चल रहे वाहनों का एक बहुत बड़ा हिस्सा 'BS-IV' या उससे भी पुराने मानकों का है। ये वाहन E10 या E20 ईंधन के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। कार निर्माताओं (OEMs) ने 2023 के बाद से 'E20 ट्यून' इंजन बनाने शुरू किए हैं। ऐसे में पुराने वाहनों के मालिकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता, क्योंकि अधिकांश पेट्रोल पंपों पर अब सामान्य (गैर-मिश्रित) पेट्रोल मिलना बंद हो चुका है। सरकार का यह रवैया उपभोक्ता अधिकारों के 'चॉइस के सिद्धांत' (Principle of Choice) का उल्लंघन प्रतीत होता है। हरित ईंधन की दिशा में बढ़ना समय की मांग है, और भारत पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे नहीं हट सकता। लेकिन इस बदलाव की कीमत देश के मध्यम वर्ग और वाहन मालिकों के इंजन की बलि देकर नहीं चुकाई जानी चाहिए।
इस संकट के समाधान के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने अनिवार्य हैं। पहला- पेट्रोल पंपों पर स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए कि किस नोजल से E10, E20 या सामान्य पेट्रोल निकल रहा है, ताकि उपभोक्ता अपनी गाड़ी की क्षमता के अनुसार ईंधन चुन सके। दूसरा- सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियों को मिलकर एक ऐसी किफायती 'रेट्रोफिटिंग किट' या संक्षारण रोधी एडिटिव्स (Additives) बाजार में लाने चाहिए, जो पुरानी गाड़ियों के इंजन को एथनॉल के दुष्प्रभावों से बचा सकें। तीसरा- परीक्षण के आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। ऑटोमोबाइल कंपनियों को जिम्मेदारी लेनी होगी कि यदि अनुशंसित ईंधन से इंजन समय से पहले खराब होता है, तो वारंटी के तहत उसकी सुरक्षा कैसे होगी।
एथनॉल नीति भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता का एक महत्वाकांक्षी स्वप्न है, लेकिन इस स्वप्न को हकीकत में बदलने के लिए प्रशासनिक हड़बड़ी और राजनीतिक तुष्टिकरण से बचना होगा। जब तक नीतिगत स्पष्टता, तकनीकी सुदृढ़ता और उपभोक्ता के विश्वास का त्रिकोण मजबूत नहीं होगा, तब तक हरित ईंधन की यह बहस पर्यावरण बनाम हकीकत के दलदल में फंसी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सरकार के लिए एक चेतावनी है कि वह 'ट्रायल' और 'वितरण' के बीच की खाई को जल्द से जल्द वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीके से भरे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)