20 Jun 2026
नई दिल्ली, 20 जून (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा है कि जब बहस गरिमा, तर्क और तथ्यों पर आधारित होती है, तभी लोकतंत्र सशक्त बनता है। उन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ का उद्देश्य किसी व्यक्ति को पराजित करना नहीं, बल्कि सत्य की खोज करना है।
नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में ‘वर्तमान समय में शास्त्रार्थ’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा का पुनर्जीवन आज केवल दार्शनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक और लोकतांत्रिक आवश्यकता भी बन गया है। यह संगोष्ठी इंडियन काउंसिल ऑफ फिलॉसफिकल रिसर्च और भारत बोध केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई।
उन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है। उपनिषदों के संवादों तथा आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्रा के ऐतिहासिक शास्त्रार्थ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता ने सदैव तर्कपूर्ण संवाद, बौद्धिक चिंतन और सत्य की खोज को सर्वोच्च स्थान दिया है। उनके अनुसार, भारतीय परंपरा में सत्य को कभी आरोपित नहीं किया गया, बल्कि उसे विचार-विमर्श और तर्क की कसौटी पर परखा गया है।
विधानसभा अध्यक्ष ने वर्तमान संवाद संस्कृति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सूचना-समृद्ध युग में भी धैर्यपूर्वक सुनने और सार्थक संवाद की प्रवृत्ति कमजोर होती दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का मंच दिया है, लेकिन समाज को भिन्न विचारों को सुनने और समझने की संस्कृति भी विकसित करनी होगी।
उन्होंने शास्त्रार्थ और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच समानता स्थापित करते हुए कहा कि विधानमंडलों में होने वाली बहसें प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा का आधुनिक स्वरूप हैं। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति तब सामने आती है जब विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों को अभिव्यक्ति और विमर्श का अवसर मिलता है।
गुप्ता ने कहा कि शास्त्रार्थ और सामान्य विवाद में मूल अंतर यह है कि शास्त्रार्थ का लक्ष्य सत्य की खोज होता है, जबकि विवाद का उद्देश्य अक्सर दूसरे पक्ष को पराजित करना होता है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की उदारता, निष्पक्षता और खुले विचारों की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि आज भी आत्मसंयम, करुणा, त्याग और संवाद जैसे मूल्य समाज को दिशा देने में सक्षम हैं।
संगोष्ठी के आयोजकों को बधाई देते हुए उन्होंने विश्वास जताया कि दो दिवसीय विचार-मंथन से आधुनिक संदर्भों में शास्त्रार्थ परंपरा को पुनर्जीवित करने के नए और प्रभावी मार्ग सामने आएंगे। उन्होंने युवाओं, विद्वानों और नागरिकों से ऐसी संवाद संस्कृति को बढ़ावा देने का आह्वान किया, जिसमें मतभेद मनभेद में न बदलें और सत्य की खोज सम्मानजनक विमर्श के माध्यम से हो।