09 Aug 2026
-हृदयनारायण दीक्षित
भारतीय स्वतंत्रता 78 वर्ष की हो गई है। अगस्त स्वाधीनता और क्रांति की पवित्र यादों का महीना है। 1942 की क्रांति ने ब्रिटिश सरकार के छक्के छुड़ा दिए थे। 9 अगस्त 1942 के दिन ‘भारत छोड़ो‘ आंदोलन की घोषणा हुई। संयोग है कि 5 वर्ष बाद अगस्त में ही भारत स्वाधीन भी हुआ। अगस्त क्रांति में पूरा देश सम्मिलित था। कांग्रेस बेमन आन्दोलन का हिस्सा बनी। कांग्रेस कार्यकारिणी (1954) ने एक प्रस्ताव द्वारा अगस्त क्रांति में हुई तोड़फोड़ की निंदा की। इसे दिशाहीन पथ विचलन बताया। प्रस्ताव में प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी के कारण भारत की जनता को ‘मार्गदर्शन विहीन‘ बताया गयअगस्त क्रांति के दो प्रमुख संचालकों अच्युत पटवर्धन व अरुणा आसफ अली ने कांग्रेस अध्यक्ष को 1946 में पत्र लिखा, “आपने जानबूझकर इस तथ्य की अवहेलना की है कि हम लोगों ने आपकी गैरमौजूदगी में दिशा और मार्गदर्शन प्रस्तुत करने का संकल्पपूर्ण प्रयास किया। आपकी राय में अपनाए गए तौर-तरीके अहिंसा की कांग्रेसी नीति से सुसंगत नहीं रहे। जिनके प्राण गए उनकी शहीदी तारीफें लेकिन उनके कार्य की निंदा विरोधाभासी है।“ (कांग्रेस एंड दि क्विट इंडिया मूवमेंट, एसआर बख्शी, पृ. 237-44)।
कांग्रेस ने आंदोलन कर्म की निंदा की और कर्मफल का मजाक उड़ाया। कहा जाता है कि ‘अगस्त क्रांति‘ जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, डॉ. राममनोहर लोहिया और अरुणा आसफ अली जैसे समाजवादी नेताओं की रणनीति से कामयाब हुई। महात्मा गांधी ने अगस्त, 1944 में कहा था, “9 अगस्त, 1942 का दिन मैंने आत्मनिरीक्षण और समझौते के लिए बातचीत का सूत्रपात करने के लिए निश्चित किया था लेकिन सरकार व भाग्य ने कुछ और ही सोच रखा था। तोड़फोड़ और बहुत सारी चीजें कांग्रेस अथवा मेरे नाम पर की गईं।“ (संपूर्ण गांधी वाङ्मय 78/12)गांधी और कांग्रेस ने पूरे क्रांति कर्म और धर्म को ही गलत बताया लेकिन इतिहास ने क्रान्तिकारियों को प्रतिष्ठा दी। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता लीलाधर शर्मा अगस्त क्रांति के एक कार्यकर्ता थे। शर्मा ने अपनी किताब ‘स्वतंत्रता की पूर्व संध्या‘ में लिखा, “संगठित रूप से यदि आंदोलन में कोई कार्य किया गया तो समाजवादी कार्यकर्ताओं की ओर से। नेताओं की गिरफ्तारी के बाद मुंबई सरकार की आँखों में धूल झोंककर उन्होंने देश को एक कार्यक्रम दिया। वे ही अंत तक आंदोलन की ज्योति को जलाए रखने वाले भी थे।“
भारतीय स्वाधीनता संघर्ष को समझने के लिए 1920-30 के बीच के 10 वर्ष महत्त्वपूर्ण हैं। इस दशक में कांग्रेस मृतप्राय थी। गांधी भी करीब-करीब अलग थे, लेकिन कांग्रेस ने इसी दशक के आखिर (1929) में पूर्ण स्वराज की माँग की। इसकी मोटामोटी 6 वजहें थीं - (1) ब्रिटेन में लेबर पार्टी जीती और भारत के कथित मित्र रेम्जे मैकडोनाल्ड प्रधानमंत्री बने। वायसराय ने अक्टूबर 1929 में घोषणा की कि साइमन रिपोर्ट के बाद सर्वदलीय गोलमेज सम्मेलन होगा। (2) इसी दशक के मध्य (1925) में एक प्रख्यात क्रांतिकारी कांग्रेसी नेता डॉ. के.बी. हेडगेवार ने प्रखर हिन्दू राष्ट्रवाद के विचार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनाया। संघ देखते-ही-देखते राष्ट्रीय फलक पर था। (3) भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के क्रांतिधर्म से भारत का अवनि अंबर आंदोलित था। (4) कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारों के नेताओं/कार्यकर्ताओं का दबाव बढ़ा। (5) कम्युनिस्ट विचार और स्वतःस्फूर्त कारणों से किसान मजदूर आंदोलन बढ़े और (6) इन सबके चलते कांग्रेस से मोहभंग का वातावरण बना।कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट था। उसने दिसंबर 1929 में पूर्ण स्वराज की माँग की। सिर्फ 25 दिन बाद (26 जनवरी, 1930 को) प्रथम स्वतंत्रता दिवस भी मना डाला। सविनय अवज्ञा आंदोलन चला। गांधी की गिरफ्तारी हुई लेकिन आंदोलन की घोषणा और समझौता कांग्रेस नीति के अंग थे। गांधी-इरविन वार्ता में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी न देने का भी मुद्दा था। इरविन ने साफ मना किया तो कांग्रेस और गांधीजी ने यह मुद्दा छोड़ दिया। फाँसी के 6 दिन बाद कराची कांग्रेस अधिवेशन में गांधी और कांग्रेस को लेने के देने पड़ गए। मजबूरन शहीदों के पक्ष में एक गांधीवादी प्रस्ताव आया, “किसी भी तरह की राजनैतिक हिंसा से अपने को अलग रखते हुए और उसे अमान्य करते हुए कांग्रेस बलिदान के प्रति अपनी प्रशंसा व्यक्त करती है।“ क्रांति कर्म की निंदा और बलिदान की प्रशंसा कांग्रेस का इतिहास है।
कांग्रेसी इतिहास के अधिकृत लेखक गांधी भक्त पट्टाभिसीतारमैया के अनुसार, “भगत सिंह का नाम सारे देश में गांधीजी की ही तरह लोकप्रिय था।“ ‘भारत छोड़ो‘ आंदोलन का नेतृत्व भी कांग्रेस ने गांधीजी को ही सौंपा। अ.भा. कांग्रेस की बैठक (मुंबई 7 अगस्त, 1942) में जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्ताव रखा। इसके अगले दिन 8 अगस्त, 1942 को गांधीजी ने सवा घंटे के भाषण में कहा, “आपने अपने सारे अधिकार मुझे सौंप दिए। अब मैं वायसराय से मिलकर कांग्रेस की माँग स्वीकार करने का अनुरोध करूँगा।“
हालाँकि 9 अगस्त की सुबह के पहले सारे वरिष्ठ कांग्रेसी गिरफ्तार कर लिए गए। आगे का आंदोलन समाजवादियों ने चलाया। कांग्रेस बेहद कमजोर थी। सन् 42 के पहले के गांधी विचार इसका खुलासा करते हैं। गांधीजी विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की बेशर्त सहायता के पक्षधर थे। उन्होंने अक्टूबर 1941 में लिखा-“यदि हम इस अवस्था में सरकार को परेशानी में डालेंगे तो सत्ताधारी निश्चय ही इसका बुरा मानेंगे।“ (संपूर्ण गांधी वाङ्मय 75/66)। 21 जून, 1940 को कांग्रेस कार्यसमिति ने भावी कार्यक्रमों और नीतियों की जिम्मेदारी से गांधीजी को मुक्त कर दिया लेकिन गांधीजी कांग्रेस से जुड़े रहे। 1942 के ‘भारत छोड़ो‘ आंदोलन के ठीक 8 माह पूर्व 30 दिसंबर, 1941 को कार्यसमिति ने उन्हें दोबारा मुक्त किया। गांधी कांग्रेस से अलग हो गए। अगस्त 42 के आंदोलन के एक माह पूर्व 5 जुलाई को उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को कांग्रेस छोड़ने के लिए आग्रह पत्र लिखागांधीजी ने लिखा- “कांग्रेस के भीतर अनुशासनहीनता और हिंसा भरी है।“ जो कांग्रेस गांधीजी के लिए अनुशासनहीन और भारत छोड़ो आंदोलन के एक माह पहले तक त्याज्य थी उसी कांग्रेस को लेकर गांधी और उन्हीं गांधी को लेकर कांग्रेस ऐतिहासिक ‘अगस्त क्रांति‘ नहीं ही कर सकती थी। अंग्रेजीराज की केन्द्रीय असेंबली में एक सवाल के जवाब में बताया गया, “9 अगस्त से 31 दिसंबर, 1942 के बीच 940 लोग पुलिस/सेना की गोली से मारे गए। 60,229 गिरफ्तार हुए। 18000 नजरबंद किए गए और 1630 घायल हुए। 538 स्थानों पर पुलिस फायरिंग हुई। 60 स्थानों पर फौजी कार्रवाई हुई।
इतिहासविद प्रोफेसर विपिन चंद्रा ने लिखा- “आंदोलन की बागडोर अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, डॉ. लोहिया, सुचेता कृपलानी, बीजू पटनायक और जेल से छूटने के बाद जयप्रकाश पर थी। ये गुप्त समूह मुंबई, पूना, सतारा, बड़ौदा, कर्नाटक, केरल, आंध्र, यूपी, बिहार और दिल्ली में सक्रिय थे।“ श्रेय कांग्रेस ने लिया। देश हर बरस ‘अगस्त क्रांति‘ का स्मरण करता है। आन्दोलनों के मूल तत्वों पर विमर्श नहीं होता। झूठे देवता फल-फूल उड़ाते हैं।
(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)