09 Aug 2026
नई दिल्ली, 09 अगस्त (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। भारतीय जतना पार्टी दिल्ली प्रदेश ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट के हवाले से पूर्व में केजरीवाल सरकार पर जीएसटी और बिजली सब्सिडी वितरण में व्यापक वित्तीय अनियमितताओं को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता एवं दिल्ली सरकार में मंत्री प्रवेश वर्मा ने रविवार को यहां आयोजित संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए आम आदमी पार्टी (आआप) पर आरोप लगाया कि हम सभी जानते हैं कि केजरीवाल सरकार में कामों का कोई लेखा-जोखा नहीं होता था। डेढ़ साल के अंदर में हमारी सरकार के आते ही 24 रिपोर्ट आ चुकी हैं। हर रिपोर्ट में सैकड़ों-हज़ारों करोड़ का भ्रष्टाचार हमारे सामने आया है। जो दो दिन पहले रिपोर्ट आई, इसमें भी 3,500 करोड़ रुपये की अनियमितताएं पाई गईं।
कैग की रिपोर्ट के मुताबिक, जीएसटी रजिस्ट्रेशन रद्द होने और टैक्स फाइल न करने के बावजूद अरबों रुपये के ई-वे बिल जनरेट किए गए, जिससे राज्य के राजस्व को भारी नुकसान हुआ है। उन्होंने बताया कि विधानसभा के मानसून सत्र में 24वीं कैग रिपोर्ट को पेश किया गया। कैग रिपोर्ट केजरीवाल सरकार का भ्रष्टाचार का रिटन डॉक्यूमेंट है। हर एक वित्तीय वर्ष में केजरीवाल सरकार क्या-क्या भ्रष्टाचार करती है, यह सब के बारे में कैग रिपोर्ट के डॉक्यूमेंट में हमारे सामने आता है।
केजरीवाल सरकार कुल 8,334 ऐसे टैक्सपेयर्स, जिनका जीएसटी रजिस्ट्रेशन पहले ही रद्द कर दिया गया था, लगातार ई-वे बिल जनरेट करते रहे। इसके ज़रिए कुल 68,680 करोड़ रुपये के ई-वे बिल बनाए गए। ऐसे 4,076 लोग जिन्होंने कभी टैक्स फाइल ही नहीं किया, उन्होंने भी 11,635 करोड़ रुपये के ई-वे बिल जनरेट किए। कुल जनरेट हुए 6.10 करोड़ ई-वे बिलों में से केवल 0.10 प्रतिशत मामलों की जांच की गई। सरकार की ओर से मात्र 70 मामलों पर कार्रवाई हुई, जिनमें ही 3,071 करोड़ रुपये के राजस्व की हेराफेरी का खुलासा हुआ। बिजली सब्सिडी योजना के तहत 50 हजार ऐसे उपभोक्ताओं को 17.81 करोड़ रुपये की सब्सिडी जारी कर दी गई, जिनका लगातार 12 महीनों तक बिजली खपत शून्य थी।
रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाया गया है कि जीएसटी विभाग, संबंधित मंत्रियों और सरकार को इस पूरे फर्जीवाड़े और टैक्स चोरी की पूरी जानकारी थी। इसके बावजूद कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया। उन्होंने बताया कि कार्रवाई न करने का मुख्य कारण करदाताओं को डरा-धमकाकर अवैध वसूली और रिश्वतखोरी का नेटवर्क चलाना था।
सरकारी टेंडरों और विभिन्न विभागों में भी इसी तरह की धांधली के संकेत मिलने की बात कही गई है। फिलहाल पूर्व सरकार से इस वित्तीय नुकसान पर जवाब मांगा जा रहा है।