18 Aug 2026
रामचरित मानस के जरिये समूची मानव जाति को श्रीराम के आदर्शों से जोड़ते हुए श्रीराम को जन-जन के राम बना देने वाले गोस्वामी तुलसीदास को जन-जन के कवि कहा जाता है। तुलसीदास को आखिर गोस्वामी क्यों कहा जाता है, यह जानना दिलचस्प है। दरअसल गोस्वामी का अर्थ है, इंद्रियों का स्वामी अर्थात् जिसने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया हो यानी जितेन्द्रिय। तुलसीदास पत्नी के धिक्कारने पर सांसारिक मोह माया से विरक्त होकर संन्यासी अर्थात् जितेन्द्रिय या गोस्वामी हो गए थे। इसी परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास जी को गोस्वामी की उपाधि से विभूषित किया जाने लगा।
रामायण यानी श्री रामचरित मानस के रचयिता और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास जी की जयंती विक्रमी संवत् के अनुसार हर साल श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है। इस वर्ष उनकी जयंती 19 अगस्त को है। विक्रमी संवत् 1554 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिला (अब चित्रकूट जिला) के राजापुर में जन्मे तुलसीदास ने जीवन की मुसीबतों से हार मानने के बजाय तमाम कठिनाइयों का डटकर मुकाबला किया। राजापुर यमुना नदी किनारे स्थित है। तुलसीदास का विवाह दीनबंधु पाठक की विदुषी पुत्री रत्नावली से हुआ था।
तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली पर अत्यंत मुग्ध थे और उससे बहुत प्रेम करते थे। कहते हैं एक बार रत्नावली अपने मायके गई थी। तुलसीदास को उसकी याद सता रही थी। रात का समय था। मूसलाधार बारिश हो रही थी। ऐसे मौसम में तुलसीदास उफनती यमुना को पार कर पत्नी से मिलने ससुराल जा पहुंचे। रत्नावली इससे बहुत लज्जित हुई और ताना मारा कि जितना प्रेम हाड़-मांस के मेरे इस शरीर से कर रहे हो, यदि उतना ही प्रेम प्रभु श्रीराम से किया होता तो भवसागर पार हो गए होते। इस एक ताने ने तुलसीदास के जीवन की दिशा बदल दी। उसके बाद उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे भगवान राम की भक्ति में रम गए।
इस दौरान एक दिन स्वामी नरहरिदास राजापुर पहुंचे। उन्होंने तुलसीदास को दीक्षा देते हुए आगे के जीवन की राह दिखाई। उसके बाद तुलसीदास ने रामकथा में ही सुखद समाज की कल्पना करते हुए इसे आदर्श जीवन का मार्ग दिखाने का माध्यम बना लिया। गुरु नरहरिदास से शिक्षा-दीक्षा लेने के बाद उन्हें रामचरित मानस लिखने की प्रेरणा मिली। गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस को देश- दुनिया में आदर और सम्मान से साथ देखा जाता है। तुलसीदास ने वैसे अपने जीवनकाल में कवितावली, दोहावली, हनुमान बाहुक, पार्वती मंगल, रामलला नहछू, विनयपत्रिका, कवित्त रामायण, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी इत्यादि कुल 12 पुस्तकों की रचना की किन्तु उन्हें सर्वाधिक ख्याति रामचरित मानस के जरिये ही मिली।
उन्होंने जब रामचरित मानस की रचना की, तब संस्कृत भाषा का प्रभाव बहुत ज्यादा था, इसलिए आंचलिक भाषा में होने के कारण शुरुआत में इसे मान्यता नहीं मिली लेकिन सरल भाषा में होने के कारण कुछ ही समय बाद यह ग्रंथ जन-जन में बहुत लोकप्रिय हुआ। गोस्वामी तुलसीदास भारतीय भक्ति साहित्य के ऐसे अमर कवि हैं, जिनकी वाणी ने भगवान श्रीराम के आदर्शों, मर्यादा और लोकमंगल की भावना को जन-जन तक पहुंचाने का अद्वितीय कार्य किया। अनेक विद्वान तुलसीदास को महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी मानते हैं।
महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में रामायण की रचना कर श्रीराम के जीवन, चरित्र और आदर्शों को साहित्य के अमर पटल पर अंकित किया । इसी महान परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने लोकभाषा अवधी में मानस रचा। रामकथा को महलों तथा विद्वानों के सीमित संसार से निकालकर गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचाया। उस समय तक संस्कृत मुख्यतः विद्वानों और धर्मशास्त्र के गंभीर अध्येताओं की भाषा थी जबकि अवधी उत्तर भारत के विशाल जनसमुदाय के दैनिक जीवन से जुड़ी सहज और आत्मीय भाषा थी। तुलसीदास ने इसी लोक भाषा में अपनी अभिव्यक्ति को आकार दिया। रामचरित मानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना और लोक आस्था का अभिन्न अंग है। यही विशिष्ट भाव उन्हें भारतीय साहित्य परंपरा में अद्वितीय और कालजयी बनाता है।
रामचरित मानस के जरिये मनुष्य के संस्कार की कथा लिखकर तुलसीदास ने इस महाकाव्य को भारतीय संस्कृति का प्राण तत्व बना दिया। तुलसी के राम सब में रमते हैं और वे नैतिकता, मानवता, कर्म, त्याग द्वारा लोक मंगल की स्थापना करने का प्रयास करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने सत्य और परोपकार को सबसे बड़ा धर्म और त्याग को जीवन का मंत्र मानते हुए अपनी रचनाओं के माध्यम से असत्य, पाखंड, ढोंग और अंधविश्वास में डूबे समाज को भी जगाने का प्रयास किया है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)