21 Aug 2026
डॉ. सत्यवान सौरभ
हरियाणा की पहचान मेहनत, साहस, स्पष्टवादिता और सामाजिक स्वाभिमान से है। इस प्रदेश के लोगों ने समय-समय पर सामाजिक कुरीतियों, अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई है। इसलिए धर्म, आस्था और चमत्कार के नाम पर जनता को भ्रमित करने, डराने या आर्थिक-सामाजिक रूप से शोषित करने वाली किसी भी प्रवृत्ति के विरुद्ध सवाल उठना स्वाभाविक है। आज जरूरत किसी धर्म या आस्था के विरोध की नहीं बल्कि आस्था की स्वतंत्रता के साथ विवेक, कानून और जवाबदेही की रक्षा करने की है। हरियाणा में धार्मिक विश्वास का सम्मान होना चाहिए लेकिन ढोंग, पाखंड और अंधविश्वास को सामाजिक या राजनीतिक संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
आस्था का सम्मान, शोषण का विरोध
धर्म मनुष्य को सत्य, करुणा, संयम, सेवा और नैतिकता की ओर ले जाने का माध्यम है। इसके विपरीत पाखंड तब जन्म लेता है, जब धार्मिक प्रतीकों और भावनाओं का इस्तेमाल निजी स्वार्थ, प्रभाव, धन या सत्ता हासिल करने के लिए किया जाता है। जब कोई स्वयंभू धार्मिक व्यक्ति अपने बारे में असाधारण चमत्कारिक दावे करता है, खुद को सर्वज्ञ या कानून से ऊपर प्रस्तुत करता है अथवा अनुयायियों की भावनात्मक कमजोरियों का लाभ उठाता है, तब सवाल केवल आस्था का नहीं रह जाता। यह नागरिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और कानून के शासन का प्रश्न बन जाता है। किसी व्यक्ति की धार्मिक मान्यता का सम्मान किया जा सकता है लेकिन सार्वजनिक दावों की जांच प्रमाण और तर्क के आधार पर होनी चाहिए। बीमारी ठीक करने, भविष्य बताने, संतान प्राप्ति कराने या किसी गंभीर संकट को चमत्कार से दूर करने जैसे दावों के नाम पर यदि धन या अन्य लाभ लिया जाता है, तो उनकी वैधता और सत्यता की जांच होना जरूरी है।
संविधान सबसे ऊपर
भारतीय संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आस्था रखने और उसका पालन करने का अधिकार है लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य नागरिकों के अधिकारों के अधीन है। इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ कानून से छूट नहीं हो सकता। यदि किसी व्यक्ति या संस्था पर धोखाधड़ी, हिंसा, यौन अपराध, अवैध वसूली, संपत्ति संबंधी अपराध या अन्य गैरकानूनी गतिविधियों के आरोप लगते हैं तो उनकी जांच धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के अनुसार होनी चाहिए। यही संवैधानिक निष्पक्षता है।
कानून से ऊपर कोई नहीं
हरियाणा में ढोंग और पाखंड के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार कानून का समान और निष्पक्ष शासन है। कोई बाबा, संत, धार्मिक संस्था, राजनीतिक नेता या सामाजिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं हो सकता। यदि किसी के खिलाफ गंभीर शिकायत सामने आती है, तो पुलिस और प्रशासन को निष्पक्ष, समयबद्ध और प्रमाण-आधारित जांच करनी चाहिए। साथ ही शिकायतकर्ताओं और गवाहों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय पारदर्शिता
जहां सार्वजनिक दान और चंदे से बड़ी धार्मिक या सामाजिक संस्थाएं संचालित होती हैं, वहां वित्तीय पारदर्शिता का प्रश्न उठना स्वाभाविक है। आय-व्यय का व्यवस्थित लेखा-जोखा, स्वतंत्र ऑडिट, संपत्तियों और सामाजिक गतिविधियों की स्पष्ट जानकारी तथा दान के उपयोग में पारदर्शिता से ईमानदार संस्थाओं की विश्वसनीयता ही बढ़ेगी। पारदर्शिता की मांग धार्मिक भावना का अपमान नहीं है। l
सबसे बड़ा हथियार- शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
अंधविश्वास का स्थायी समाधान केवल पुलिस कार्रवाई नहीं है। समाज को ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें व्यक्ति सवाल पूछ सके, प्रमाण मांग सके और असाधारण दावों को तर्क की कसौटी पर परख सके। संविधान नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और सुधार की भावना विकसित करने की जिम्मेदारी की ओर भी संकेत करता है। स्कूलों और महाविद्यालयों में आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय भाषा के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए ताकि लोग चमत्कार, झूठे उपचार और भ्रामक दावों के बीच अंतर समझ सकें। वैज्ञानिक दृष्टिकोण धर्म का विरोध नहीं है।
मीडिया को सनसनी नहीं, सत्य चाहिए
सोशल मीडिया के दौर में तथाकथित चमत्कार, झूठे उपचार, भविष्यवाणियां और अधूरी सूचनाएं बहुत तेजी से फैलती हैं। कभी-कभी मीडिया भी पर्याप्त सत्यापन के बिना ऐसी सामग्री को व्यापक मंच दे देता है। पत्रकारिता की जिम्मेदारी सनसनी पैदा करना नहीं बल्कि तथ्य सामने रखना है। किसी आरोप को रिपोर्ट करते समय पीड़ित की गरिमा और पहचान की रक्षा होनी चाहिए। वहीं, आरोपी के बारे में भी निष्पक्षता बरती जानी चाहिए और आरोप को सिद्ध अपराध की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। जनता को भी वायरल वीडियो या धार्मिक दावों को तुरंत सत्य मानने के बजाय उनके स्रोत और प्रमाण की जांच करनी चाहिए।
राजनीति को भी तय करनी होगी सीमा
धार्मिक प्रभाव का राजनीतिक इस्तेमाल पाखंड को मजबूत करने वाली स्थितियां पैदा कर सकता है। राजनीतिक दलों और नेताओं को धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी स्वयंभू धार्मिक प्रभावशाली व्यक्ति को कानून से ऊपर का दर्जा न मिले। धर्म समाज में नैतिकता, सेवा और मानवीय एकता की प्रेरणा दे सकता है लेकिन राजनीति का प्राथमिक दायित्व शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है। जनता को भी चुनावों में धार्मिक नारों और व्यक्तिपूजा के बजाय नीतियों, काम और जवाबदेही को प्राथमिकता देनी चाहिए।
सामाजिक सुधार की जरूरत
हरियाणा ने बाल विवाह, दहेज, नशा, कन्या भ्रूण हत्या और लैंगिक भेदभाव जैसी समस्याओं के खिलाफ लंबे समय से सामाजिक संघर्ष देखा है। ढोंग और अंधविश्वास के विरुद्ध जागरूकता भी इसी सुधारवादी परंपरा का हिस्सा होनी चाहिए। ग्राम पंचायतों, शिक्षकों, महिला समूहों, युवाओं और नागरिक संगठनों को मिलकर जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा, स्वच्छता और कानून का पालन सुनिश्चित होना चाहिए। किसी भी गैरकानूनी गतिविधि की जानकारी प्रशासन तक पहुंचाना नागरिक जिम्मेदारी है। लेकिन सामाजिक सुधार की भाषा भी संयमित होनी चाहिए।
हरियाणा का संकल्प
हरियाणा को ऐसा प्रदेश बनाना होगा जहां धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित हो लेकिन धार्मिक शोषण के लिए कोई जगह न हो। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, आश्रम और अन्य धार्मिक संस्थाएं सेवा, नैतिकता और मानवता के केंद्र बनें—भय, धोखाधड़ी या सत्ता के केंद्र नहीं। इसके लिए सरकार, प्रशासन, शिक्षण संस्थानों, मीडिया, धार्मिक संगठनों और नागरिक समाज—सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी। जनता को भी किसी व्यक्ति को केवल वेशभूषा, भीड़ या चमत्कारिक दावों के आधार पर महान मानने के बजाय प्रश्न पूछने और प्रमाण मांगने की आदत विकसित करनी होगी। आस्था का सम्मान होगा, लेकिन अंधविश्वास नहीं। धर्म का आदर होगा, लेकिन शोषण नहीं। संतों और धार्मिक संस्थाओं का सम्मान होगा, लेकिन कानून से ऊपर कोई नहीं।