22 Aug 2026
देश में एक बार फिर एच1एन1 (स्वाइन फ्लू) संक्रमण के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित कई राज्यों में मामलों में तेजी से वृद्धि ने केंद्र और राज्य सरकारों को सतर्क कर दिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने हाल ही में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक कर स्वास्थ्य अधिकारियों को निगरानी, शीघ्र जांच, अस्पतालों की तैयारी और जनजागरूकता बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। यह केवल एक प्रशासनिक बैठक नहीं थी, बल्कि इस बात का संकेत भी थी कि सरकार मौसमी इन्फ्लूएंजा के इस उभरते खतरे को हल्के में लेने के पक्ष में नहीं है।
दिल्ली में वर्ष 2026 के दौरान अब तक इन्फ्लुएंजा-ए के 2,392 मामलों में से 1,777 मामले एच1एन1 के दर्ज किए जा चुके हैं। यानी कुल संक्रमणों में लगभग 72 प्रतिशत हिस्सेदारी इसी वायरस की है। हाल के दिनों में प्रतिदिन 100 से अधिक नए मरीज सामने आ रहे हैं। मुंबई, बेंगलुरु, पुणे और अन्य महानगरों में भी फ्लू जैसे संक्रमणों में वृद्धि दर्ज की जा रही है। चिकित्सकों के अनुसार इस मौसम में एच1एन1 सबसे प्रमुख फ्लू स्ट्रेन बनकर उभरा है।
इन आंकड़ों को देखकर घबराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना भी उतना ही खतरनाक होगा। एच1एन1 अब कोई नया वायरस नहीं है। वर्ष 2009 में इसी वायरस ने वैश्विक महामारी का रूप लिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमानों के अनुसार उस महामारी में विश्वभर में लगभग 15 से 57 करोड़ लोग संक्रमित हुए और 1.5 लाख से 5.75 लाख लोगों की मृत्यु हुई। बाद में यह वायरस मौसमी इन्फ्लूएंजा का हिस्सा बन गया। इसका अर्थ यह है कि यह हर वर्ष लौट सकता है, लेकिन इसकी तीव्रता इस बात पर निर्भर करती है कि स्वास्थ्य तंत्र और समाज कितने तैयार हैं।
भारत में भी एच1एन1 कोई अपरिचित बीमारी नहीं है। पिछले डेढ़ दशक में लगभग हर वर्ष मानसून और सर्दियों के दौरान इसके हजारों मामले सामने आते रहे हैं। कई वर्षों में सैकड़ों लोगों की जान भी गई। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के पुराने आंकड़े बताते हैं कि यह संक्रमण समय-समय पर गंभीर रूप लेता रहा है। इसलिए इसे केवल "मौसमी बुखार" मान लेना भूल होगी।
दरअसल एच1एन1 की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इसके शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार से मिलते-जुलते हैं। तेज बुखार, खांसी, गले में खराश, सिरदर्द, शरीर में दर्द और अत्यधिक थकान—ये सभी लक्षण सामान्य फ्लू में भी दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप अनेक लोग स्वयं दवा लेकर घर पर ही इलाज करते रहते हैं। लेकिन यदि सांस लेने में तकलीफ, लगातार तेज बुखार, ऑक्सीजन स्तर में गिरावट या सीने में जकड़न जैसे लक्षण दिखाई दें तो तत्काल चिकित्सकीय सलाह आवश्यक है। विशेष रूप से बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों, मधुमेह, हृदय रोग, अस्थमा, कैंसर अथवा कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए यह संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या भारत ने कोविड-19 महामारी से पर्याप्त सबक लिया है? कोविड के दौरान देश ने ऑक्सीजन संयंत्र स्थापित किए, आईसीयू क्षमता बढ़ाई, प्रयोगशालाओं का विस्तार किया, डिजिटल रोग निगरानी प्रणाली विकसित की और सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे में भारी निवेश किया। आज प्रश्न यह नहीं है कि संसाधन उपलब्ध हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इन संसाधनों का प्रभावी उपयोग एच1एन1 जैसी मौसमी चुनौतियों से निपटने में हो रहा है।
सकारात्मक पक्ष यह है कि सरकार इस बार प्रारंभिक स्तर पर ही सक्रिय दिखाई दे रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों को इन्फ्लुएंजा लाइक इलनेस (ILI) और सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन (SARI) की निगरानी मजबूत करने, परीक्षण क्षमता बढ़ाने, एंटीवायरल दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने और अस्पतालों में पर्याप्त बेड, ऑक्सीजन तथा वेंटिलेटर उपलब्ध रखने के निर्देश दिए हैं। दिल्ली में एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) के माध्यम से प्रतिदिन मामलों की निगरानी की जा रही है।
लेकिन केवल सरकारी तैयारी पर्याप्त नहीं होगी। संक्रमण की रोकथाम में नागरिकों की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। कोविड के दौरान मास्क पहनना, हाथ धोना, भीड़भाड़ से बचना और बीमार होने पर घर में रहना जैसी आदतें आम जीवन का हिस्सा बन गई थीं। महामारी समाप्त होते ही समाज ने इन आदतों को लगभग भुला दिया। आज आवश्यकता है कि कम-से-कम संक्रमण के मौसम में इन व्यवहारों को फिर अपनाया जाए। यदि कोई व्यक्ति बुखार और खांसी से पीड़ित है तो उसका कार्यालय, विद्यालय या सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाने से बचना सामाजिक उत्तरदायित्व भी है।
यह चुनौती केवल स्वास्थ्य मंत्रालय की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। विद्यालयों, कॉलेजों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और सरकारी कार्यालयों को भी संक्रमण प्रबंधन के अपने प्रोटोकॉल सक्रिय करने होंगे। स्कूलों में बीमार बच्चों को घर पर आराम करने की सलाह, कार्यालयों में फ्लेक्सिबल कार्य व्यवस्था और सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता अभियान संक्रमण की श्रृंखला तोड़ने में सहायक हो सकते हैं।
एक महत्वपूर्ण प्रश्न टीकाकरण का भी है। विकसित देशों में बुजुर्गों, स्वास्थ्यकर्मियों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए वार्षिक इन्फ्लुएंजा टीकाकरण की स्पष्ट सिफारिश की जाती है। भारत में भी फ्लू वैक्सीन उपलब्ध है, लेकिन इसके प्रति जागरूकता सीमित है। यदि उच्च जोखिम वाले वर्गों में नियमित टीकाकरण को प्रोत्साहित किया जाए तो गंभीर मामलों और अस्पतालों पर पड़ने वाले दबाव में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
इस संक्रमण का आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। किसी भी महानगर में यदि हजारों लोग फ्लू से संक्रमित होते हैं तो इसका असर केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं रहता। कार्यालयों में अनुपस्थिति बढ़ती है, उत्पादन प्रभावित होता है, परिवारों का चिकित्सा खर्च बढ़ता है और निजी अस्पतालों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि रोकथाम पर किया गया निवेश उपचार पर होने वाले कई गुना अधिक खर्च को बचा सकता है।
मीडिया की भूमिका भी इस समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। समाचार माध्यमों को न तो भय फैलाना चाहिए और न ही संक्रमण को सामान्य जुकाम बताकर उसकी गंभीरता कम करनी चाहिए। तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग, वैज्ञानिक सलाह और सरकारी दिशा-निर्देशों का संतुलित प्रसार ही जनविश्वास बनाए रख सकता है। सोशल मीडिया पर फैलने वाली अपुष्ट सूचनाओं और घरेलू उपचारों के नाम पर होने वाले भ्रम से भी सावधान रहने की आवश्यकता है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वर्तमान स्थिति की तुलना कोविड-19 से न की जाए। एच1एन1 मौसमी इन्फ्लूएंजा का हिस्सा है और अधिकांश मरीज सामान्य उपचार से स्वस्थ हो जाते हैं। इसलिए अनावश्यक भय फैलाने का कोई कारण नहीं है। किंतु सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे बड़ी सफलता वही होती है, जब किसी बीमारी को महामारी बनने से पहले ही नियंत्रित कर लिया जाए।
एच1एन1 के बढ़ते मामले भारत के लिए चेतावनी भी हैं और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि संक्रामक रोग आज भी हमारे स्वास्थ्य तंत्र को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। अवसर इसलिए कि कोविड के बाद विकसित स्वास्थ्य ढांचे और अनुभव की वास्तविक परीक्षा अब ऐसे ही संक्रमणों से होगी। यदि सरकार समय पर निगरानी, वैज्ञानिक प्रबंधन और जनभागीदारी सुनिश्चित करती है तथा नागरिक भी व्यक्तिगत स्वच्छता और सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हैं, तो एच1एन1 एक नियंत्रित सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनकर रह जाएगा, न कि राष्ट्रीय संकट।
किसी भी देश की स्वास्थ्य सुरक्षा केवल अस्पतालों से नहीं, बल्कि उसकी वैज्ञानिक सोच, प्रशासनिक तैयारी और जागरूक नागरिकों से सुनिश्चित होती है। एच1एन1 का वर्तमान दौर हमें यही याद दिला रहा है कि महामारी भले समाप्त हो गई हो, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति हमारी जिम्मेदारियां समाप्त नहीं हुई हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)