26 Aug 2026
देश के विभिन्न राज्यों, विशेष रूप से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (दिल्ली-एनसीआर), महाराष्ट्र और कर्नाटक में मौसमी बदलाव व मानसूनी नमी के बीच इन्फ्लूएंजा ‘ए’ के उपप्रकार एच1एन1 (स्वाइन फ्लू) के मामलों में आई तेजी ने आम जनमानस की चिंता बढ़ा दी है। अस्पतालों की ओपीडी में तेज बुखार, खांसी और तीव्र श्वसन संक्रमण के मरीजों की बढ़ती भीड़ ने एक बार फिर हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और नागरिक जवाबदेही को कसौटी पर लाकर खड़ा कर दिया है।
राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) और राज्य स्वास्थ्य विभागों के निगरानी आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष की तुलना में इस बार मामलों में कई गुना उछाल देखा जा रहा है। दिल्ली-एनसीआर में स्थिति सबसे अधिक संवेदनशील बनी हुई है, जहां अब तक इन्फ्लूएंजा 'ए' के 2,392 मामलों में से अकेले एच1एन1 के 1,777 लैब-कंफर्म मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जो बीते वर्ष 2025 की तुलना में लगभग 8 गुना अधिक हैं। इसी प्रकार, कर्नाटक में इन्फ्लूएंजा के 4,212 से अधिक मामले सामने आए हैं, जिनमें से अकेले ग्रेटर बेंगलुरु क्षेत्र में 2,070 से अधिक पुष्ट मामले हैं। वहीं महाराष्ट्र के मुंबई क्षेत्र में भी मानसून की शुरुआत के साथ एच1एन1 के 300 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। इसके अलावा केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में भी बच्चों और बुजुर्गों के ओपीडी पंजीकरण में फ्लू जैसे लक्षणों की अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यह दर्ज आंकड़ा केवल सामने आए मामलों का है, क्योंकि एक बड़ी आबादी हल्के लक्षणों के कारण घर पर ही इलाज कर रही है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के महानिदेशक और डीएचआर सचिव डॉ. राजीव बहल ने उच्च स्तरीय समीक्षा बैठकें कर राज्यों को अस्पतालों में आइसोलेशन वार्ड, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन और ओसेल्टामिविर जैसी एंटीवायरल दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट कर बड़ी राहत दी है कि देश में एच1एन1 का कोई नया परिवर्तित स्ट्रेन विकसित नहीं हुआ है। वर्तमान में फैल रहा वायरस मौसमी इन्फ्लूएंजा का वही रूप है जो बीते वर्षों से सक्रिय है और बाजार में उपलब्ध मौजूदा टीकों की खुराक इससे बचाव में पूरी तरह सक्षम है।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मानसूनी नमी, तापमान में अचानक उतार-चढ़ाव और बंद कमरों में लोगों की मौजूदगी इस वायरस के तेजी से फैलने के मुख्य कारण हैं। यद्यपि सामान्य स्वस्थ वयस्कों के लिए यह 5 से 7 दिनों में आराम और बुनियादी देखभाल से ठीक होने वाला मौसमी बुखार है, परंतु छोटे बच्चों, 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और डायबिटीज, अस्थमा, हृदय या किडनी जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित उच्च जोखिम वाले मरीजों के लिए यह घातक हो सकता है। ऐसे मरीजों में यदि सांस फूलना, सीने में तेज दर्द या ऑक्सीजन स्तर में गिरावट जैसे गंभीर लक्षण दिखें, तो बिना समय गंवाए अस्पताल में भर्ती होना अनिवार्य हो जाता है।
किसी भी महामारी या मौसमी प्रकोप से निपटने में केवल सरकारी ढांचा ही काफी नहीं होता, बल्कि नागरिक व्यवहार की भूमिका सबसे अहम होती है। कोविड काल के दौरान सीखी गई स्वास्थ्य आदतें, जैसे भीड़भाड़ वाले स्थानों में मास्क का प्रयोग, हाथों को बार-बार साबुन या सैनिटाइजर से साफ करना और छींकते या खांसते समय मुंह को ढंकना, इस वायरस के प्रसार को रोकने में उतनी ही प्रभावी हैं। लक्षण दिखने पर खुद से एंटीबायोटिक्स या दवाइयां लेने के बजाय खुद को आइसोलेट करना और डॉक्टर की सलाह लेना अत्यंत आवश्यक है।
एच1एन1 का बढ़ता दायरा सतर्क रहने का संकेत है, न कि पैनिक फैलाने का। स्वास्थ्य प्रणालियों की तत्परता, पारदर्शी आंकड़े, दवाओं की सुगम उपलब्धता और जनता की सजगता के तालमेल से ही इस मौसमी लहर पर समय रहते काबू पाया जा सकता है। सरकार को जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक दवाओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी, वहीं नागरिकों को भी व्यक्तिगत जिम्मेदारी निभाते हुए एहतियाती उपायों को अपनी दिनचर्या में शामिल करना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)