27 Aug 2026
रक्षाबंधन के साथ ही देश में त्योहारों का लंबा सिलसिला शुरू हो चुका है। आगे जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, नवरात्र, दशहरा और दीपावली जैसे पर्व हैं। इन त्योहारों में मिठाइयों, नमकीन और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। ऐसे समय में चीनी और प्याज जैसी रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने आम उपभोक्ता की चिंता बढ़ा दी है। रसोई की दो बुनियादी वस्तुओं का महंगा होना केवल घरेलू बजट का सवाल नहीं, बल्कि खाद्य महंगाई और बाजार प्रबंधन की भी गंभीर परीक्षा है।
इस समय देश के अनेक शहरों में खुदरा बाजार में चीनी 55 से 65 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रही है, जबकि एक माह पहले इसका औसत खुदरा मूल्य लगभग 48.18 रुपये प्रति किलो था। सरकार के अनुसार 20 जुलाई से 20 अगस्त के बीच औसत खुदरा मूल्य बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो पहुंच गया। वहीं राष्ट्रीय औसत खुदरा प्याज मूल्य 43.53 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुका है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 59 प्रतिशत अधिक है। कई शहरों में प्याज 50 से 70 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है।
चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। एक धारणा यह है कि एथनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और चीनी के उपयोग से बाजार में उपलब्धता कम हुई है। इसमें कुछ हद तक आर्थिक तर्क अवश्य दिखाई देता है, क्योंकि एथनॉल कार्यक्रम के विस्तार से चीनी उद्योग की संरचना बदली है। हालांकि सरकार का कहना है कि मौजूदा मूल्यवृद्धि का मुख्य कारण केवल एथनॉल नहीं है। उसके अनुसार इस वर्ष चीनी उत्पादन का अनुमान घटकर लगभग 306 लाख टन रह गया है, जबकि प्रारंभिक अनुमान 343 लाख टन का था। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में अत्यधिक वर्षा, जलभराव तथा रेड रॉट और टॉप बोरर जैसे रोगों ने उत्पादन को प्रभावित किया है। साथ ही त्योहारी मांग, वैश्विक बाजार में कीमतों की मजबूती तथा जमाखोरी की आशंकाओं ने भी कीमतों पर दबाव बढ़ाया है।
यह भी सच है कि एथनॉल कार्यक्रम को केवल नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। इससे गन्ना किसानों को भुगतान में सुधार हुआ है और चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई है। ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से भी यह नीति महत्वपूर्ण है। लेकिन नीति निर्माण का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना होना चाहिए। यदि किसी वर्ष उत्पादन मौसम के कारण घट जाए तो एथनॉल, चीनी और उपभोक्ता हितों के बीच संतुलित निर्णय लेना आवश्यक हो जाता है।
प्याज की स्थिति कुछ अलग है। यह पूरी तरह मौसम की मार का शिकार है। महाराष्ट्र, जो देश का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक राज्य है, वहां लगातार हुई भारी बारिश ने खेतों में जलभराव पैदा कर दिया। कटाई और भंडारण दोनों प्रभावित हुए, जिससे मंडियों में आवक कम हो गई। यही स्थिति कुछ अन्य उत्पादक राज्यों में भी देखने को मिली। परिणामस्वरूप खुदरा बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ीं। सरकार ने अपने 1.21 लाख टन के बफर स्टॉक से प्याज बाजार में उतारना शुरू किया है और 'कांदा एक्सप्रेस' जैसी व्यवस्था के माध्यम से विभिन्न राज्यों तक आपूर्ति बढ़ाने का प्रयास किया है।
सरकार ने चीनी की कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए भी कई कदम उठाए हैं। चीनी व्यापारियों पर स्टॉक सीमा लगाई गई है, जमाखोरी की निगरानी बढ़ाई गई है तथा एहतियात के तौर पर 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी गई है, ताकि त्योहारी मौसम में बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे। साथ ही राज्यों को चीनी मिलों में शीघ्र पेराई शुरू कराने की सलाह भी दी गई है।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि इन उपायों का असर आम उपभोक्ता तक तत्काल नहीं पहुंच पाया है। थोक बाजार में कुछ राहत के संकेत अवश्य मिले हैं, लेकिन खुदरा बाजार में कीमतें अब भी ऊंची बनी हुई हैं। यही कारण है कि आम लोगों को सरकारी कदम अभी अपेक्षित राहत देते नहीं दिखाई दे रहे।
महंगाई का सबसे अधिक असर निम्न और मध्यम आय वर्ग पर पड़ता है। त्योहारों के समय परिवारों का खर्च स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। मिठाइयों, प्रसाद, घरेलू भोज और सामाजिक आयोजनों में चीनी की मांग बढ़ती है, जबकि प्याज लगभग हर रसोई की आवश्यकता है। ऐसे में इन दोनों वस्तुओं के महंगे होने से त्योहारों की खुशियों पर आर्थिक दबाव पड़ना स्वाभाविक है। छोटे हलवाई, मिठाई निर्माता और रेस्तरां भी बढ़ी हुई लागत का सामना कर रहे हैं, जिसका असर अंततः उपभोक्ता पर ही पड़ता है।
दीर्घकालिक समाधान केवल आयात, बफर स्टॉक या स्टॉक सीमा से नहीं निकलेगा। कृषि को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप अधिक सक्षम बनाना होगा। प्याज के वैज्ञानिक भंडारण, बेहतर कोल्ड चेन, फसल विविधीकरण और मौसम आधारित कृषि सलाह को मजबूत करना होगा। इसी प्रकार चीनी क्षेत्र में भी उत्पादन, एथनॉल और घरेलू मांग के बीच दीर्घकालिक संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
त्योहारी मौसम में महंगाई केवल आर्थिक विषय नहीं रहती, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का प्रश्न भी बन जाती है। सरकार, उद्योग और बाजार—तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि उपभोक्ताओं को राहत मिले और किसानों को भी उचित मूल्य प्राप्त हो। यदि नीति और बाजार प्रबंधन में यह संतुलन कायम किया जा सके, तभी रक्षाबंधन से दीपावली तक का उत्सव सच मायनों में मिठास और खुशियों से भर सकेगा, न कि महंगाई की कड़वाहट से।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)