01 Sep 2026
आधी रात होने वाली है। मंदिरों में घंटियां बज रही हैं। शंखनाद के बीच कान्हा के जन्म की तैयारी है। कहीं झांकी सजी है, कहीं नन्हे बच्चे कृष्ण बने हैं। घरों में माखन-मिश्री का भोग रखा है और भक्त उस एक पल का इंतजार कर रहे हैं, जब कृष्ण जन्म लेंगे।
हर साल हम जन्माष्टमी मनाते हैं। कृष्ण के जन्म की कथा सुनते हैं, पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और उत्सव मनाते हैं।
लेकिन कभी-कभी लगता है, कृष्ण की कहानी सिर्फ यह बताने के लिए नहीं है कि उनका जन्म कब और कहां हुआ था। शायद यह हमें यह याद दिलाने के लिए भी है कि अंधेरा कितना भी गहरा हो, रोशनी के जन्म की संभावना हमेशा रहती है।
कृष्ण का जीवन भी कितना अपना-सा लगता है।
वे कभी यशोदा के शरारती कान्हा हैं, कभी दोस्तों के साथ मस्ती करते ग्वालबाल, कभी राधा के कृष्ण और कभी अर्जुन के सारथी। वे जीवन से भागते नहीं हैं। वे जीवन को उसकी पूरी जटिलता के साथ स्वीकार करते हैं—प्रेम भी, विरह भी, आनंद भी और संघर्ष भी।
शायद इसीलिए हजारों साल बाद भी कृष्ण हमारे बीच इतने जीवंत हैं।
आज हम सबके अपने-अपने छोटे-बड़े कुरुक्षेत्र हैं। कोई नौकरी को लेकर परेशान है, कोई रिश्तों को लेकर, कोई भविष्य को लेकर। कई बार सब कुछ ठीक दिखता है, फिर भी मन के भीतर एक बेचैनी बनी रहती है।
ऐसे में गीता का कृष्ण हमारे पास बैठकर जैसे बस इतना कहते हैं—जो तुम्हारे हाथ में है, उसे पूरी ईमानदारी से करो। जो तुम्हारे हाथ में नहीं है, उसे लेकर खुद को मत जलाओ।
हमारी बहुत-सी परेशानियां शायद इसलिए भी हैं क्योंकि हम हर चीज को अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं। परिणाम अपने मुताबिक चाहते हैं, रिश्ते अपनी उम्मीदों के मुताबिक और जिंदगी अपनी योजना के मुताबिक।
कृष्ण शायद हमें थोड़ा छोड़ना सिखाते हैं। कर्म करना, लेकिन परिणाम से चिपके न रहना। प्रेम करना, लेकिन अधिकार के भाव से नहीं। और जब जीवन सामने कोई कठिन निर्णय रख दे, तो डरकर पीछे न हटना।
उनकी सबसे खूबसूरत बात शायद यही है कि वे हमें जीवन से दूर जाने की नहीं, जीवन के बीच रहते हुए भीतर से शांत रहने की कला सिखाते हैं।
इस जन्माष्टमी, हम कृष्ण को मंदिरों में जरूर खोजें। लेकिन कुछ पल अपने भीतर भी झांकें।
क्या हम थोड़ा कम डरते हैं?
क्या हम थोड़ा अधिक प्रेम कर पाते हैं?
क्या हम अपने हिस्से का कर्म ईमानदारी से कर रहे हैं?
क्या हम उन चीजों को छोड़ पा रहे हैं जिन्हें बदलना हमारे हाथ में नहीं?
क्योंकि कृष्ण शायद किसी एक रात जन्म लेकर चले नहीं गए।
वे हर बार जन्म लेते हैं—जब निराशा के बीच उम्मीद बची रहती है, जब भ्रम के बीच विवेक जागता है, जब नफरत के बीच प्रेम चुनने का साहस होता है।
इस जन्माष्टमी, कृष्ण का जन्म सिर्फ मथुरा में न हो।
थोड़ा-सा कृष्ण हमारे भीतर भी जन्म ले।