08 Sep 2026
कभी सोचा है, अगर आपको पढ़ना नहीं आता तो आपकी जिंदगी के कितने फैसले दूसरे लोग आपके लिए कर सकते हैं?
एक कागज आपके सामने रखा जाता है। आपसे कहा जाता है—“यहां हस्ताक्षर कर दीजिए।”
आप हस्ताक्षर तो कर देते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि उस कागज पर लिखा क्या है। उसमें आपके अधिकार दर्ज हैं या आपकी जिम्मेदारी? आपको कुछ मिलना है या आपसे कुछ लिया जा रहा है? आप चाहकर भी यह सवाल नहीं पूछ पाते, क्योंकि जवाब पढ़ने की क्षमता आपके पास नहीं है।
यहीं से साक्षरता का असली अर्थ सामने आता है।
साक्षरता केवल अक्षरों को पहचानने, अपना नाम लिखने या कुछ पंक्तियां पढ़ लेने की क्षमता नहीं है। यह अपने आसपास की दुनिया को समझने, सही जानकारी तक पहुंचने और अपने जीवन से जुड़े फैसले खुद लेने की क्षमता है।
विश्व साक्षरता दिवस हमें हर साल इसी बुनियादी सवाल पर लौटने का अवसर देता है—आखिर साक्षर होने का मतलब क्या है?
आज इस सवाल का अर्थ और व्यापक हो गया है।
एक समय था जब पढ़ने के लिए किताब, अखबार या चिट्ठी हमारे प्रमुख साधन थे। आज एक स्मार्टफोन हमारी हथेली पर पूरी दुनिया खोल देता है। हम खबर पढ़ते हैं, पैसे भेजते हैं, सरकारी सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं, नौकरी तलाशते हैं और कुछ ही सेकंड में किसी भी विषय की जानकारी हासिल कर सकते हैं।
लेकिन सूचना तक पहुंच और सूचना को समझने की क्षमता एक बात नहीं है।
आज फर्जी खबरें, भ्रामक वीडियो, गलत सूचनाएं और ऑनलाइन धोखाधड़ी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में केवल पढ़ना जानना पर्याप्त नहीं है। हमें यह भी समझना होगा कि जो पढ़ रहे हैं, वह कितना विश्वसनीय है, उसका स्रोत क्या है और उसे आगे बढ़ाने से पहले उसकी पुष्टि जरूरी है या नहीं।
इसलिए आज साक्षरता का अर्थ डिजिटल समझ और आलोचनात्मक सोच से भी जुड़ गया है।
फिर भी, इसकी सबसे मजबूत बुनियाद आज भी शिक्षा ही है।
एक मां जब पहली बार अपने बच्चे की किताब खुद पढ़ पाती है, तो वह सिर्फ शब्दों को समझना नहीं सीख रही होती। वह अपने बच्चे की दुनिया में शामिल होने का एक नया रास्ता खोल रही होती है।
एक मजदूर जब किसी सरकारी योजना की जानकारी खुद पढ़कर समझ पाता है, तो वह किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहता। उसे पता होता है कि उसके लिए क्या उपलब्ध है और अपने अधिकार के लिए उसे कहां जाना है।
और जब एक लड़की पढ़ती है, तो उसके सामने सिर्फ रोजगार का रास्ता नहीं खुलता। उसके सामने अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने की संभावना खुलती है।
इसलिए साक्षरता को केवल स्कूल, परीक्षा, प्रमाणपत्र या डिग्री से मापना उसके अर्थ को सीमित करना है।
सच्ची साक्षरता वह है जो इंसान को पढ़ने के साथ समझने, सोचने, सवाल करने और अपने लिए निर्णय लेने की स्वतंत्रता दे।
विश्व साक्षरता दिवस पर हमें शायद इसी बात को याद रखना चाहिए—हर व्यक्ति को अक्षरों की दुनिया तक पहुंच देना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है उसे उस दुनिया को समझने और उसमें अपनी आवाज दर्ज करने का अवसर देना।
क्योंकि जब कोई व्यक्ति पढ़ना सीखता है, तो वह सिर्फ शब्द नहीं पढ़ता।
वह अपने अधिकारों को पहचानना, अपने विकल्पों को समझना और अपने भविष्य की इबारत खुद लिखना सीखता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)