09 Sep 2026
विगत कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। जब भी किसी बड़ी भर्ती का विज्ञापन आता है, तो एक बुनियादी सवाल लगातार चर्चा के केंद्र में रहता है—"भाई, ईडब्ल्यूएस से फॉर्म भरें या अनारक्षित से?” यह सवाल जितना सहज प्रतीत होता है, वास्तव में उतना ही गंभीर है। यह केवल आवेदन-पत्र के किसी एक विकल्प को चुनने का मामला नहीं है, बल्कि एक युवा के भविष्य, उसकी वर्षों की तपस्या और संवैधानिक व्यवस्था पर उसके भरोसे से जुड़ा प्रश्न है। अभ्यर्थी यह जानना चाहता है कि यदि वह अनारक्षित श्रेणी के कटऑफ से अधिक अंक अर्जित करता है, तो क्या व्यवस्था उसकी योग्यता का सम्मान करते हुए उसे खुली प्रतियोगिता का हक देगी?
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) की सम्मिलित राज्य/प्रवर अधीनस्थ सेवा (पीसीएस) प्रारंभिक परीक्षा के आधिकारिक आंकड़े इस दुविधा को किसी काल्पनिक आशंका के बजाय एक कड़वी जमीनी सच्चाई साबित करते हैं। वर्ष 2020 से 2023 तक के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो यह विसंगति निरंतर गहरी होती दिखाई देती है। वर्ष 2020 में जहां अनारक्षित वर्ग का कटऑफ 110 अंक था, वहीं ईडब्ल्यूएस का कटऑफ 112 अंक रहा। वर्ष 2021 में अनारक्षित के 115 अंकों के मुकाबले ईडब्ल्यूएस का कटऑफ 117 अंक, और 2022 में अनारक्षित के 111 अंकों की तुलना में ईडब्ल्यूएस का कटऑफ 114 अंक दर्ज किया गया। वर्ष 2023 में तो यह अंतर चार अंकों तक पहुंच गया, जहां अनारक्षित का कटऑफ 125 अंक था, जबकि ईडब्ल्यूएस के लिए यह 129 अंक तक चला गया।
इन आंकड़ों का सीधा और त्रासद अर्थ यह है कि वर्ष 2023 में 126, 127 या 128 अंक हासिल करने वाला ईडब्ल्यूएस अभ्यर्थी प्रारंभिक चरण में ही प्रतियोगिता से बाहर हो गया, जबकि उससे कम यानी 125 अंक पाने वाला अनारक्षित अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा लिखने का पात्र बन गया।
यहां ‘अनारक्षित’ और ‘आरक्षित’ की बुनियादी संवैधानिक अवधारणा को समझना आवश्यक है। आरक्षण का उद्देश्य अवसरों से वंचित वर्गों को आगे बढ़ने का मंच देना है, न कि किसी मेधावी की योग्यता की अधिकतम सीमा तय करना। अनारक्षित श्रेणी कोई अलग सामाजिक वर्ग या जाति नहीं है, बल्कि यह एक खुली प्रतियोगिता है जहाँ मेरिट में आने वाला कोई भी योग्य अभ्यर्थी स्थान पाने का हकदार है।
इस विधिक सिद्धांत को न्यायिक व्यवस्था ने समय-समय पर स्पष्ट और सुदृढ़ किया है। रजत यादव बनाम राजस्थान राज्य (उच्च न्यायालय) मामले में शीर्ष अदालत ने यह सिद्धांत दोहराया कि यदि किसी आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी, जिसने कोई विशेष रियायत नहीं ली है, सामान्य वर्ग के कटऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे चयन के मध्यवर्ती व प्रारंभिक चरणों में भी खुली श्रेणी की मेरिट सूची में स्थान मिलना चाहिए। उसे केवल उसकी श्रेणी के नाम पर खुली प्रतिस्पर्धा से अलग-थलग नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया बनाम शाम कृष्णा बी में भी उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि आरक्षण रोस्टर और नियमों का मनमाना क्रियान्वयन मेधा को नकारने का माध्यम नहीं बन सकता; मेरिट में ऊपर रहने वाला आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी अनारक्षित श्रेणी में समायोजित होने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार रखता है।
यह विसंगति पीसीएस जैसी बहु-चरणीय परीक्षाओं के प्रारंभिक स्तर पर सबसे घातक साबित होती है। यद्यपि प्रारंभिक परीक्षा के अंक अंतिम चयन सूची में नहीं जुड़ते, किंतु यह मुख्य परीक्षा तक पहुँचने का निर्णायक प्रवेश-द्वार है। यदि किसी अभ्यर्थी ने आयु सीमा या शुल्क जैसी कोई रियायत नहीं ली है और उसके अंक खुली श्रेणी के कटऑफ से अधिक हैं, तो उसे प्रारंभिक स्तर पर ही खुली प्रतियोगिता से बाहर कर देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित नैसर्गिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांत के विपरीत है। अंतिम चरण में समायोजन का प्रावधान ऐसे मेधावी अभ्यर्थियों के लिए व्यर्थ सिद्ध होता है, क्योंकि वे मुख्य परीक्षा की दौड़ से ही बाहर कर दिए जाते हैं।
यह विवाद केवल ईडब्ल्यूएस तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर आरक्षण के सभी वर्गों को प्रभावित करता है (जैसा कि वर्ष 2023 में ओबीसी वर्ग के 128 कटऑफ के साथ भी देखा गया)। यदि खुली सीटों पर केवल उन्हीं को प्रारंभिक प्रवेश मिलेगा जिन्होंने कोई आरक्षण क्लेम नहीं किया, तो ‘अनारक्षित’ सीटें वस्तुतः ‘बिना आरक्षण वाले वर्ग’ के लिए आरक्षित हो जाएंगी, जिससे खुली प्रतियोगिता की मूल आत्मा ही नष्ट हो जाएगी।
ईडब्ल्यूएस श्रेणी की पात्रता आर्थिक स्थिति से तय होती है, किंतु परीक्षा हॉल में उत्तर-पुस्तिका का मूल्यांकन अभ्यर्थी की आर्थिक पृष्ठभूमि देखकर नहीं, बल्कि उसके ज्ञान और प्रदर्शन के आधार पर होता है। कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि किसी मेधावी छात्र के बेहतर प्रदर्शन की सीमा नहीं बननी चाहिए। जैसा कि न्यायशास्त्र का स्थापित नियम है—आरक्षण एक सुरक्षा-कवच है, प्रतिभा की छत नहीं।
प्रतियोगी परीक्षाओं में व्यवस्था का सिद्धांत पारदर्शी और न्यायसंगत होना चाहिए—आरक्षण कमजोर को सहारा देने के लिए है, मेधावी के अवसर छीनने के लिए नहीं। ईडब्ल्यूएस होना किसी अभ्यर्थी की प्रतिभा का दायरा सीमित नहीं करता; यदि उसमें क्षमता है, तो खुली प्रतियोगिता का द्वार उसके लिए भी उतना ही खुला होना चाहिए जितना किसी अनारक्षित प्रतियोगी के लिए।
(लेखक, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)