10 Sep 2026
10 सितंबर भारतीय सैन्य इतिहास का वह गौरवपूर्ण दिवस है, जब देश 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के महानायक, परमवीर चक्र विजेता कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद को उनकी शहादत पर श्रद्धापूर्वक नमन करता है। यह केवल एक सैनिक की वीरगाथा नहीं, बल्कि उस भारतीय आत्मा की कहानी है, जो कर्तव्य, साहस और राष्ट्रभक्ति को जीवन से भी ऊपर रखती है।
भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो समय बीतने के साथ और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। अब्दुल हमीद ऐसा ही एक नाम हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि युद्ध केवल अत्याधुनिक हथियारों से नहीं, बल्कि अदम्य साहस, सूझबूझ और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण से भी जीता जाता है।
जब पैटन टैंकों का मिथक टूटा
1965 के युद्ध में पाकिस्तान को अमेरिका से मिले अत्याधुनिक एम-48 पैटन टैंकों पर बड़ा भरोसा था। उस समय इन्हें दुनिया के सबसे शक्तिशाली टैंकों में गिना जाता था। पाकिस्तान को विश्वास था कि इन टैंकों के दम पर वह भारतीय रक्षा पंक्तियों को आसानी से ध्वस्त कर देगा। लेकिन पंजाब के खेमकरण सेक्टर के असल उत्तर क्षेत्र में पाकिस्तान की यही रणनीति उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
भारतीय सेना के पास संसाधन अपेक्षाकृत सीमित थे। अब्दुल हमीद के पास कोई भारी टैंक नहीं था। वे केवल एक जीप पर लगी 106 मिमी रिकॉयलेस गन का संचालन कर रहे थे। फिर भी उन्होंने असाधारण साहस और रणनीतिक कौशल का परिचय देते हुए दुश्मन के कई पैटन टैंकों को एक-एक कर ध्वस्त कर दिया।
हर बार स्थान बदलकर हमला करना, दुश्मन को भ्रमित रखना और सटीक निशाना लगाना—यह उनकी युद्धक क्षमता का अद्भुत उदाहरण था। उनके हमलों ने पाकिस्तान की बख्तरबंद टुकड़ियों में ऐसी दहशत पैदा कर दी कि पैटन टैंकों की बढ़त देखते ही देखते भारतीय सेना के पक्ष में बदल गई।
10 सितंबर 1965 को एक और टैंक को निशाना बनाते समय वे दुश्मन की गोलीबारी का शिकार हुए और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी शहादत ने युद्ध का रुख बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मरणोपरांत उन्हें देश के सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
अब्दुल हमीद केवल एक सैनिक नहीं, एक विचार हैं
उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल यह नहीं कि उन्होंने दुश्मन के टैंक नष्ट किए। उनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि उन्होंने भारतीय सैनिक की उस भावना को जीवंत किया, जिसमें धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र नहीं, बल्कि केवल राष्ट्र सर्वोपरि होता है।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में जन्मे अब्दुल हमीद एक साधारण परिवार से थे। साधारण परिवेश से निकलकर उन्होंने असाधारण इतिहास रचा। यह भारत की लोकतांत्रिक और सैन्य परंपरा की भी ताकत है कि यहां किसी सैनिक की पहचान उसके नाम या पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि उसके साहस और कर्तव्यनिष्ठा से होती है।
आज भी उतने ही प्रासंगिक क्यों हैं अब्दुल हमीद?
आज भारत सुरक्षा के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। सीमाओं पर पारंपरिक युद्ध के साथ-साथ ड्रोन, साइबर हमले, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतरिक्ष आधारित तकनीकों का महत्व बढ़ गया है। हथियार बदल गए हैं, युद्ध की शैली बदल गई है, लेकिन सैनिक के साहस का महत्व आज भी वही है। आधुनिक तकनीक सेना की शक्ति बढ़ा सकती है, लेकिन निर्णायक क्षणों में जीत उसी की होती है, जिसके भीतर कर्तव्य के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का साहस हो। अब्दुल हमीद इसी शाश्वत सत्य के प्रतीक हैं।
युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज जब समाज में सफलता का अर्थ अक्सर आर्थिक उपलब्धियों से जोड़ा जाता है, तब अब्दुल हमीद का जीवन हमें बताता है कि सबसे बड़ी सफलता अपने कर्तव्य का ईमानदारी से निर्वहन है। उन्होंने न तो प्रसिद्धि की इच्छा रखी और न ही इतिहास में अमर होने का सपना देखा। वे केवल अपने दायित्व का पालन कर रहे थे। यही निस्वार्थ कर्म उन्हें अमर बना गया।
भारत की नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि राष्ट्र निर्माण केवल सीमाओं पर लड़ने वालों का दायित्व नहीं है। हर नागरिक यदि अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी और समर्पण के साथ कार्य करे, तो वही भावना राष्ट्र को सशक्त बनाती है, जिसकी मिसाल अब्दुल हमीद ने रणभूमि में प्रस्तुत की।
शहादत की स्मृति, राष्ट्र का संकल्प
किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी अर्थव्यवस्था या सैन्य क्षमता से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने नायकों को कितना याद रखता है। शहीदों का सम्मान केवल पुष्प अर्पित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनकी जीवनगाथा को विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सैन्य संस्थानों और सार्वजनिक विमर्श का स्थायी हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां समझ सकें कि भारत की स्वतंत्रता और सुरक्षा किन बलिदानों की नींव पर खड़ी है।
आज, जब पूरा देश वीर अब्दुल हमीद को उनकी शहादत पर नमन कर रहा है, तब यह केवल एक महान सैनिक को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चरित्र को मजबूत करने का भी क्षण है, जिसकी बुनियाद साहस, कर्तव्य, त्याग और राष्ट्र सर्वोपरि की भावना पर टिकी है।
वीर अब्दुल हमीद का जीवन हमें यही संदेश देता है कि हथियारों की ताकत सीमित हो सकती है, लेकिन राष्ट्रभक्ति और साहस की शक्ति असीम होती है। यही वह अमर विरासत है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी भारत के सैनिकों और नागरिकों को प्रेरित करती रहेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)