10 Sep 2026
नई दिल्ली, 10 सितंबर (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। राष्ट्रीय राजधानी शुक्रवार से केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक बैठकों में से एक की मेजबानी करने जा रही है। भारत मंडपम में शुरू होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन-2026 ऐसे समय आयोजित हो रहा है, जब दुनिया युद्ध, ऊर्जा संकट, संरक्षणवाद, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चुनौतियों और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की नई तलाश के दौर से गुजर रही है। ऐसे में भारत की अध्यक्षता में होने वाला यह सम्मेलन केवल सदस्य देशों की बैठक नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आवाज और भविष्य की विश्व राजनीति की दिशा तय करने वाला मंच माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन की मेजबानी करेंगे, जबकि चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सहित ब्रिक्स के सदस्य और साझेदार देशों के शीर्ष नेता नई दिल्ली में जुटेंगे। सम्मेलन का औपचारिक एजेंडा जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक नजरें उन द्विपक्षीय बैठकों पर हैं जो भारत मंडपम के सम्मेलन कक्षों, गलियारों और बंद कमरों में होंगी। विशेष रूप से भारत-चीन और भारत-रूस वार्ताओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में व्यापक उत्सुकता है।
इस बार ब्रिक्स का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि संगठन अब केवल पांच देशों का समूह नहीं रह गया है। विस्तार के बाद यह वैश्विक दक्षिण के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है और विश्व की आबादी, ऊर्जा संसाधनों तथा आर्थिक क्षमता का बड़ा भाग इसके दायरे में आता है। ऐसे समय में जब पश्चिमी देशों की नीतियों, प्रतिबंधों और व्यापारिक तनावों पर नए सिरे से बहस चल रही है, ब्रिक्स की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सम्मेलन में खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य सहयोग और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार जैसे विषय प्रमुखता से उठेंगे।
हालांकि इस सम्मेलन की राह पूरी तरह आसान नहीं है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और ईरान से जुड़े घटनाक्रम ने ब्रिक्स के भीतर भी अलग-अलग दृष्टिकोण सामने ला दिए हैं। ऐसे में नई दिल्ली घोषणा-पत्र पर सर्वसम्मति बनाना भारत की कूटनीतिक क्षमता की भी परीक्षा माना जा रहा है। यदि भारत विविध हितों वाले सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने में सफल रहता है तो यह उसकी वैश्विक नेतृत्व क्षमता का महत्वपूर्ण संकेत होगा।
उधर, सम्मेलन से पहले दिल्ली का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। भारत मंडपम, राजनयिक क्षेत्र, प्रमुख होटल, वीआईपी मार्ग, कनॉट प्लेस और अन्य प्रमुख स्थलों को विशेष प्रकाश व्यवस्था, हरित सज्जा, कलात्मक इंस्टॉलेशन और व्यापक स्वच्छता अभियान के माध्यम से संवारा गया है। एनडीएमसी ने राजधानी के हृदयस्थल को विश्वस्तरीय स्वरूप देने के लिए विशेष अभियान चलाया है ताकि भारत आने वाले प्रतिनिधिमंडलों के सामने आधुनिक, स्वच्छ और सुव्यवस्थित नई दिल्ली की छवि प्रस्तुत की जा सके।
सुरक्षा के लिहाज से भी राजधानी अभेद्य किले में तब्दील हो चुकी है। हजारों पुलिसकर्मी, अर्धसैनिक बल, एनएसजी कमांडो, ड्रोन रोधी प्रणाली, बहुस्तरीय निगरानी नेटवर्क और सुरक्षित यातायात गलियारे तैयार किए गए हैं। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के ठहरने वाले होटलों से लेकर सम्मेलन स्थल तक हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखी जाएगी। सुरक्षा व्यवस्था का पैमाना 2023 के जी-20 सम्मेलन की तैयारियों के समकक्ष माना जा रहा है।
भारत के लिए यह सम्मेलन केवल सफल आयोजन का प्रश्न नहीं है। यह उस देश की परीक्षा भी है, जो स्वयं को वैश्विक दक्षिण की आवाज, विश्वसनीय साझेदार और उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। अगले दो दिनों में भारत मंडपम से निकलने वाले निर्णय, द्विपक्षीय समझौते और नई दिल्ली घोषणा-पत्र केवल ब्रिक्स की दिशा तय नहीं करेंगे, बल्कि यह भी संकेत देंगे कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की कूटनीतिक भूमिका कितनी निर्णायक होने जा रही है। इसी कारण शुक्रवार से शुरू होने वाले इस सम्मेलन पर केवल दिल्ली या सदस्य देशों की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं।