14 Sep 2026
शिमला, 14 सितंबर (इंद्रप्रस्थ न्यूज)। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने जंगलों के भीतर मौजूद निजी जमीन के धीरे-धीरे वन भूमि में इस्तेमाल किए जाने पर चिंता जताई है। अदालत ने कहा है कि इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर एक व्यापक नीति की जरूरत है। अदालत का कहना है कि जंगलों के भीतर निजी जमीन का इस्तेमाल बढ़ने से वन भूमि के रखरखाव और प्रबंधन पर असर पड़ रहा है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि यह केवल हिमाचल प्रदेश से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की समस्या है।
जंगलों में आग की घटनाओं से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने आया कि प्रदेश में वन भूमि के भीतर निजी भूमि के कुछ हिस्से मौजूद हैं। हाईकोर्ट ने अपने पिछले आदेश में कहा था कि इन निजी जमीनों के मालिक धीरे-धीरे वन भूमि पर अतिक्रमण कर रहे हैं और अपनी सुविधा के लिए उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे वन भूमि के रखरखाव पर असर पड़ रहा है और वन विभाग के लिए इसका प्रभावी प्रबंधन करना भी मुश्किल हो रहा है।
अदालत ने अपने पिछले आदेश में सुझाव दिया था कि जंगलों के भीतर मौजूद निजी जमीन को सरकारी जमीन से बदले जाने की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही निजी भूमि स्वामियों को जरूरी अनुमति के साथ जंगलों के बाहरी हिस्सों में पुनर्वासित करने की व्यवस्था हो सकती है। अदालत के अनुसार इससे पर्यावरण, सरकार और निजी भूमि स्वामियों के हितों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
उच्च न्यायालय के पिछले आदेश के जवाब में राज्य सरकार ने अदालत में अनुपालन हलफनामा दाखिल किया है। राज्य सरकार ने इसमें इस मामले से जुड़ी व्यावहारिक कठिनाइयों का उल्लेख किया है। सरकार ने अदालत को बताया कि वन विषय संविधान की समवर्ती सूची में आता है। ऐसे में राज्य सरकार के पास लोगों के पुनर्वास या जमीन के आदान-प्रदान से जुड़ा फैसला अकेले लेने की स्वायत्तता नहीं है। राज्य सरकार ने कहा है कि पुनर्वास से जुड़े इस मामले को केंद्र सरकार के समक्ष उठाया जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और न्यायाधीश चिराग भानु सिंह की खंडपीठ ने राज्य सरकार की इन दलीलों को रिकॉर्ड पर लिया है। अदालत ने राज्य सरकार को अपने पिछले आदेश में की गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए जरूरी हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 2 नवम्बर को होगी।