15 Sep 2026
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने भारत-चीन संबंधों को लेकर नई उम्मीद पैदा की है। दोनों नेताओं के बीच इस बात पर सहमति बनी कि मतभेदों को विवाद में नहीं बदलने दिया जायेगा। सीमा विवाद का निष्पक्ष और दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान तलाशने, व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाने तथा दोनों देशों के लोगों के बीच आवाजाही बढ़ाने पर भी सहमति दिखाई दी। आर्थिक और व्यापारिक चिंताओं का समाधान खोजने तथा क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियों से निपटने में सहयोग बढ़ाने की बात भी सामने आई।
इस मुलाकात का एक महत्वपूर्ण पहलू संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने सुरक्षा परिषद में बदलाव और व्यापक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर जोर दिया और चीन की ओर से भी सकारात्मक संकेत दिखाई दिया। ब्रिक्स सम्मेलन के अंतिम दिन प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन सुनने के बाद शी जिनपिंग का उनके साथ ग्रुप फोटो में शामिल होना भी कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। तस्वीर में मोदी के एक ओर जिनपिंग और दूसरी ओर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का खड़ा होना बदलते वैश्विक समीकरणों का प्रतीक जरूर है।
इन सकारात्मक संकेतों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या चीन की बदलती भाषा को उसकी बदलती नीति का प्रमाण मान लिया जाए? भारत के लिए यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन के साथ संबंधों का इतिहास भरोसे और अविश्वास, दोनों से भरा रहा है। 1962 का भारत-चीन युद्ध आज भी भारतीय जनमानस में गहरे घाव की तरह मौजूद है। उस समय ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा था लेकिन दोनों देशों के बीच युद्ध ने यह साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मित्रता के नारों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हित और रणनीतिक तैयारी होती है। इसके बाद भी सीमा विवाद समाप्त नहीं हुआ। दशकों तक बातचीत चलती रही, कई समझौते हुए लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। गलवान घाटी की घटना ने एक बार फिर दोनों देशों के बीच गहरे अविश्वास को सामने ला दिया। इसके बाद सीमा पर सैन्य तैनाती और तनाव ने स्पष्ट कर दिया कि चीन के साथ संबंधों में भारत को हमेशा सतर्क रहना होगा। यही कारण है कि इस बार जिनपिंग की ओर से दिए गए भरोसे को भारत को अवसर के रूप में देखना चाहिए, अंतिम समाधान के रूप में नहीं।
कूटनीति में बयान महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है उनका जमीन पर दिखाई देना। यदि चीन वास्तव में भारत के साथ संबंध सामान्य करना चाहता है तो इसका पहला प्रमाण सीमा पर मिलना चाहिए। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव कम होना, सैनिकों की तैनाती में कमी, पूर्व सहमत व्यवस्थाओं का पालन और सीमा विवाद को बातचीत के जरिए आगे बढ़ाना ही चीन की नीयत की वास्तविक परीक्षा होगी। व्यापार के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग की बड़ी संभावनाएं हैं। भारत और चीन दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और व्यापारिक संबंधों में सुधार से दोनों को लाभ हो सकता है लेकिन भारत को यह ध्यान रखना होगा कि व्यापार बढ़ाने के नाम पर चीन पर अत्यधिक आर्थिक या तकनीकी निर्भरता न पैदा हो। भारत को चीन के साथ व्यापार चाहिए लेकिन संतुलित व्यापार चाहिए।
सांस्कृतिक संबंधों और लोगों के बीच आवाजाही को बढ़ावा देना भी सकारात्मक कदम है। दोनों देशों के बीच प्राचीन सभ्यतागत संबंध रहे हैं। शिक्षा, पर्यटन, बौद्ध संस्कृति और जनसंपर्क के माध्यम से रिश्तों को बेहतर बनाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि राजनीतिक और सुरक्षा वातावरण भी भरोसेमंद हो।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के मुद्दे पर चीन का सकारात्मक रुख भी भारत के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता और वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है। यदि चीन इस मुद्दे पर वास्तव में भारत के साथ खड़ा होता है तो यह संबंधों में वास्तविक बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत होगा। लेकिन यहां भी भारत को शब्दों से अधिक कार्रवाई पर नजर रखनी चाहिए।
मोदी-जिनपिंग-पुतिन की ग्रुप फोटो इसलिए चर्चा में है क्योंकि तस्वीर कभी-कभी कूटनीति का प्रतीक बन जाती है। लेकिन तस्वीर संबंधों की मंजिल नहीं होती। वह केवल यह बताती है कि बातचीत के दरवाजे खुले हैं। असली सवाल यह है कि इन खुले दरवाजों से दोनों देश आगे किस दिशा में चलते हैं। भारत को इसलिए न तो चीन के प्रति अंधा अविश्वास रखना चाहिए और न ही आंखें बंद करके भरोसा करना चाहिए। सही नीति होगी- ‘भरोसा लेकिन सत्यापन के साथ।’
चीन जो कहता है, उसे भारत सुने; लेकिन वह क्या करता है, उसका लगातार मूल्यांकन भी करे। सीमा पर शांति, व्यापार में संतुलन, वैश्विक मंचों पर सहयोग और द्विपक्षीय समझौतों का ईमानदारी से पालन- यही वे कसौटियां हैं जिन पर चीन की नई नीति को परखा जाना चाहिए।यदि चीन अपने शब्दों को व्यवहार में बदलता है तो भारत को भी संबंधों को नई ऊंचाई देने में पीछे नहीं रहना चाहिए।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)