16 Sep 2026
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली का चयन भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का संकेत था लेकिन सम्मेलन का महत्व केवल मेजबानी की भव्यता तक सीमित नहीं रहा। भारत, रूस, चीन और ईरान समेत विस्तारित ब्रिक्स समूह के सामने एक ओर वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने की चुनौती थी, तो दूसरी ओर पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, व्यापारिक तनाव और बदलते शक्ति-समीकरणों ने उसकी एकजुटता की परीक्षा ली। 12-13 सितंबर को आयोजित सम्मेलन में नई दिल्ली घोषणापत्र पर सहमति बनना भारत की कूटनीतिक क्षमता की उपलब्धि है। फिर भी इसे विश्व व्यवस्था में निर्णायक परिवर्तन का प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी।
ब्रिक्स का विस्तार उसकी शक्ति और उसकी जटिलता, दोनों को बढ़ाता है। अब यह केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का आर्थिक मंच नहीं बल्कि विविध राजनीतिक हितों वाला समूह है। भारत जहां इसे विकास, सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व के मंच के रूप में देखता है, वहीं रूस और चीन इसके माध्यम से पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने की अधिक व्यापक रणनीति रखते हैं। ईरान के लिए ब्रिक्स पश्चिमी प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव के बीच नए कूटनीतिक तथा व्यापारिक अवसर उपलब्ध कराता है।
इस अंतर को समझना आवश्यक है। किसी मंच पर साझा घोषणापत्र जारी होना और सदस्य देशों के बीच वास्तविक रणनीतिक एकरूपता होना दो अलग बातें हैं। नई दिल्ली घोषणापत्र में बहुपक्षवाद, संयुक्त राष्ट्र सुधार, विकासशील देशों की अधिक भागीदारी और एकतरफा प्रतिबंधों के विरोध पर बल दिया गया है। यह विकासशील विश्व की लंबे समय से चली आ रही मांगों के अनुरूप है। परंतु इन घोषणाओं को संस्थागत सुधार और व्यावहारिक सहयोग में बदलना कठिन कार्य होगा।
चीन की उपस्थिति ब्रिक्स को आर्थिक और सामरिक वजन देती है। उसकी विशाल विनिर्माण क्षमता, व्यापारिक पहुंच और वित्तीय संसाधन समूह की परियोजनाओं को गति दे सकते हैं। किंतु यही आर्थिक शक्ति चीन के प्रभाव को अत्यधिक बढ़ाने का कारण भी बन सकती है। भारत को इस मंच पर चीन के साथ सहयोग करते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स किसी एक देश के नेतृत्व वाला समूह न बन जाए।
रूस के साथ भारत के संबंध ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक विश्वास पर आधारित हैं। पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस के लिए भारत एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार बना हुआ है। ब्रिक्स के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की चर्चा दोनों देशों के लिए उपयोगी हो सकती है। लेकिन भारत को यह भी देखना होगा कि रूस के साथ आर्थिक सहयोग उसकी अन्य वैश्विक साझेदारियों और वित्तीय स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले।
चीन और रूस के साथ संबंधों में भारत की नीति का आधार स्पष्ट होना चाहिए—सहयोग वहां तक, जहां राष्ट्रीय हित सुरक्षित रहें; असहमति वहां, जहां संप्रभुता, सुरक्षा या आर्थिक स्वायत्तता प्रभावित हो।
ईरान का ब्रिक्स में होना एशिया की भू-राजनीति को सीधे प्रभावित करता है। पश्चिम एशिया में संघर्ष, ऊर्जा आपूर्ति की असुरक्षा और समुद्री व्यापार के मार्गों पर दबाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है। ईरान के साथ भारत के संबंधों में ऊर्जा, चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया तक संपर्क की संभावनाएं महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि, ईरान के साथ सहयोग करते समय भारत को प्रतिबंधों, वित्तीय जोखिमों और क्षेत्रीय तनावों का सावधानीपूर्वक आकलन करना होगा। ब्रिक्स भारत को ईरान के साथ संवाद का अतिरिक्त मंच देता है लेकिन यह भारत को किसी क्षेत्रीय धड़े में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं करता। यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक पूंजी है।
नई दिल्ली सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब एशिया की सुरक्षा और आर्थिक व्यवस्था कई दबावों से गुजर रही है। पश्चिम एशिया का संघर्ष, आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान, ऊर्जा कीमतों की अनिश्चितता और अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा का प्रभाव पूरे महाद्वीप पर पड़ रहा है। ब्रिक्स यदि संवाद, मध्यस्थता और आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाता है, तो वह तनाव कम करने में उपयोगी भूमिका निभा सकता है। लेकिन ब्रिक्स को सुरक्षा गठबंधन समझना भूल होगी। सदस्य देशों के बीच क्षेत्रीय विवाद, अलग-अलग विदेश नीति प्राथमिकताएं और आर्थिक प्रतिस्पर्धाएं मौजूद हैं। ऐसे में इसकी सबसे व्यावहारिक भूमिका आर्थिक स्थिरता, विकास वित्त, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य सहयोग और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार के क्षेत्र में हो सकती है।
भारत को इस सम्मेलन से तीन प्रमुख लाभ मिल सकते हैं। पहला, वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधि के रूप में उसकी कूटनीतिक विश्वसनीयता बढ़ी है। दूसरा, रूस, चीन, ईरान और अन्य सदस्य देशों के साथ एक ही मंच पर संवाद ने भारत को बहुपक्षीय संतुलन साधने का अवसर दिया है। तीसरा, व्यापार, डिजिटल भुगतान, स्वास्थ्य, कृषि और प्रौद्योगिकी में सहयोग की संभावनाएं भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी हो सकती हैं।
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की पहल डॉलर पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकती है, लेकिन इसे तत्काल डॉलर-विहीन व्यवस्था का विकल्प मानना वास्तविकता से दूर होगा। इसके लिए मजबूत वित्तीय बाजार, स्थिर विनिमय दर, भुगतान प्रणालियों की विश्वसनीयता और सदस्य देशों के बीच पारस्परिक विश्वास आवश्यक है। भारत को केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि निर्यात प्रतिस्पर्धा, विनिर्माण क्षमता और तकनीकी नवाचार से लाभ अर्जित करना होगा।
ब्रिक्स का नई दिल्ली सम्मेलन भारत के लिए कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण और राजनीतिक रूप से उपयोगी रहा। इसने दिखाया कि भारत विरोधी ध्रुवीकरण से अलग एक ऐसे मंच की दिशा में काम कर सकता है, जहां विविध शक्तियां साझा हितों पर संवाद करें। मगर सम्मेलन की सफलता का अंतिम मूल्यांकन घोषणापत्र की भाषा से नहीं, उसके क्रियान्वयन से होगा।
भारत को चीन की आर्थिक प्रधानता, रूस की रणनीतिक अपेक्षाओं और ईरान की क्षेत्रीय जटिलताओं के बीच अपनी स्वतंत्र नीति बनाए रखनी होगी। ब्रिक्स तभी प्रभावकारी सिद्ध होगा, जब वह संघर्षों के बीच संवाद, आर्थिक दबावों के बीच सहयोग और वैश्विक असमानताओं के बीच न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व का ठोस माध्यम बने। भारत के लिए यह अवसर है कि वह केवल समूह का सदस्य नहीं, बल्कि संतुलित, व्यावहारिक और विश्वसनीय नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी पहचान मजबूत करे।
(लेखक इंद्रप्रस्थ न्यूज के प्रधान संपादक हैं)