16 Sep 2026
नई दिल्ली, 16 सितंबर (एजेंसी)। शिवसेना और 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को सुनवाई के दौरान पूछा कि क्या किसी राजनीतिक पार्टी का स्वामित्व तय करने के लिए विधायी बहुमत को सुरक्षित पैमाना माना जा सकता है, खासकर तब जब उसी बहुमत को बनाने वाले विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही चल रही हो।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने आज एकनाथ शिंदे गुट से ये पूछा। कोर्ट ने एकनाथ शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल से पूछा कि भले विधायी बहुमत अहम पैमाना है लेकिन क्या यह हमेशा निर्णायक या सुरक्षित पैमाना हो सकता है, खासकर तब जब उन्हीं विधायकों के अयोग्य ठहराए जाने की कार्यवाही लंबित हो।
इसके पहले इस मामले पर सुनवाई के दौरान शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट की ओर से कहा गया था कि निर्वाचन आयोग की ओर से एकनाथ शिंदे गुट को शिवसेना नाम और 'धनुष-बाण' का चिह्न आवंटित करने का फैसला गैरकानूनी था। निर्वाचन आयोग के फैसले ने पार्टी के लोकतंत्र को कमतर आंकते हुए मूल पार्टी से अलग हुए विधायकों को इनाम दे दिया। उद्धव गुट की ओर से कहा गया था कि विधायक दल में बहुमत का ये मतलब नहीं है कि उनका पूरी पार्टी और संगठन पर कब्जा होगा। निर्वाचन आयोग के बागी गुट को मान्यता देने से मुख्य पार्टी के सदस्यों और संगठन के प्रतिनिधियों की आवाज को दबा दिया गया।
सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट की ओर से कहा गया कि उनके पास ही पार्टी संगठन और विधायकों के बीच वास्तविक बहुमत है और निर्वाचन आयोग का फैसला कानून को ध्यान में रखकर किया गया है।
इसके पहले सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने पूछा था कि शिवसेना का मतलब किससे है, पूरी राजनीतिक पार्टी, कार्यसमिति या विधायी दल से। सुनवाई के दौरान उद्धव गुट की ओऱ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि शिवसेना नियमों से चलने वाली पार्टी है और ये पार्टी जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29ए के तहत हर छोटे-बड़े बदलाव की जानकारी निर्वाचन आयोग को देती है। उन्होंने कहा था कि पार्टी नियमों के मुताबिक पार्टी प्रमुख को चुनने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पास है। सिब्बल ने कहा कि बागी गुट ने बिना कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाए पार्टी प्रमुख को हटा दिया और खुद कुर्सी पर बैठ गए जो शिवसेना के संविधान का सीधा उल्लंघन था।