16 Sep 2026
नई दिल्ली, 16 सितंबर (एजेंसी)। केंद्र सरकार ने कहा है कि किसी सक्षम वयस्क को यह अनुमति दी जानी चाहिए कि वह अपने समलैंगिक रिश्ते वाले पार्टनर को अपनी ओर से स्वास्थ्य से जुड़े फैसले लेने के लिए नॉमिनेट कर सके, ताकि अगर वो बाद में अक्षम हो जाएं, तो उसका पार्टनर फैसले ले सके।
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और नेशनल मेडिकल कमीशन ने दिल्ली उच्च न्यायालय से ये बातें कही है। केंद्र सरकार ने कहा है कि मौजूदा कानूनों और उचित सुरक्षा उपायों के तहत, इस तरह के तरीके को कानूनी और नैतिक ढांचे में शामिल किया जा सकता है। नेशनल मेडिकल कमीशन ने दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे में यह बात कही। यह हलफनामा अर्शिया टक्कर की उस याचिका के जवाब में दाखिल किया गया था, जिसमें मांग की गई थी कि मरीज के नॉन-हेटरोसेक्सुअल पार्टनर को उनका मेडिकल प्रतिनिधि मानने और मेडिकल स्थितियों में सहमति देने के लिए दिशा-निर्देश जारी किया जाए।
हलफनामा में केंद्र सरकार ने कहा है कि वह एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों समेत सभी लोगों को मिलने वाले सम्मान, निजता, स्वायत्तता, समानता और व्यक्तिगत पसंद के संवैधानिक अधिकारों को मानती है और उनका सम्मान करती है। हलफनामे में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसके जवाब का मकसद क्वीर रिश्तों में रहने वाले लोगों को मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा पर सवाल उठाना नहीं है।
अर्शिया टक्कर की याचिका में मांग की गई है कि किसी मरीज की ओर से अपने नॉन-हेटरोसेक्सुअल पार्टनर को पहले से दिया गया मेडिकल पावर ऑफ अटॉर्नी इस बात के लिए पर्याप्त होना चाहिए कि वह पार्टनर इलाज या मेडिकल इमरजेंसी के समय आधिकारिक मेडिकल प्रतिनिधि के तौर पर काम कर सके।